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मोबाइल बनाने वाले ही बच्चों को मोबाइल से दूर क्यों रख रहे?

DigitalDesk by DigitalDesk
September 30, 2026
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मोबाइल बनाने वाले ही बच्चों को मोबाइल से दूर क्यों रख रहे?
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मोबाइल बनाने वाले ही बच्चों को मोबाइल से दूर क्यों रख रहे?

आज भारत समेत पूरी दुनिया में बच्चों का बचपन तेजी से बदल रहा है… खेल के मैदान की जगह मोबाइल स्क्रीन ने ले ली है… बातचीत की जगह रील्स हैं और किताब-कहानी की जगह लगातार स्क्रॉलिंग। बच्चे घंटों वीडियो देखते हैं, सोशल मीडिया पर समय बिताते हैं और कम उम्र में ही डिजिटल दुनिया का हिस्सा बन जाते हैं।

लेकिन इसी डिजिटल क्रांति को सबसे करीब से देखने और बनाने वाले टेक दिग्गज अपने बच्चों के मामले में काफी सतर्क नजर आते हैं। सवाल यही है कि जिस तकनीक को दुनिया तक पहुंचाने में इन लोगों की सबसे बड़ी भूमिका रही, उसी तकनीक से वे अपने बच्चों को क्यों बचाना चाहते हैं?

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स्नैप सीईओ के बेटे के लिए जीरो स्क्रीन

स्नैप के सीईओ इवान स्पीगल का उदाहरण सबसे दिलचस्प है। 2026 में दिए गए एक पॉडकास्ट इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि उनके दो साल के बेटे के लिए लगभग जीरो स्क्रीन टाइम है। वह बच्चे के साथ पढ़ना, खेलना और बाहर की दुनिया को एक्सप्लोर करना ज्यादा पसंद करते हैं।

हालांकि एक अपवाद है। बाल कटवाते समय बच्चा परेशान होता है, इसलिए उस दौरान उसे निर्माण मशीनों के वीडियो देखने की अनुमति मिलती है। छह और सात साल के बच्चों को भी फोन नहीं दिया जाता और स्क्रीन का इस्तेमाल सीमित रखा जाता है।

यानी सोशल मीडिया कंपनी का मुखिया खुद अपने घर में डिजिटल दुनिया के लिए सीमाएं तय कर रहा है।

बिल गेट्स ने 14 साल तक रोका फोन

माइक्रोसॉफ्ट के सह-संस्थापक बिल गेट्स भी बच्चों के फोन इस्तेमाल को लेकर सख्त रहे हैं। उन्होंने बताया कि अपनी सबसे छोटी बेटी को उन्होंने 14 साल की उम्र तक मोबाइल फोन नहीं दिया था। उनका कहना था कि दूसरे बच्चों के पास फोन होने की वजह से बेटी नाराज भी हुई, लेकिन उन्होंने उम्र को लेकर सीमा बनाए रखी।

यहां एक बड़ा सवाल सामने आता है… जब दुनिया के सबसे प्रभावशाली टेक उद्यमियों में से एक अपने बच्चे को 14 साल की उम्र तक फोन से दूर रख सकता है, तो क्या बच्चों को बहुत कम उम्र में स्मार्टफोन देना वास्तव में जरूरी है?

सुंदर पिचाई के बेटे के पास 11 साल तक फोन नहीं

गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई ने भी अपने परिवार में स्क्रीन और डिवाइस को लेकर सावधानी बरतने की बात कही थी। 2018 के एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि उनका 11 साल का बेटा तब भी फोन इस्तेमाल नहीं करता था। पिचाई ने यह भी माना था कि नई तकनीक का प्रभाव पहले की तकनीकों से तेज गति से बढ़ रहा है।

यानी तकनीक के केंद्र में बैठे लोगों के घरों में सवाल तकनीक को पूरी तरह खत्म करने का नहीं, बल्कि उसकी उम्र और इस्तेमाल की सीमा तय करने का है।

असली सवाल मोबाइल नहीं, बचपन का है

यह बहस सिर्फ मोबाइल फोन की नहीं है। असली सवाल यह है कि बच्चे अपना बचपन किस तरह जी रहे हैं।

क्या बचपन का मतलब लगातार स्क्रीन पर रहना है?

क्या खाली समय का मतलब रील देखना है?

क्या दोस्तों के साथ खेलने की जगह ऑनलाइन बातचीत पर्याप्त है?

और क्या मिट्टी में खेलना, साइकिल चलाना, पेड़-पौधों के बीच समय बिताना और बिना स्क्रीन के बोर होना भी बच्चे के विकास का जरूरी हिस्सा है?

टेक कंपनियों के कुछ शीर्ष अधिकारी अपने बच्चों के लिए इसी संतुलन पर जोर देते दिखाई देते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि तकनीक खराब है। बल्कि संदेश यह है कि तकनीक बच्चे के जीवन का हिस्सा हो सकती है, लेकिन उसका पूरा बचपन नहीं बननी चाहिए।

भारत के माता-पिता के लिए बड़ा सबक

भारत में स्मार्टफोन और सस्ता इंटरनेट बच्चों तक बेहद तेजी से पहुंचा है। रील्स और शॉर्ट वीडियो ने मनोरंजन को कुछ सेकेंड की खपत में बदल दिया है।

ऐसे दौर में शायद सबसे जरूरी सवाल यह नहीं है कि बच्चे को मोबाइल देना है या नहीं।

सवाल यह है कि मोबाइल बच्चे को चला रहा है या बच्चा मोबाइल को?

क्योंकि जिन लोगों ने दुनिया को स्क्रीन की ताकत दिखाई, उनमें से कई अपने बच्चों के लिए स्क्रीन की सीमा तय कर रहे हैं।

और शायद यही इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा विरोधाभास है…

टेक्नोलॉजी की दुनिया बनाने वाले अपने बच्चों के लिए फिर से असली दुनिया तलाश रहे हैं।

खेल का मैदान, किताब, मिट्टी, बातचीत और परिवार…

क्योंकि बचपन को सिर्फ डिजिटल बनाना आसान है, लेकिन उसे संतुलित रखना शायद सबसे बड़ी चुनौती है।

Tags: #Why are the very people who make mobile phones keeping children away from them
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