इतना जरूर दस्तावेजों से स्पष्ट है कि गोविंदा और हरमेश मल्होत्रा की जोड़ी ने 1998 में दूल्हे राजा जैसी सफल फिल्म दी थी। फिल्म में गोविंदा के साथ रवीना टंडन, कादर खान और जॉनी लीवर जैसे कलाकार थे और इसे हरमेश मल्होत्रा ने निर्देशित किया था।
इसके बाद दोनों की जोड़ी अंखियों से गोली मारे के लिए फिर साथ आई। फिल्म में भी गोविंदा और रवीना टंडन मुख्य भूमिकाओं में थे। दिलचस्प बात यह है कि फिल्म 1998 में पूरी हो गई थी, लेकिन किसी वजह से इसकी रिलीज चार साल तक टलती रही और आखिरकार 2002 में सिनेमाघरों तक पहुंची। रिलीज के बाद फिल्म सफल नहीं हो सकी।
यहीं से शुरू होती है विवाद की कहानी
सोशल मीडिया पर प्रचलित कहानी में दावा किया जाता है कि दूल्हे राजा की सफलता के बाद हरमेश मल्होत्रा ने गोविंदा को लेकर अगली फिल्म की तैयारी की। शिमला में भारी-भरकम सेट लगाया गया, लेकिन कथित तौर पर गोविंदा समय पर शूटिंग पर नहीं पहुंचे और निर्माता-निर्देशक को आर्थिक नुकसान हुआ।
इसके बाद शूटिंग को लेकर परेशानी बढ़ने, कर्ज चढ़ने और फिल्म के कारण हरमेश मल्होत्रा की आर्थिक स्थिति खराब होने की बातें कही जाती हैं।
लेकिन यहां एक जरूरी सावधानी है। इन दावों के लिए विश्वसनीय प्राथमिक स्रोत या समकालीन रिपोर्ट आसानी से उपलब्ध नहीं है। इसलिए इन्हें पक्के तथ्य की तरह पेश करना उचित नहीं होगा।
क्या हरमेश मल्होत्रा की मौत का कारण यही था?
सोशल मीडिया की कहानी यहीं सबसे बड़ा मोड़ लेती है। दावा किया जाता है कि आर्थिक और मानसिक परेशानी के बाद हरमेश मल्होत्रा को हार्ट अटैक आया और उनकी मौत हो गई।
इसके बाद कहानी में उनकी पत्नी मंजू मल्होत्रा के कथित बयान और गोविंदा को लेकर बददुआ का जिक्र आता है। लेकिन इस पूरे हिस्से की स्वतंत्र और विश्वसनीय पुष्टि सामने नहीं आती।
यानी किसी व्यक्ति की मृत्यु को किसी अभिनेता के व्यवहार, आर्थिक विवाद या कथित बददुआ का परिणाम बताना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं है, जब तक उसके समर्थन में विश्वसनीय प्रमाण मौजूद न हों।
फिल्म की असफलता का सच क्या है?
अंखियों से गोली मारे की एक महत्वपूर्ण बात जरूर दर्ज है। फिल्म 1998 में बनकर तैयार हो गई थी, लेकिन चार साल बाद 2002 में रिलीज हुई। इतने लंबे अंतराल के बाद फिल्म का रिलीज होना अपने आप में उसके व्यावसायिक प्रदर्शन को प्रभावित करने वाला कारक हो सकता है। उपलब्ध स्रोत फिल्म के फ्लॉप होने की पुष्टि करते हैं।
लेकिन फिल्म के फ्लॉप होने को सिर्फ गोविंदा और निर्देशक के कथित विवाद का परिणाम मानना भी सही नहीं होगा।
और फिर गोविंदा का करियर?
गोविंदा के करियर की कहानी इससे कहीं ज्यादा लंबी और जटिल है। दूल्हे राजा के बाद भी उन्होंने कई सफल फिल्मों में काम किया। 1998 में ही बड़े मियां छोटे मियां आई, जबकि अगले साल हसीना मान जाएगी जैसी फिल्म सफल रही। उनके करियर में उतार-चढ़ाव जरूर आया, लेकिन इसे किसी एक घटना या कथित बददुआ से जोड़ना इतिहास को बहुत सरल बना देना होगा।
दरअसल, किसी अभिनेता के करियर का उतार कई कारणों से जुड़ा होता है। बदलता दर्शक वर्ग, फिल्मों का चुनाव, नई पीढ़ी के कलाकारों का आना, फिल्म उद्योग की बदलती अर्थव्यवस्था और समय के साथ बदलती लोकप्रियता—इन सबका असर पड़ता है।
बददुआ बनाम बॉलीवुड का सच
इस कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा यही है कि लोग आज भी इसे “बददुआ लग गई” वाली कहानी के तौर पर शेयर करते हैं। ऐसी कहानियां भावनात्मक होती हैं, इसलिए तेजी से वायरल होती हैं।
लेकिन किसी के करियर के उतार को किसी दूसरे व्यक्ति की बददुआ का नतीजा बताना विश्वास की बात हो सकती है, प्रमाणित तथ्य नहीं।
हरमेश मल्होत्रा और गोविंदा की पेशेवर साझेदारी जरूर दर्ज है। दूल्हे राजा उनकी सफल फिल्मों में शामिल रही और अंखियों से गोली मारे दोनों की अगली फिल्म थी। फिल्म के चार साल तक अटके रहने और बाद में फ्लॉप होने का तथ्य भी उपलब्ध है।
लेकिन सोशल मीडिया पर चल रही पूरी कहानी—शिमला के कथित 2 करोड़ के सेट से लेकर आर्थिक बर्बादी, मौत और पत्नी की बददुआ तक—को प्रमाणित इतिहास की तरह पेश करना फिलहाल उचित नहीं होगा।
असल सबक क्या है?
बॉलीवुड की दुनिया में सफलता जितनी तेज होती है, उतना ही तेज उसका उतार भी दिखाई दे सकता है। लेकिन हर उतार के पीछे कोई श्राप, बददुआ या एक व्यक्ति की गलती तलाशना सही तस्वीर नहीं देता।
गोविंदा आज भी अपने दौर के बेहद लोकप्रिय कलाकारों में गिने जाते हैं और दूल्हे राजा जैसी फिल्मों में उनका काम आज भी याद किया जाता है। दूसरी तरफ हरमेश मल्होत्रा का नाम हिंदी सिनेमा के उन निर्देशकों में आता है जिन्होंने कई लोकप्रिय फिल्मों का निर्देशन किया।
इसलिए इस कहानी को “बददुआ सच हो गई” कहने के बजाय एक ऐसी बॉलीवुड कहानी के रूप में देखना ज्यादा उचित है, जिसमें कुछ तथ्य दर्ज हैं और कुछ हिस्से अब भी सोशल मीडिया की अपुष्ट कथा का हिस्सा हैं।
क्योंकि बॉलीवुड में कहानी सिर्फ पर्दे पर नहीं बनती। कई बार पर्दे के पीछे की कहानी भी इतनी दिलचस्प बना दी जाती है कि सच और अफसाना अलग करना मुश्किल हो जाता है।





