21 साल की उम्र में निभाया बुजुर्ग किरदार
फिल्म ‘हनुमान अंश’ इन दिनों अपने कलाकारों और उनके अभिनय को लेकर चर्चा में है। इसी फिल्म की अभिनेत्री स्निग्धा द्विवेदी ने अपने किरदार से खास ध्यान खींचा है। महज 21 साल की उम्र में स्निग्धा ने फिल्म में अपनी उम्र से करीब चार-पांच गुना बड़ी महिला ‘सुधि’ का किरदार निभाया है। चुनौती सिर्फ चेहरे पर उम्र दिखाने की नहीं, बल्कि बुजुर्ग महिला की चाल, आवाज, भाषा और भाव-भंगिमा को विश्वसनीय बनाने की थी।
बचपन की शरारत बनी अभिनय की ताकत
स्निग्धा उत्तर प्रदेश से हैं और बचपन से ही उन्होंने अपने आसपास के बुजुर्गों को करीब से देखा। नानी-दादी के बोलने, चलने और व्यवहार करने के अंदाज की नकल करना उन्हें पसंद था। वही बचपन की आदत आगे चलकर उनके लिए अभिनय की तैयारी बन गई। उन्होंने पुराने अनुभवों को याद किया और उन्हीं बारीकियों को ‘सुधि’ के किरदार में उतारने की कोशिश की।
मेकअप नहीं, बॉडी लैंग्वेज बनी चुनौती
किसी युवा कलाकार को बुजुर्ग किरदार में दिखाना सिर्फ मेकअप और वेशभूषा से संभव नहीं होता। उम्र का असर आवाज, शरीर की गति, चेहरे के हाव-भाव और बातचीत के अंदाज में भी नजर आना चाहिए। स्निग्धा के सामने भी यही चुनौती थी। उन्होंने किरदार की उम्र को समझने के साथ अपने अभिनय में उन छोटी-छोटी आदतों को शामिल किया, जिन्हें वे बचपन से अपने परिवार के बुजुर्गों में देखती आई थीं।
अमित दुबे ने टीटी का किरदार चुना
फिल्म में अभिनेता अमित दुबे टीटी की भूमिका में नजर आते हैं। उनके मुताबिक इस किरदार का फिल्म की कहानी और नीम करोली बाबा से जुड़े प्रसंग से महत्वपूर्ण संबंध है। भूमिका स्वीकार करने से पहले उन्होंने पटकथा को कई बार पढ़ा और उसके बाद फिल्म का हिस्सा बनने का फैसला किया। यानी फिल्म के कलाकारों के लिए किरदार सिर्फ अभिनय का अवसर नहीं, बल्कि कहानी को समझने और उसके अनुरूप खुद को ढालने की प्रक्रिया भी रहा।
‘हनुमान अंश’ में किरदारों की अपनी कहानी
‘हनुमान अंश’ को लेकर चर्चा सिर्फ इसकी कहानी तक सीमित नहीं है। फिल्म के किरदार और उन्हें निभाने वाले कलाकार भी दर्शकों का ध्यान खींच रहे हैं। स्निग्धा की कहानी खास इसलिए है क्योंकि जिस उम्र में ज्यादातर कलाकार अपनी युवा छवि को पर्दे पर निभाते हैं, उसी उम्र में उन्होंने एक बुजुर्ग महिला का किरदार चुना। नानी-दादी की नकल से शुरू हुआ यह सफर अब बड़े पर्दे पर एक चुनौतीपूर्ण भूमिका तक पहुंच गया है। यानी बचपन में देखे और दोहराए गए हाव-भाव ही स्निग्धा के लिए अभिनय की असली पाठशाला बन गए।