पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर सियासी बहस तेज है। एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में मतदाता सूची से जुड़े फैसलों और प्रक्रियाओं पर कम से कम 14 बार आपत्तियां दर्ज कीं। रिपोर्ट में फॉर्म-6, मतदाता नाम हटाने और मतदाता डेटा के प्रबंधन जैसे मुद्दों का उल्लेख किया गया है।
1. 14 आपत्तियों की रिपोर्ट से बढ़ा विवाद
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों चुनाव आयुक्तों ने अलग-अलग मौकों पर लिखित टिप्पणियों और आपत्तियों के जरिए कुछ प्रक्रियाओं पर सवाल उठाए। इनमें मतदाता सूची प्रबंधन, फॉर्म-6 में बदलाव और डेटा तक पहुंच से जुड़े विषय शामिल बताए गए हैं। हालांकि, इन आपत्तियों का होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि SIR की प्रक्रिया में कोई अंतिम रूप से अवैध या गलत काम हुआ।
2. EC ने कहा, फैसले सर्वसम्मति से हुए
चुनाव आयोग ने रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि आयोग के भीतर सवाल, सुझाव, तकनीकी टिप्पणियां और आंतरिक जांच सामान्य निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा हैं। आयोग के मुताबिक SIR से जुड़े अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए और सभी आधिकारिक निर्णयों को कानूनी आधार प्राप्त है।
यानी विवाद का मुख्य बिंदु यह है कि क्या आंतरिक आपत्तियां अंतिम निर्णय से असहमति थीं या निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा भर थीं। आयोग इन्हें सुझाव और आंतरिक परीक्षण बता रहा है, जबकि रिपोर्ट में दर्ज आपत्तियों को अधिक गंभीर सवालों के रूप में पेश किया गया है।
3. दिलीप घोष ने SIR का बचाव किया
पश्चिम बंगाल के मंत्री दिलीप घोष ने कहा कि SIR पर अदालत में भी मामले गए, लेकिन उनके मुताबिक किसी दावे से यह साबित नहीं हुआ कि प्रक्रिया में कुछ गलत हुआ। उन्होंने विपक्ष पर भी राजनीतिक हमला किया और SIR को लेकर उठाए जा रहे सवालों को खारिज किया। यह उनका राजनीतिक पक्ष है, जबकि चुनाव आयोग की अपनी प्रतिक्रिया अलग से उपलब्ध है।
4. असली सवाल मतदाता सूची की शुद्धता का
SIR का घोषित उद्देश्य मतदाता सूची को अपडेट करना है, ताकि पात्र मतदाता छूटें नहीं और अपात्र व्यक्ति सूची में शामिल न रहें। चुनाव आयोग ने पहले भी SIR की प्रक्रिया को इसी उद्देश्य से जोड़ा है।
यहीं से सबसे महत्वपूर्ण सवाल निकलता है—नाम जोड़ने या हटाने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है, मतदाताओं को आपत्ति दर्ज कराने का पर्याप्त अवसर मिल रहा है या नहीं और हर निर्णय का रिकॉर्ड कितना स्पष्ट है।
5. SIR पर अब सियासी नहीं, प्रक्रिया की नजर
इस पूरे विवाद में तीन अलग-अलग स्तरों को अलग रखना जरूरी है। पहला, चुनाव आयुक्तों की आंतरिक टिप्पणियां। दूसरा, आयोग का यह कहना कि अंतिम फैसले सर्वसम्मत थे। तीसरा, विपक्ष की ओर से इन टिप्पणियों के आधार पर उठाए जा रहे सवाल।
इसलिए फिलहाल उपलब्ध जानकारी से यह निष्कर्ष निकालना अलग बात होगी कि SIR में अनियमितता साबित हो गई है। दस्तावेजों और आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर यह देखना अधिक महत्वपूर्ण है कि जिन बिंदुओं पर सवाल उठे, उन पर क्या जवाब और प्रक्रियात्मक सुधार किए गए।
SIR की बहस अब सिर्फ मतदाता सूची के पुनरीक्षण तक सीमित नहीं रह गई है। यह चुनाव आयोग की आंतरिक निर्णय प्रक्रिया, पारदर्शिता और मतदाता के अधिकारों से जुड़ा मुद्दा बन चुकी है। आयोग का कहना है कि अंतिम निर्णय सर्वसम्मत रहे, जबकि रिपोर्ट में आंतरिक आपत्तियों का उल्लेख है। यही अंतर इस विवाद का केंद्रीय बिंदु है।