महंगी होती मिठास:एथेनॉल में गन्ने के इस्तेमाल से घटा स्टॉक…40% तक बढ़े दाम …जानें चीनी के बाजार की चाल?  

चीनी महंगी होने की बड़ी वजह क्या है? एथेनॉल में गन्ने के इस्तेमाल से घटा स्टॉक, 40% तक बढ़े दाम

 

चीनी की मिठास इन दिनों आम आदमी की जेब पर भारी पड़ रही है।  आंकड़ों के मुताबिक पिछले तीन महीनों में चीनी के दाम करीब 40 प्रतिशत तक बढ़ गए हैं। भोपाल में खुदरा बाजार में चीनी की कीमत करीब 70 रुपये प्रति किलो तक पहुंचने की बात सामने आई है, जबकि थोक बाजार में यही कीमत लगभग 66-67 रुपये किलो बताई गई है। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि चीनी महंगी क्यों हुई, बल्कि बड़ा सवाल यह है कि जिस देश में गन्ने का उत्पादन बड़ी मात्रा में होता है, वहां चीनी की उपलब्धता पर दबाव क्यों बन गया?

इस पूरी तस्वीर के केंद्र में गन्ने का एथेनॉल उत्पादन में बढ़ता इस्तेमाल, चीनी का घटता स्टॉक और घरेलू बाजार में मांग-आपूर्ति का अंतर दिखाई देता है।

तीन महीने में चीनी 40% महंगी

छवि में दिए आंकड़ों के अनुसार करीब तीन महीने पहले चीनी की कीमत 48 रुपये प्रति किलो थी, जो अब बढ़कर 67 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है। यानी करीब 19 रुपये की वृद्धि हुई है। प्रतिशत के हिसाब से यह लगभग 39.58 प्रतिशत की बढ़ोतरी है।

इस महंगाई का असर सिर्फ चीनी तक सीमित नहीं है। इसी अवधि में गुड़ के दाम 50 से बढ़कर 65 रुपये किलो हो गए। चावल की कीमत 25 से 29 रुपये किलो और मक्के के आटे की कीमत 36 से 40 रुपये किलो तक पहुंची। इडली रवा, पशु आहार और पोल्ट्री फीड की कीमतों में भी वृद्धि दर्ज की गई।

यानी खाद्य महंगाई की यह कहानी केवल चीनी की कीमत बढ़ने की कहानी नहीं है, बल्कि कच्चे माल, उत्पादन लागत और आपूर्ति की पूरी श्रृंखला पर दबाव की ओर संकेत करती है।

एथेनॉल बना बड़ा फैक्टर

भारत ने पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण बढ़ाने की नीति के तहत गन्ने और उससे बनने वाले उत्पादों का एथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल बढ़ाया है। इसका उद्देश्य एक तरफ पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता घटाना और दूसरी तरफ किसानों के लिए गन्ने की बेहतर कीमत सुनिश्चित करना है।

लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी है।

जब गन्ने या चीनी से जुड़े संसाधनों का एक हिस्सा एथेनॉल उत्पादन की ओर जाता है तो चीनी बनाने के लिए उपलब्ध कच्चे माल पर दबाव पड़ सकता है। अखबार में दिए आंकड़ों के मुताबिक इस सीजन में करीब 25 लाख टन चीनी-लायक गन्ना एथेनॉल उत्पादन की ओर गया। यही वह बिंदु है, जिसने चीनी के घरेलू स्टॉक और कीमतों को लेकर चिंता बढ़ाई है।

यहां एक महत्वपूर्ण बात समझनी होगी—एथेनॉल नीति अपने आप में चीनी महंगी होने की अकेली वजह नहीं है। उत्पादन, मौसम, गन्ने की उपलब्धता, मिलों की पेराई, घरेलू मांग और सरकारी नीतियां सभी मिलकर कीमत तय करती हैं। लेकिन मौजूदा स्थिति में एथेनॉल के लिए गन्ने का इस्तेमाल आपूर्ति पर दबाव बढ़ाने वाला महत्वपूर्ण कारक जरूर बन सकता है।

सबसे बड़ी चिंता: घटता ओपनिंग स्टॉक

पिछले साल चीनी का ओपनिंग स्टॉक करीब 47 लाख टन था, जबकि इस बार यह घटकर लगभग 32 लाख टन रहने का अनुमान है।यानी शुरुआती स्टॉक में करीब 15 लाख टन की कमी है।  यही अंतर बाजार में मनोवैज्ञानिक दबाव पैदा करता है। जब व्यापारियों और मिलों को लगता है कि आने वाले महीनों में उपलब्ध स्टॉक सीमित हो सकता है, तो कीमतों पर तेजी का दबाव बनता है। त्योहारी सीजन और घरेलू खपत बढ़ने पर यह दबाव और ज्यादा दिखाई दे सकता है।

सरकार के सामने दोहरी चुनौती

सरकार के लिए यह स्थिति आसान नहीं है। एक तरफ एथेनॉल मिश्रण का लक्ष्य है, जो पेट्रोलियम आयात घटाने और ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण है। दूसरी तरफ घरेलू बाजार में चीनी की पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखना भी जरूरी है। 10 लाख टन चीनी के शुल्क-मुक्त आयात और थोक विक्रेताओं पर स्टॉक लिमिट जैसे संभावित/प्रस्तावित कदमों का उल्लेख किया गया है।

अगर घरेलू उत्पादन और उपलब्ध स्टॉक मांग को पूरा करने में कमजोर पड़ते हैं तो आयात एक तत्काल समाधान बन सकता है। इससे बाजार में अतिरिक्त चीनी आएगी और कीमतों पर दबाव कम हो सकता है। लेकिन ज्यादा आयात का असर घरेलू चीनी मिलों और किसानों के हितों पर भी पड़ सकता है।

यही सरकार के सामने असली संतुलन है—उपभोक्ता को सस्ती चीनी मिले, लेकिन गन्ना किसानों और चीनी मिलों के आर्थिक हित भी प्रभावित न हों।

महंगी चीनी का असर कहां-कहां?

चीनी महंगी होने का असर सीधे घरेलू बजट पर पड़ता है, लेकिन इसका प्रभाव इससे कहीं व्यापक है। मिठाई, बेकरी, बिस्किट, आइसक्रीम, शीतल पेय, होटल-रेस्तरां और अन्य खाद्य उत्पादों की लागत बढ़ सकती है।

त्योहारी सीजन में इसका असर और स्पष्ट हो सकता है। मिठाई की दुकानों के लिए चीनी उत्पादन लागत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यदि चीनी लंबे समय तक 60-70 रुपये किलो के आसपास रहती है तो इसका कुछ हिस्सा अंतिम उपभोक्ता तक पहुंचना स्वाभाविक है।

इसके अलावा गुड़ की कीमत बढ़ने से यह विकल्प भी बहुत सस्ता नहीं रह जाता। यानी उपभोक्ता के पास कीमत नियंत्रित करने के लिए विकल्प सीमित हो सकते हैं।

क्या एथेनॉल नीति पर सवाल उठेंगे?

मौजूदा परिस्थितियां एथेनॉल नीति की समीक्षा की बहस को जरूर तेज कर सकती हैं। सवाल यह नहीं होना चाहिए कि एथेनॉल जरूरी है या नहीं—ऊर्जा सुरक्षा और पेट्रोलियम आयात घटाने के लिहाज से इसका महत्व स्पष्ट है। असल सवाल यह है कि चीनी की घरेलू जरूरत, किसानों की आय और एथेनॉल की जरूरत के बीच सही संतुलन कैसे बनाया जाए।

यदि चीनी उत्पादन पर्याप्त है तो गन्ने का एक हिस्सा एथेनॉल में जाने से बाजार पर बड़ा दबाव नहीं पड़ेगा। लेकिन जब उत्पादन घटे और शुरुआती स्टॉक भी कम हो, तब एथेनॉल के लिए उपलब्ध संसाधनों का आवंटन सीधे खाद्य महंगाई से जुड़ सकता है। आने वाले महीनों में तीन चीजें सबसे महत्वपूर्ण रहेंगी—चीनी का वास्तविक उत्पादन, घरेलू खपत और सरकार की आयात नीति। यदि उत्पादन अनुमान के मुताबिक रहा और आयात के जरिए बाजार में पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध करा दिया गया तो कीमतों में स्थिरता आ सकती है।

लेकिन यदि उत्पादन अनुमान से कम रहता है और मांग बढ़ती है, तो चीनी की कीमतों पर दबाव बना रह सकता है। मौजूदा चीनी महंगाई को सिर्फ बाजार की सामान्य तेजी मानना सही नहीं होगा। घटता ओपनिंग स्टॉक, एथेनॉल के लिए गन्ने का इस्तेमाल, उत्पादन और मांग के बीच संतुलन तथा सरकारी नीतियां—इन सभी ने मिलकर परिस्थितियां बनाई हैं।

भारत के लिए चुनौती अब यही है कि एथेनॉल ब्लेंडिंग की रफ्तार भी बनी रहे और आम आदमी की रसोई में चीनी की कीमत भी नियंत्रण से बाहर न जाए। आने वाले सीजन में सरकार के फैसले यह तय करेंगे कि चीनी की मिठास बाजार में लौटती है या महंगाई की कड़वाहट कुछ और समय तक बनी रहती है।

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