उत्तर प्रदेश की सियासत में किसान हमेशा बड़ा मुद्दा रहा है और पश्चिमी यूपी में इसकी अहमियत और बढ़ जाती है। गन्ने की खेती वाले बागपत में जब किसानों से सीधे पूछा गया कि पिछले कुछ वर्षों में खेती और किसान की जिंदगी में क्या बदला, तो बिजली, सिंचाई, खाद, गन्ने का भुगतान और कानून-व्यवस्था सबसे प्रमुख मुद्दे बनकर सामने आए।
यह तस्वीर किसानों के व्यक्तिगत अनुभवों पर आधारित है। वहीं सरकारी आंकड़े इन बदलावों का एक अलग पक्ष सामने रखते हैं।
बिजली-पानी पर किसानों का अनुभव
बागपत के किसानों का कहना है कि सिंचाई के लिए बिजली की उपलब्धता में पहले के मुकाबले सुधार महसूस होता है। खेत में समय पर पानी पहुंचना किसान के लिए फसल की लागत और पैदावार दोनों से जुड़ा सवाल है।
उत्तर प्रदेश सरकार के 2026-27 के बजट दस्तावेज के मुताबिक, 1 अप्रैल 2023 से ट्यूबवेल के जरिए सिंचाई करने वाले किसानों को मुफ्त बिजली उपलब्ध कराने की व्यवस्था है।
यानी बागपत के किसान जिस बिजली राहत की बात कर रहे हैं, उसके पीछे एक बड़ा सरकारी फैसला भी मौजूद है।
खाद की कतारों से राहत?
किसानों ने खाद को लेकर भी अपने अनुभव साझा किए। उनका कहना है कि पहले खाद लेने के लिए लंबी कतार और इंतजार बड़ी परेशानी थी, जबकि अब स्थिति में बदलाव महसूस होता है।
हालांकि खाद की उपलब्धता का अनुभव जिले, मौसम और मांग के समय के हिसाब से अलग हो सकता है। इसलिए इसे पूरे प्रदेश के हर किसान पर लागू होने वाला निष्कर्ष मानने के बजाय बागपत में किसानों की बताई स्थिति के तौर पर देखना ज्यादा उचित है।
गन्ना किसान के लिए सबसे बड़ा सवाल
बागपत में गन्ना सिर्फ फसल नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था का बड़ा आधार है। ऐसे में किसान के लिए असली सवाल सिर्फ गन्ने का भाव नहीं, बल्कि गन्ना बिकने के बाद भुगतान कितनी जल्दी खाते में आता है, यह भी है।
उत्तर प्रदेश सरकार के बजट दस्तावेज में 2025-26 के लिए गन्ने के भाव में ₹30 प्रति क्विंटल बढ़ोतरी और करीब ₹3,000 करोड़ के अतिरिक्त भुगतान का अनुमान दर्ज है।
वहीं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सितंबर में दावा किया था कि पिछले नौ वर्षों में गन्ना किसानों को ₹3.26 लाख करोड़ का भुगतान हुआ और 110 चीनी मिलें हर चौथे दिन किसानों को भुगतान कर रही हैं। यह सरकार का दावा है।
कानून-व्यवस्था का खेत से कनेक्शन
किसान के लिए कानून-व्यवस्था सिर्फ अपराध के आंकड़ों का विषय नहीं है। खेत कई बार गांव से दूर होता है और सिंचाई के लिए रात में भी किसान को वहां जाना पड़ता है।
बागपत में जिन किसानों से बातचीत हुई, उन्होंने बताया कि रात के समय खेतों पर जाने को लेकर पहले जैसी चिंता महसूस नहीं होती। यह एक स्थानीय अनुभव है, लेकिन पश्चिमी यूपी में कानून-व्यवस्था के मुद्दे को समझने के लिए यह महत्वपूर्ण जमीनी संकेत जरूर है।
किसान की नजर में बदलाव
बागपत के किसानों की बातचीत से खेती से जुड़े पांच सवाल साफ निकलते हैं।
बिजली मिली या नहीं।
खेत तक पानी पहुंचा या नहीं।
खाद के लिए कितनी मशक्कत हुई।
गन्ने का भुगतान कब मिला।
और रात में किसान खेत तक कितनी आसानी से पहुंच सकता है। यही वे मुद्दे हैं, जिन पर सरकारी योजनाओं और किसान के वास्तविक अनुभव का असर सीधे दिखाई देता है।
2027 से पहले किसान का मूड
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले पश्चिमी यूपी में किसान से जुड़े मुद्दों की राजनीतिक अहमियत बनी रहेगी। लेकिन बागपत के किसानों की राय को पूरे पश्चिमी यूपी या पूरे प्रदेश के किसानों की राय मानना उचित नहीं होगा। अलग-अलग जिलों और फसलों के किसानों के अनुभव अलग हो सकते हैं। इसलिए बागपत की तस्वीर को एक जमीनी केस स्टडी के तौर पर देखना ज्यादा सही है। सरकारी आंकड़े एक तरफ हैं और खेत में खड़े किसान का अनुभव दूसरी तरफ। 2027 की सियासत में असली बहस इन्हीं दोनों तस्वीरों के बीच होगी।