जाने एक ऐसी देवी जो भक्त के नाम से जानी जाती है और क्या हैं सिंधिया राजघराने से उनका रिश्ता

सिंधिया राजघराने के बारे में तो आप सब बहुत कुछ जानते होंगे। कितना बड़ा राजघराना है कितनी संपत्ति है। सपंत्ति को लेकर क्या झगड़ा है जैसे कई बातें हैं।लेकिन आज हम आपको बताऐंगे सिंधिया ऱाजघराने की कुल देवी के बारे में। उनके महाराष्ट्र के ग्वालियर आने की कहानी और कहां है आज उनका मंदिऱ।सिंधिया राजघराने की कुलदेवी है मांढरे वाली माता।

 

ग्वालियर के कम्पू इलाके में है मंदिर

अकेला ऐसा मंदिर है जिसे देवी के नाम से नहीं बल्कि भक्त या कहें की पुजारी के नाम से जाना जाता है। वैसे तो यहां स्थापित देवी का नाम है महिषासुर मर्दिनी।  लेकिन इस मंदिर को मांढरे वाली माता के नाम से जाना जाता है। मंदिर के पुजारी मांढरे थे इसलिए उन्हीं के नाम से मंदिर का नाम पड़ गया। मांढरे कभी सिंधिया के सेनापति हुआ करते थे लेकिन सेनापित को सिंधिया को कैसे कुलदेवी का पुजारी बनाना पड़ा इसकी कहानी भी दिलचस्प है ।

पहले सतारा में थी देवी

दरअसल सिंधिया की ये कुलदेवी पहले सतारा में थी। ये किस्सा 147 साल पुराना है। सतारा में अष्टभुजा वाली महिषासुर मर्दिनी की पूजा आनंदराव मांढरे किया करते थे। सेना में भरती को सिलेसिले में महाराजा जियाजीराव सिंधिया वहां पहुंचे और वो आनंदराव मांढेर को अपने साथ ग्वालियर लेकर आ गए। आनंदराव मांढरे सिंधिया के सेनापति थे। इस बीच माता सेनापति मांढरे और महाराजा को सपने में सही गलत से आगाह करने लगी। उनको आने वाले खतरे की जानकारी सपने में देने लगीं। एक बार माता ने आनंदराव मांढेर को सपने में कहा कि तुम वापस सतारा आ जाओ या फिर मुझे लेकर जाओ ये बात आनंदराव ने महाराजा को बताई। महाराज ने आनंदराव को तुंरत सतारा भेजा और वो माता को लेकर ग्वालियर आ गए। ग्वालियर के कंपू इलाके में माता की मंदिर बनाकर स्थापना हुई। इसके बाद महाराजा ने अपने सेनापति आनंदराव को सेनापति की जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया और आनंद राव को पूजापाठ की जिम्मेदारी दे दी। कंपू में जिस समय माता का मंदिर बना उस समय ये इलाका घना जंगल हुआ करता था महाराजा ने महल में ऐसे झरोखा बनवाया था कि रोज देवी के दर्शन हुआ करते थे। लेकिन अब वहां घनी आबादी है। आज भी मांढेर परिवार के लोग वहां पूजा पाठ करते हैं। इस मंदिर को मांढरे वाली माता के नाम से जानते हैं। हर साल यहां मेला भी भरता है।

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