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मणिपुर में कुकी-नगा टकराव क्यों भड़का? पुरानी जमीन की लड़ाई, नए हमले और हथियारबंद गुटों की एंट्री

DigitalDesk by DigitalDesk
September 30, 2026
in स्पेशल
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Meitei Kuki in Manipur
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मणिपुर में मई 2023 से चल रहे मैतेई-कुकी संघर्ष के बीच अब कुकी-जो और नगा समुदायों के बीच हिंसा का नया मोर्चा खुलता दिखाई दे रहा है। सितंबर में लगातार हमलों में दोनों समुदायों के नागरिक मारे गए हैं। 21 सितंबर को 17 वर्षीय लियांगमाई नगा युवक की हत्या हुई, इसके कुछ ही दिनों बाद कामजोंग में चार तांगखुल नगा नागरिकों की हत्या और फिर सेनापति में दो नगा नागरिकों की हत्या ने तनाव और बढ़ा दिया। सितंबर में अलग-अलग हमलों में कम से कम 13 लोगों की मौत की रिपोर्ट सामने आई है।

1. मैतेई-कुकी संघर्ष से अलग नया तनाव

मणिपुर की मौजूदा हिंसा को केवल 2023 के मैतेई-कुकी संघर्ष के नजरिए से देखना पूरी तस्वीर नहीं होगी। इस बार तनाव का केंद्र कुकी-जो और नगा आबादी वाले पहाड़ी इलाके हैं।

तामेंगलांग, सेनापति, उखरुल, कामजोंग और आसपास के इलाकों में नगा आबादी का प्रभाव है, जबकि चुराचांदपुर और कांगपोकपी जैसे क्षेत्रों में कुकी-जो समुदाय की मजबूत मौजूदगी है। इनके बीच कुछ इलाकों में आबादी और जमीन का मिश्रित स्वरूप भी है।

2. असली जड़ में जमीन और क्षेत्रीय अधिकार

कुकी और नगा समुदायों के बीच तनाव नया नहीं है। इसकी ऐतिहासिक जड़ें जमीन, क्षेत्रीय नियंत्रण और प्रशासनिक अधिकार से जुड़े विवादों तक जाती हैं। 1990 के दशक में भी दोनों समुदायों के बीच बड़े पैमाने पर हिंसा हुई थी। इसलिए 2026 में हुआ कोई स्थानीय विवाद अचानक पैदा हुई समस्या नहीं है। पुराने अविश्वास की जमीन पहले से मौजूद है और छोटी घटना भी बड़े टकराव का रूप ले सकती है। हालिया विश्लेषणों में भी भूमि और क्षेत्रीय अधिकार को इस संघर्ष की महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि बताया गया है।

3. फरवरी की झड़प से फिर भड़की चिंगारी

इस साल फरवरी में उखरुल के लिटन गांव में कुकी और नगा युवकों के बीच कथित झड़प के बाद हालात बिगड़ने लगे। इसके बाद घरों में आगजनी और जवाबी हिंसा की घटनाएं सामने आईं। इसके बाद संघर्ष धीरे-धीरे दूसरे इलाकों तक पहुंचा और अब घात लगाकर हमले, ग्रामीणों की हत्या और गांवों में आगजनी जैसी घटनाएं चिंता बढ़ा रही हैं।

4. सितंबर में नगा नागरिक निशाने पर

21 सितंबर को 17 वर्षीय एनके विफेनबो की तामेंगलांग में गोली मारकर हत्या कर दी गई। वह अकेले तामेई की ओर जा रहे थे। इसके दो दिन बाद कामजोंग जिले के पिलोंग नगा गांव में चार तांगखुल नगा नागरिकों की हत्या का आरोप संदिग्ध हथियारबंद कुकी नेशनल आर्मी-बर्मा के सदस्यों पर लगाया गया। पुलिस ने मामले की जांच शुरू की। फिर 26 सितंबर को सेनापति के कालेनजांग गांव में दो नगा नागरिकों की गोली मारकर हत्या कर दी गई और दो अन्य घायल हुए। पुलिस के मुताबिक घटना गांव के मुखिया के घर के अंदर हुई।

5. लेकिन कहानी एकतरफा नहीं है

इस संघर्ष को केवल एक समुदाय की हिंसा के रूप में पेश करना भी पूरी तस्वीर नहीं देगा। सितंबर में कुकी-जो बस्तियों पर भी हमले हुए हैं। 13 सितंबर को तामेंगलांग जिले के दो कुकी बस्तियों पर अलग-अलग हमलों में चार लोगों की मौत हुई थी। दो दिन बाद दो और कुकी-जो महिलाओं की हत्या की रिपोर्ट सामने आई। यानी जमीनी स्तर पर हमले और जवाबी आरोप दोनों तरफ से सामने आ रहे हैं। किस घटना के पीछे कौन सा हथियारबंद समूह था, यह प्रत्येक मामले की जांच से ही तय होगा।

6. सबसे खतरनाक कड़ी—हथियारबंद संगठन

मौजूदा हिंसा की गंभीरता इसलिए भी बढ़ी है क्योंकि कई घटनाओं में स्थानीय नागरिकों के बजाय हथियारबंद संगठनों पर आरोप लग रहे हैं। नगा संगठनों का आरोप कुकी सशस्त्र समूहों पर है, जबकि कुकी संगठनों की ओर से एनएससीएन-आईएम और अन्य नगा हथियारबंद गुटों पर आरोप लगाए गए हैं। ये आरोप परस्पर विरोधी हैं और प्रत्येक घटना में जांच से इनकी पुष्टि आवश्यक है।

इसी बीच SoO यानी Suspension of Operations समझौते के तहत रह रहे कुकी सशस्त्र समूह भी विवाद के केंद्र में हैं। नगा संगठनों ने केंद्र से ऐसे समझौतों की समीक्षा और आरोपित समूहों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।

7. NSCN-IM और ‘ग्रेटर नागालिम’ का मुद्दा

नगा राजनीति का एक बड़ा मुद्दा ग्रेटर नागालिम की मांग है, जिसमें नगा बहुल इलाकों को एक राजनीतिक ढांचे के तहत लाने की मांग शामिल है। NSCN-IM लंबे समय से केंद्र के साथ शांति वार्ता में शामिल है। कुकी पक्ष के कुछ नेताओं का आरोप है कि मौजूदा हिंसा का संबंध इस व्यापक राजनीतिक लक्ष्य से है। दूसरी तरफ नगा संगठन कुकी हथियारबंद समूहों को मौजूदा हमलों के लिए जिम्मेदार ठहराते हैं। इसलिए यहां जमीन, प्रशासनिक नियंत्रण, जातीय पहचान और राजनीतिक मांगें एक-दूसरे से जुड़ जाती हैं।

8. सड़कें और आर्थिक नाकाबंदी भी बड़ा हथियार

हिंसा का असर सिर्फ गांवों तक सीमित नहीं है। यूनाइटेड नगा काउंसिल ने तीन महीने से अधिक समय तक मणिपुर की प्रमुख सड़कों पर आर्थिक नाकाबंदी की थी। 26 सितंबर को केंद्र और राज्य सरकार के साथ बातचीत के बाद इसे अस्थायी रूप से हटाने पर सहमति बनी। लेकिन UNC की मांगों में कुकी सशस्त्र समूहों के साथ SoO समझौते की समीक्षा और मारे गए नगा नागरिकों के लिए न्याय जैसे मुद्दे शामिल हैं। यानी सड़क बंद करने का मुद्दा भी अब सुरक्षा और राजनीतिक मांगों से जुड़ गया है।

9. सबसे बड़ा खतरा—2023 वाली हिंसा का नया विस्तार

मणिपुर में तीन साल से अधिक समय से चली आ रही हिंसा ने पहले ही समाज को गहरे तौर पर विभाजित किया है। अब अगर कुकी-नगा टकराव भी लंबे समय तक जारी रहता है तो राज्य का जातीय संघर्ष और जटिल हो सकता है। एक तरफ मैतेई-कुकी विभाजन पहले से मौजूद है, दूसरी तरफ अब पहाड़ी इलाकों में नगा-कुकी अविश्वास गहरा रहा है। इससे शांति प्रक्रिया और सामान्य प्रशासन दोनों के सामने नई चुनौती पैदा हो सकती है।

मणिपुर में कुकी-नगा टकराव की मौजूदा तस्वीर को सिर्फ दो दिनों में हुई सात हत्याओं से समझना संभव नहीं है। इसके पीछे दशकों पुराना जमीन और क्षेत्रीय अधिकार का विवाद, 1990 के दशक की हिंसा, 2026 की स्थानीय झड़पें, हथियारबंद संगठनों की मौजूदगी और अलग-अलग राजनीतिक मांगें एक साथ काम कर रही हैं। सबसे अहम बात यह है कि हालिया घटनाओं में आम नागरिक मारे जा रहे हैं। 17 साल के विफेनबो से लेकर पिलोंग और कालेनजांग के नागरिकों तक, हिंसा का सबसे बड़ा असर उन लोगों पर पड़ रहा है जिनका किसी हथियारबंद संघर्ष से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है। अब चुनौती सिर्फ हत्याएं रोकने की नहीं, बल्कि जमीन, सुरक्षा, प्रशासनिक अधिकार और हथियारबंद संगठनों से जुड़े पुराने विवादों का राजनीतिक समाधान खोजने की है। वरना मणिपुर का एक पुराना घाव दूसरे जातीय संघर्ष में बदलने का खतरा बना रहेगा।

Tags: #Amid the ongoing Meitei Kuki conflict #Manipur since May 2023 # new front of violence has now opened between the Kuki#Meitei Kuki in Manipur
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