राजस्थान धौलपुर शहर की पहचान और ऐतिहासिक धरोहर माने जाने वाले घंटाघर ने करीब 31 साल बाद एक बार फिर समय बताना शुरू कर दिया है। वर्ष 1995 से खामोश पड़ी घंटाघर की घड़ी अब फिर से चलने लगी है। लंबे इंतजार के बाद जब घंटाघर की घंटी की आवाज शहरवासियों के कानों तक पहुंची तो लोगों के चेहरे खुशी से खिल उठे। यह सिर्फ एक घड़ी के दोबारा चलने की खबर नहीं, बल्कि धौलपुर की ऐतिहासिक विरासत के फिर से जीवंत होने का मौका है। जिला कलेक्टर श्रीनिधि बीटी और नगर परिषद आयुक्त विष्णु परमार के प्रयासों से घंटाघर की घड़ी को दुरुस्त कर दोबारा शुरू किया गया है।
धौलपुर का ऐतिहासिक घंटाघर लंबे समय से शहर की पहचान का अहम हिस्सा रहा है। बाजार और शहर के प्रमुख हिस्से में स्थित यह घंटाघर दशकों से लोगों को समय का एहसास कराता रहा, लेकिन वर्ष 1995 के बाद इसकी घड़ी ने चलना बंद कर दिया। धीरे-धीरे घड़ी की सुइयां थम गईं और घंटी की आवाज भी पूरी तरह बंद हो गई। इसके बाद कई वर्षों तक यह ऐतिहासिक इमारत केवल एक धरोहर के रूप में खड़ी रही।
समय बीतता गया, लेकिन घंटाघर को फिर से उसी पुराने स्वरूप में देखने की शहरवासियों की उम्मीद बनी रही। आखिरकार जिला प्रशासन और नगर परिषद ने इस ऐतिहासिक धरोहर को नया जीवन देने की दिशा में कदम उठाया। जिला कलेक्टर श्रीनिधि बीटी और नगर परिषद आयुक्त विष्णु परमार के प्रयासों से घंटाघर की बंद पड़ी घड़ी को ठीक कराने का काम शुरू कराया गया।
घड़ी की तकनीकी खराबी को दूर करने के लिए दिल्ली से विशेषज्ञ मिस्त्रियों को बुलाया गया। विशेषज्ञों ने घंटाघर की घड़ी की बारीकी से जांच की और लंबे समय से बंद पड़े सिस्टम को दुरुस्त किया। कई वर्षों तक बंद रहने के कारण घड़ी को दोबारा चालू करना आसान काम नहीं था, लेकिन विशेषज्ञों की मेहनत और प्रशासन की निगरानी के बाद आखिरकार घड़ी ने फिर से चलना शुरू कर दिया।
नगर परिषद आयुक्त विष्णु परमार के मुताबिक घंटाघर की घड़ी को दुरुस्त करने और इसे दोबारा संचालित करने के कार्य पर करीब 6 लाख रुपये खर्च किए गए हैं। घड़ी के चालू होने के साथ ही अब घंटाघर की पुरानी पहचान भी लौटती नजर आ रही है। जैसे ही घंटाघर की घंटी की आवाज शहर में गूंजी, लोगों में उत्साह देखने को मिला। बुजुर्गों के लिए यह पल पुरानी यादों को ताजा करने वाला रहा, जबकि नई पीढ़ी के लिए शहर की ऐतिहासिक धरोहर को नए रूप में देखने का मौका मिला।
घंटाघर को केवल घड़ी तक सीमित नहीं रखा जा रहा, बल्कि इसके आसपास के क्षेत्र का भी सौंदर्यीकरण कराया जा रहा है। नगर परिषद की ओर से घंटाघर पर आकर्षक सजावटी लाइटिंग लगाई गई है। रात होते ही रंग-बिरंगी रोशनी से जगमगाता घंटाघर बेहद खूबसूरत दिखाई देता है। रोशनी के बीच घंटाघर की ऐतिहासिक बनावट राहगीरों और स्थानीय लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच रही है।
घंटाघर परिसर को आकर्षक बनाने के लिए नगर परिषद की ओर से कई अन्य काम भी कराए जा रहे हैं। यहां सेल्फी प्वाइंट तैयार किया जा रहा है, ताकि शहरवासी और यहां आने वाले लोग इस ऐतिहासिक स्थल के साथ तस्वीरें ले सकें। इसके अलावा स्टील रेलिंग, सजावटी गमले और अन्य सौंदर्यीकरण कार्य भी कराए जा रहे हैं।
नगर परिषद का उद्देश्य घंटाघर को सिर्फ पुराने समय की निशानी के तौर पर संरक्षित करना नहीं, बल्कि इसे शहर के नए आकर्षण के रूप में विकसित करना भी है। इसके लिए आसपास के क्षेत्र को व्यवस्थित और सुंदर बनाने पर जोर दिया जा रहा है। सजावटी लाइटिंग के बाद शाम के समय घंटाघर का नजारा और भी आकर्षक हो गया है।
धौलपुर के लिए यह घंटाघर महज एक इमारत या समय बताने वाली घड़ी नहीं है। इससे शहर के लोगों की भावनाएं और पुरानी यादें जुड़ी हुई हैं। दशकों तक घंटाघर की आवाज सुनने वाले लोगों के लिए इसकी घंटी का दोबारा बजना किसी पुराने परिचित की वापसी जैसा है। वहीं युवाओं के लिए यह शहर की विरासत से जुड़ने का एक नया माध्यम बन रहा है।
प्रशासन और नगर परिषद की ओर से घंटाघर के रखरखाव और सौंदर्यीकरण की लगातार मॉनिटरिंग की जा रही है। कोशिश है कि जिस ऐतिहासिक धरोहर को वर्षों बाद फिर से जीवंत किया गया है, उसकी नियमित देखभाल भी सुनिश्चित हो। घड़ी लगातार चलती रहे और घंटाघर की भव्यता आने वाले वर्षों तक कायम रहे, इसके लिए आवश्यक व्यवस्थाओं पर भी ध्यान दिया जा रहा है।
31 साल तक खामोश रही घंटाघर की घड़ी अब फिर समय बता रही है और उसकी घंटी एक बार फिर धौलपुर की गलियों में सुनाई दे रही है। छह लाख रुपये की लागत से विशेषज्ञों की मदद से दुरुस्त हुई यह घड़ी शहर की पुरानी यादों को वापस लेकर आई है। सजावटी रोशनी, सेल्फी प्वाइंट और सौंदर्यीकरण के साथ घंटाघर अब धौलपुर की ऐतिहासिक पहचान के साथ-साथ नए आकर्षण के रूप में भी अपनी जगह बना रहा है।