उत्तर प्रदेश के रामपुर में जुड़वां बहनों तुबा जुबैर और खिजरा जुबैर का मामला डिजिटल पहचान व्यवस्था के सामने आई एक असामान्य चुनौती को सामने लाता है। दोनों बहनों की शारीरिक समानता इतनी अधिक थी कि बायोमेट्रिक पंजीकरण के दौरान सिस्टम ने दूसरी बच्ची के डेटा को पहले से दर्ज रिकॉर्ड से जोड़ दिया। एक बहन का आधार बनने के बाद दूसरी का पंजीकरण डुप्लीकेट बताकर अटक गया। परिवार करीब तीन महीने तक इस समस्या से जूझता रहा।
फिंगरप्रिंट से आंखों तक उलझी पहचान
आधार की बायोमेट्रिक व्यवस्था में उंगलियों के निशान और आंखों से जुड़े बायोमेट्रिक विवरण अहम भूमिका निभाते हैं। इस मामले में दोनों बच्चियों की समानता के कारण तकनीकी प्रणाली के सामने उनकी अलग-अलग डिजिटल पहचान सुनिश्चित करना चुनौती बन गया। परिवार के लिए वे दो अलग बच्चियां थीं, लेकिन सिस्टम को यह अंतर साबित करना आसान नहीं था।
स्कूल और योजनाओं पर असर का खतरा
आज आधार कई नागरिक सेवाओं और सरकारी प्रक्रियाओं से जुड़ा है। स्कूल में दाखिले से लेकर विभिन्न योजनाओं और सेवाओं तक इसकी जरूरत पड़ सकती है। ऐसे में एक बच्ची का आधार बन जाना और दूसरी का पंजीकरण रुकना परिवार के लिए आगे की प्रक्रियाओं में परेशानी का कारण बन सकता था।
जनता दर्शन से दिल्ली तक पहुंचा मामला
स्थानीय स्तर पर समाधान नहीं मिलने के बाद परिवार ने जिलाधिकारी अजय कुमार द्विवेदी के सामने अपनी समस्या रखी। प्रशासन ने मामले को सामान्य पंजीकरण समस्या मानकर छोड़ने के बजाय यूआईडीएआई से संपर्क किया। जुड़वां बच्चों के बायोमेट्रिक पंजीकरण से जुड़े इस असामान्य मामले में विशेष तकनीकी हस्तक्षेप की जरूरत सामने आई।
अपवाद प्रक्रिया से बनी अलग पहचान
यूआईडीएआई मुख्यालय की ओर से अपवाद प्रक्रिया के जरिए दोनों बच्चियों का अलग-अलग पंजीकरण कराने की प्रक्रिया पूरी की गई। इसके बाद तुबा और खिजरा की डिजिटल पहचान अलग सुनिश्चित हो सकी।
रामपुर का यह मामला बताता है कि डिजिटल पहचान व्यवस्था कितनी सटीक तकनीक पर आधारित है, लेकिन असाधारण परिस्थितियों के लिए मानवीय हस्तक्षेप और अपवाद प्रक्रिया भी उतनी ही जरूरी है। सिस्टम ने समानता को पहचाना, लेकिन प्रशासनिक हस्तक्षेप ने यह सुनिश्चित किया कि एक जैसी दिखने वाली दो बहनों की नागरिक पहचान एक न हो जाए।