भ्रूण लिंग परीक्षण पर सुप्रीम फैसला: पुलिस नहीं करेगी सीधे जांच, अधिकृत प्राधिकारी के हाथ में रहेगी कार्रवाई

भ्रूण लिंग परीक्षण पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: पुलिस नहीं करेगी सीधे जांच, अधिकृत प्राधिकारी के हाथ में रहेगी कार्रवाई

नई दिल्ली। भ्रूण के लिंग की अवैध जांच और कन्या भ्रूण हत्या जैसी गंभीर सामाजिक बुराई पर रोक लगाने वाले PCPNDT Act को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम कानूनी स्थिति साफ कर दी है। कोर्ट ने कहा है कि इस कानून के तहत दर्ज मामलों की पुलिस स्वतंत्र रूप से FIR दर्ज कर मुख्य जांच एजेंसी के तौर पर कार्रवाई नहीं कर सकती। ऐसे मामलों की जांच और शिकायत की वैधानिक जिम्मेदारी कानून के तहत नियुक्त Appropriate Authority यानी सक्षम/उपयुक्त प्राधिकारी की होगी। पुलिस जरूरत पड़ने पर उसकी सहायता कर सकती है, लेकिन जांच की मूल जिम्मेदारी अपने हाथ में नहीं ले सकती।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भ्रूण के लिंग की जांच से जुड़े मामलों में पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की भूमिका को लेकर लंबे समय से व्यावहारिक और कानूनी स्तर पर भ्रम की स्थिति बनी रही है। कई मामलों में पुलिस टीमों ने स्वास्थ्य विभाग अथवा जिला प्रशासन के साथ मिलकर अस्पतालों और क्लीनिकों में कार्रवाई की, FIR दर्ज की और जांच के बाद चार्जशीट अदालत में पेश की। अब सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल पुलिस की जांच के आधार पर PCPNDT Act के अपराध में मजिस्ट्रेट संज्ञान नहीं ले सकता।

क्या है सुप्रीम कोर्ट का फैसला?

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिस्वर सिंह की पीठ ने कहा कि PCPNDT Act अपने क्षेत्र में एक विशेष कानून है और इसमें अपराध की जांच, शिकायत और अदालत द्वारा संज्ञान लेने के लिए विशेष प्रक्रिया निर्धारित है। इसलिए सामान्य आपराधिक प्रक्रिया को इस विशेष कानून की निर्धारित व्यवस्था के स्थान पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पुलिस द्वारा की गई जांच के आधार पर दाखिल चार्जशीट पर मजिस्ट्रेट PCPNDT Act के अपराध का संज्ञान नहीं ले सकता।

इसका सीधा अर्थ यह है कि अब केवल FIR दर्ज कर देना और पुलिस जांच शुरू कर देना पर्याप्त नहीं होगा। कानून में जिस Appropriate Authority को अधिकार दिया गया है, उसे निर्धारित प्रक्रिया के तहत शिकायत करनी होगी और उसी के आधार पर कानूनी कार्रवाई आगे बढ़ेगी।

पुलिस की भूमिका पूरी तरह खत्म नहीं

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का अर्थ यह नहीं है कि भ्रूण लिंग परीक्षण के मामलों में पुलिस की भूमिका पूरी तरह समाप्त हो गई है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि Appropriate Authority जरूरत पड़ने पर पुलिस की सहायता ले सकती है। पुलिस आरोपी का पता लगाने, सुरक्षा उपलब्ध कराने, डिजिटल या फोरेंसिक सहायता देने अथवा घटनास्थल को सुरक्षित रखने जैसे काम कर सकती है। लेकिन ऐसी सहायता का अर्थ यह नहीं होगा कि पुलिस PCPNDT Act के अपराध की मुख्य जांच अपने हाथ में ले ले।

यानी अब भूमिका का एक स्पष्ट विभाजन सामने आया है—PCPNDT Act का अपराध है तो Appropriate Authority जांच करेगी, जबकि अन्य स्वतंत्र आपराधिक अपराध सामने आता है तो पुलिस उस अपराध की जांच कर सकती है।

एक ही घटना में दो अलग कानूनी रास्ते

सुप्रीम कोर्ट के फैसले की सबसे महत्वपूर्ण बातों में से एक यह है कि एक ही घटना से अलग-अलग अपराध सामने आ सकते हैं। उदाहरण के लिए यदि किसी क्लीनिक में अवैध भ्रूण लिंग परीक्षण के साथ कोई अलग आपराधिक अपराध भी सामने आता है, तो PCPNDT Act से संबंधित हिस्से की कार्रवाई Appropriate Authority करेगी, जबकि अलग अपराध की जांच पुलिस कर सकती है।

इससे जांच एजेंसियों के बीच अधिकार क्षेत्र को लेकर विवाद कम होने की उम्मीद है। साथ ही डॉक्टरों, अस्पताल संचालकों और डायग्नोस्टिक सेंटरों के खिलाफ कार्रवाई में प्रक्रिया का पालन सुनिश्चित करना भी जरूरी होगा।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले से जुड़ा मामला

यह कानूनी स्थिति अचानक सामने नहीं आई है। इससे पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट भी कह चुका था कि PCPNDT Act के तहत लिंग निर्धारण से जुड़े अपराधों की जांच और FIR की प्रक्रिया पुलिस के सामान्य अधिकार क्षेत्र में नहीं आती। हाईकोर्ट ने PCPNDT Act को एक विशेष कानून बताते हुए कहा था कि इसमें जांच, तलाशी, जब्ती और शिकायत की व्यवस्था कानून के भीतर ही निर्धारित है।

अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने इस कानूनी व्याख्या को राष्ट्रीय स्तर पर स्पष्टता प्रदान कर दी है।

अस्पतालों पर कार्रवाई को लेकर क्या बदलेगा?

इस फैसले का सबसे बड़ा असर अस्पतालों, अल्ट्रासाउंड सेंटरों और डायग्नोस्टिक क्लीनिकों पर होने वाली कार्रवाई की प्रक्रिया पर दिखाई दे सकता है। यदि किसी सेंटर पर भ्रूण का लिंग बताने का आरोप है, तो कार्रवाई कानून में निर्धारित Appropriate Authority की निगरानी और प्रक्रिया के तहत होनी चाहिए।

हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि अवैध लिंग परीक्षण करने वालों को राहत मिल गई है। PCPNDT Act का मूल उद्देश्य ही प्रसव पूर्व तकनीक के दुरुपयोग पर रोक लगाना और भ्रूण के लिंग चयन के कारण होने वाली कन्या भ्रूण हत्या को रोकना है। सुप्रीम कोर्ट के पहले के मामलों में भी इस कानून के सामाजिक उद्देश्य और लिंग चयन पर रोक की गंभीरता को रेखांकित किया गया है।

कार्रवाई में प्रक्रिया सबसे महत्वपूर्ण

सुप्रीम कोर्ट का संदेश मूल रूप से यही है कि गंभीर अपराध के खिलाफ कार्रवाई जरूरी है, लेकिन कार्रवाई भी कानून में निर्धारित प्रक्रिया के मुताबिक ही होनी चाहिए। PCPNDT Act में विशेष प्राधिकारी को जिम्मेदारी देने के पीछे वजह यह है कि ऐसे मामले तकनीकी और मेडिकल प्रकृति के होते हैं। रिकॉर्ड, अल्ट्रासाउंड मशीन, फॉर्म, रजिस्टर, रेफरल रिकॉर्ड और मेडिकल दस्तावेजों की जांच में विशेषज्ञता की जरूरत होती है।

अब प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के लिए चुनौती यह होगी कि वे Appropriate Authorities को पर्याप्त संसाधन, तकनीकी विशेषज्ञता और कानूनी सहायता उपलब्ध कराएं। वहीं पुलिस को भी यह स्पष्ट करना होगा कि वह कब PCPNDT मामले में सहायक भूमिका निभाए और कब किसी स्वतंत्र आपराधिक अपराध की जांच करे।

बड़ा संदेश: कानून सख्त भी, प्रक्रिया स्पष्ट भी

भ्रूण लिंग परीक्षण पर सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला दो स्तरों पर महत्वपूर्ण है। पहला, यह अवैध लिंग परीक्षण के खिलाफ कानून की प्रभावशीलता को कमजोर नहीं करता, बल्कि उसकी निर्धारित प्रक्रिया को स्पष्ट करता है। दूसरा, यह जांच एजेंसियों के अधिकार क्षेत्र की सीमा तय करता है ताकि किसी आरोपी के खिलाफ ऐसी कार्रवाई न हो जिसे कानून की प्रक्रिया का पालन किए बिना आगे बढ़ाया गया हो।

अब PCPNDT Act के मामलों में सबसे अहम भूमिका Appropriate Authority की होगी। पुलिस सुरक्षा, तकनीकी और अन्य आवश्यक सहायता दे सकती है, लेकिन कानून के तहत मुख्य जांच की जिम्मेदारी उसी प्राधिकारी की रहेगी।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला अवैध भ्रूण लिंग परीक्षण के खिलाफ लड़ाई में एक नया कानूनी अध्याय खोलता है। संदेश साफ है—लिंग परीक्षण पर कानून की रोक बरकरार है, लेकिन कार्रवाई कानून में तय प्रक्रिया से ही होगी। अब अस्पतालों पर छापे से लेकर FIR, जांच और अदालत में शिकायत तक हर कदम को PCPNDT Act की वैधानिक व्यवस्था के अनुरूप करना होगा।

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