दर्शन के बाद मंदिर की पैड़ी पर क्यों कुछ देर बैठते हैं…जानें इस प्राचीन परंपरा के पीछे क्या है मान्यता

Why do people sit on the temple steps for a while Learn about the belief behind this tradition

दर्शन के बाद पैड़ी पर बैठने की परंपरा

हमारे यहां मंदिर में दर्शन करने के बाद कुछ देर मंदिर की पैड़ी या ऑटले पर बैठने की परंपरा रही है। बड़े-बुजुर्ग अक्सर कहते थे कि मंदिर से बाहर निकलते ही तुरंत भागने के बजाय कुछ पल शांत बैठना चाहिए। आज कई लोग पैड़ी पर बैठकर बातचीत करते नजर आते हैं, लेकिन इस परंपरा से एक आध्यात्मिक भाव भी जोड़ा जाता है। मान्यता है कि दर्शन के बाद कुछ देर शांत बैठकर भगवान का ध्यान करना चाहिए और जीवन के लिए ईश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए।

कौन सा श्लोक पढ़ने की मान्यता है?

इस परंपरा से एक प्रचलित प्रार्थना जोड़ी जाती है।

“अनायासेन मरणम्, बिना दैन्येन जीवनम्।
देहान्ते तव सान्निध्यम्, देहि मे परमेश्वरम्॥”

इस प्रार्थना में भगवान से जीवन और मृत्यु के संबंध में विशेष वरदान मांगा गया है।

प्रार्थना में क्या मांगा जाता है?

इसका भावार्थ है कि हे परमेश्वर, जीवन में अनावश्यक कष्ट न हो और किसी के सामने असहाय होकर जीवन न बिताना पड़े। जीवन की अंतिम घड़ी में भी ईश्वर का स्मरण और उनका सान्निध्य प्राप्त हो। अर्थात प्रार्थना का केंद्र केवल मृत्यु नहीं, बल्कि सम्मानपूर्ण जीवन, कम से कम पराधीनता और अंत समय में ईश्वर का स्मरण है।

दर्शन आंखें खोलकर, ध्यान आंखें बंदकर

इस परंपरा से जुड़ी एक और मान्यता बेहद दिलचस्प है। मंदिर में भगवान के दर्शन करते समय आंखें बंद करने के बजाय उनके स्वरूप, चरण, मुख और श्रृंगार को ध्यान से देखना चाहिए। दर्शन का उद्देश्य ही भगवान के स्वरूप को मन में बसाना माना जाता है। इसके बाद जब मंदिर से बाहर आकर शांत बैठें, तब आंखें बंद करके उसी स्वरूप का ध्यान करने की बात कही जाती है। यदि ध्यान में भगवान का स्वरूप स्पष्ट न आए, तो दोबारा दर्शन कर मन में उस छवि को बसाने की परंपरा बताई जाती है।

पैड़ी सिर्फ बैठने की जगह नहीं

मंदिर की पैड़ी पर बैठने की यह परंपरा मूल रूप से कुछ पल ठहरने, मन को शांत करने और दर्शन के अनुभव को भीतर उतारने से जोड़ी जाती है। आज भले ही मंदिर की पैड़ी पर बैठकर लोग बातचीत या दूसरी गतिविधियां करते हों, लेकिन बुजुर्गों की बताई इस परंपरा में दर्शन के बाद आत्मचिंतन और ईश्वर-स्मरण को महत्व दिया गया है। यानी मंदिर में जाना केवल भगवान के सामने कुछ मिनट खड़े होकर लौट आना नहीं, बल्कि कुछ पल रुककर उस आध्यात्मिक अनुभव को मन में उतारना भी माना गया है।

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