नारी शक्ति से विकसित भारत तक: लाभार्थी से नेतृत्वकर्ता बनने की बदलती कहानी

Nari Shakti

भारत की विकास यात्रा में महिलाओं की भूमिका अब केवल सरकारी योजनाओं की लाभार्थी तक सीमित नहीं रह गई है। बदलती तस्वीर यह संकेत दे रही है कि महिला केंद्रित नीतियां अब स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षा से आगे बढ़कर आर्थिक आत्मनिर्भरता, उद्यमिता, डिजिटल समावेश और नेतृत्व का आधार बन रही हैं। यही बदलाव विकसित भारत@2047 के लक्ष्य में नारी शक्ति को केंद्रीय भूमिका देता है।

अगर इस पूरी तस्वीर को एक साथ देखा जाए तो सरकार की महिला केंद्रित योजनाओं में एक स्पष्ट लाइफ-साइकिल अप्रोच दिखाई देती है—बेटी के जन्म और स्वास्थ्य से शुरुआत, शिक्षा और कौशल तक विस्तार, फिर बैंक खाते और ऋण के जरिए आर्थिक भागीदारी और अंततः पंचायत से संसद और रक्षा क्षेत्र तक नेतृत्व।

जन्म से मातृत्व तक… सुरक्षा की पहली सीढ़ी

महिला सशक्तिकरण की पहली शर्त है—स्वस्थ जीवन। बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ ने बालिकाओं के अस्तित्व, शिक्षा और सम्मान को नीति के केंद्र में रखा। एनएफएचएस-5 में प्रति 1,000 पुरुषों पर 1,020 महिलाओं का लिंगानुपात दर्ज होना इस दिशा में हुए बदलाव की ओर संकेत करता है, हालांकि इसे केवल एक योजना का प्रत्यक्ष परिणाम मानना उचित नहीं होगा।

मातृत्व स्वास्थ्य के मोर्चे पर प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना, प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान और जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम जैसी योजनाओं ने गर्भवती महिलाओं के लिए आर्थिक सहायता, प्रसव-पूर्व जांच और संस्थागत प्रसव की पहुंच बढ़ाने की कोशिश की है।

पीएमएमवीवाई के तहत 31 जुलाई 2026 तक 5.13 करोड़ लाभार्थियों का नामांकन और 4.37 करोड़ लाभार्थियों को भुगतान होना इसकी व्यापक पहुंच को दर्शाता है। वहीं पीएमएसएमए के तहत करोड़ों गर्भवती महिलाओं की जांच और उच्च जोखिम वाली गर्भावस्थाओं की डिजिटल पहचान यह बताती है कि मातृ स्वास्थ्य व्यवस्था अब सिर्फ इलाज नहीं, बल्कि समय रहते जोखिम की पहचान पर भी जोर दे रही है।

नतीजों की तस्वीर भी महत्वपूर्ण है। पहली तिमाही में प्रसव-पूर्व जांच कराने वाली महिलाओं का अनुपात 58.6 प्रतिशत से बढ़कर 76.2 प्रतिशत और चार या उससे अधिक प्रसव-पूर्व जांच कराने वाली महिलाओं का अनुपात 51.2 प्रतिशत से बढ़कर 65.2 प्रतिशत हुआ है। अस्पताल में होने वाले जन्म भी 78.9 प्रतिशत से बढ़कर 90.6 प्रतिशत हुए हैं।

शिक्षा से आगे—अब लक्ष्य अवसरों की बराबरी

महिला सशक्तिकरण का अगला पड़ाव शिक्षा है। लेकिन अब सवाल केवल यह नहीं है कि लड़कियां स्कूल पहुंच रही हैं या नहीं। असली सवाल है—क्या वे पढ़ाई जारी रख रही हैं, उच्च शिक्षा में पहुंच रही हैं और रोजगार के लिए तैयार हो रही हैं?

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत जेंडर इन्क्लूजन फंड और समग्र शिक्षा जैसे प्रावधान इसी सोच को आगे बढ़ाते हैं। 2025-26 में देश में 11.96 करोड़ लड़कियों का स्कूलों में नामांकन और कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों में छात्राओं की संख्या का 6.07 लाख से बढ़कर 7.58 लाख होना इस विस्तार की तस्वीर पेश करता है।

उच्च शिक्षा में भी महिलाओं की संख्या बढ़ी है। 2014-15 में लगभग 1.57 करोड़ से महिलाओं का उच्च शिक्षा नामांकन 2022-23 में 2.18 करोड़ तक पहुंचा। यानी करीब 60 लाख से अधिक की वृद्धि।

यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उच्च शिक्षा केवल डिग्री नहीं देती—यह महिला के लिए रोजगार, निर्णय लेने और आर्थिक स्वतंत्रता के विकल्पों का विस्तार करती है।

STEM में बढ़ती बेटियां बदल रही हैं तस्वीर

भारत की नई अर्थव्यवस्था विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग और गणित यानी STEM पर आधारित है। इसलिए महिला सशक्तिकरण का असली परीक्षण यह भी है कि इन क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी कितनी बढ़ती है।

विज्ञान ज्योति योजना के जरिए मार्च 2026 तक 300 जिलों में 1.12 लाख से अधिक लड़कियों तक पहुंच बनाई गई। IIT और NIT में अतिरिक्त सीटों के जरिए महिलाओं की भागीदारी को 10 प्रतिशत से कम स्तर से 20 प्रतिशत से अधिक तक ले जाने की कोशिश हुई है।

2024-25 में STEM विषयों में UGC-NET-JRF स्कॉलर्स में महिलाओं की हिस्सेदारी 53 प्रतिशत से अधिक होना संकेत देता है कि उच्च स्तरीय शोध और अकादमिक क्षेत्र में भी महिलाएं अपनी जगह मजबूत कर रही हैं।

कौशल से कमाई तक—सशक्तिकरण का सबसे बड़ा मोड़

शिक्षा के बाद अगला सवाल रोजगार और आय का है। प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना में लगभग 45 प्रतिशत लाभार्थी महिलाएं हैं। पीएमकेवीवाई के अलग-अलग चरणों में करोड़ों उम्मीदवारों को प्रशिक्षण दिया गया है। लेकिन कौशल तभी सशक्तिकरण बनता है, जब वह आय में बदले। इसी बिंदु पर स्वयं सहायता समूहों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन ने महिलाओं को समूह आधारित आर्थिक गतिविधियों से जोड़ा। बैंक सखियों के नेटवर्क और बैंक क्रेडिट की बड़ी मात्रा ने ग्रामीण महिलाओं को औपचारिक वित्तीय व्यवस्था के करीब लाया है।

लखपति दीदी मॉडल इसी परिवर्तन को एक स्पष्ट आर्थिक लक्ष्य देता है—महिला की सालाना आय कम से कम एक लाख रुपये तक पहुंचाना। 31 मार्च 2026 तक करोड़ों एसएचजी सदस्यों तक इसकी पहुंच और संभावित लखपति दीदियों का बड़ा नेटवर्क बताता है कि महिला सशक्तिकरण अब सिर्फ सामाजिक नारे से आगे निकलकर आय आधारित मॉडल बन रहा है।

बैंक खाते से बिजनेस तक

जनधन योजना ने महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण की बुनियाद मजबूत की। 12 अगस्त 2026 तक 58.90 करोड़ जनधन खातों में से 32.68 करोड़ खाते महिलाओं के नाम पर होना वित्तीय समावेशन की व्यापकता दर्शाता है। इसके बाद मुद्रा योजना आती है, जहां मंजूर ऋणों में लगभग दो-तिहाई महिला उद्यमियों को दिए जाने का आंकड़ा सामने आता है। इसका अर्थ है कि महिला अब केवल बचतकर्ता नहीं, बल्कि ऋण लेकर कारोबार शुरू करने वाली उद्यमी भी बन रही है। इसी कड़ी में स्वनिधि, वूमनिया, स्टार्ट-अप विलेज एंटरप्रेन्योरशिप प्रोग्राम और शी-मार्ट जैसे मॉडल बाजार से जुड़ने के नए रास्ते खोलते हैं।

नमो ड्रोन दीदी इस बदलाव का शायद सबसे प्रतीकात्मक उदाहरण है। खेतों में ड्रोन उड़ाती ग्रामीण महिला की तस्वीर यह बताती है कि तकनीक और ग्रामीण महिला उद्यमिता अब एक-दूसरे से अलग नहीं हैं।

सम्मान सिर्फ सुरक्षा से नहीं, जीवन स्तर से भी

महिला की गरिमा का सीधा संबंध उसके घर, पानी, स्वच्छ ईंधन, शौचालय और स्वास्थ्य से है। प्रधानमंत्री आवास योजना में महिलाओं के नाम पर घरों का बड़ा हिस्सा होना उन्हें परिवार की संपत्ति में औपचारिक हिस्सेदारी देता है। यानी महिला सशक्तिकरण का अर्थ सिर्फ कमाई नहीं, बल्कि घर में उसका सामाजिक और आर्थिक दर्जा मजबूत होना भी है। आयुष्मान भारत में महिलाओं को बड़ी संख्या में आयुष्मान कार्ड जारी होना और महिला मरीजों की बड़ी संख्या में अस्पताल में भर्ती होना स्वास्थ्य सुरक्षा के बढ़ते कवरेज को दर्शाता है। वहीं सक्षम आंगनवाड़ी और पोषण 2.0 गर्भवती महिलाओं, स्तनपान कराने वाली माताओं और किशोरियों को पोषण सुरक्षा से जोड़ता है।

डिजिटल युग में महिला की नई पहचान

डिजिटल समावेश अगला बड़ा बदलाव है। बैंकिंग, स्वास्थ्य रिकॉर्ड, सरकारी लाभ और बाजार तक डिजिटल पहुंच ने महिला के लिए अवसरों का दायरा बढ़ाया है।

आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन के तहत करोड़ों स्वास्थ्य रिकॉर्ड डिजिटल रूप से जुड़े हैं। दूसरी तरफ डिजिटल मार्केटिंग, साइबर सुरक्षा और AI आधारित सेवाओं में किशोरियों को प्रशिक्षित करने वाली नव्या जैसी पहलें संकेत देती हैं कि आने वाली महिला शक्ति सिर्फ पारंपरिक रोजगार तक सीमित नहीं रहेगी।

सुरक्षा से आगे—निर्णय लेने की ताकत

महिला सशक्तिकरण की अंतिम कसौटी है—क्या महिला अपने जीवन और समाज से जुड़े फैसलों में निर्णायक भूमिका निभा रही है? पंचायती राज में लगभग 14.5 लाख महिला निर्वाचित प्रतिनिधियों की मौजूदगी इस बदलाव की बड़ी तस्वीर है। यह आंकड़ा बताता है कि स्थानीय शासन में महिला प्रतिनिधित्व अब अपवाद नहीं, बल्कि व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। नारी शक्ति वंदन अधिनियम ने संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के 33 प्रतिशत आरक्षण का संवैधानिक ढांचा तैयार किया है। इसका लागू होना परिसीमन और संबंधित संवैधानिक प्रक्रिया से जुड़ा है, लेकिन राजनीतिक प्रतिनिधित्व की दिशा में यह एक बड़ा नीतिगत बदलाव है। रक्षा क्षेत्र में NDA से महिला कैडेटों का पास आउट होना भी प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण है। यह उस पारंपरिक धारणा को चुनौती देता है कि कुछ क्षेत्र महिलाओं के लिए नहीं हैं।

असली चुनौती अब आंकड़ों से आगे की है

हालांकि इन उपलब्धियों के बीच कुछ सवाल अभी भी कायम हैं। योजनाओं की पहुंच और वास्तविक सशक्तिकरण में अंतर होता है। बैंक खाता होना और बैंकिंग निर्णय लेना अलग बातें हैं। प्रशिक्षण प्राप्त करना और स्थायी रोजगार मिलना अलग बातें हैं। स्वयं सहायता समूह का सदस्य होना और नियमित रूप से एक लाख रुपये की आय अर्जित करना भी एक ही बात नहीं है। इसलिए अगले चरण की नीति का फोकस केवल कितने लाभार्थी पर नहीं, बल्कि कितनी महिलाओं की आय बढ़ी, कितने उद्यम टिके, कितनी महिलाएं औपचारिक रोजगार में आईं और कितनी निर्णय लेने की स्थिति में पहुंचीं—इन परिणामों पर होना चाहिए।

लाभार्थी से नेतृत्वकर्ता तक

पूरी तस्वीर को देखें तो महिला केंद्रित विकास मॉडल तीन चरणों में दिखाई देता है—पहले सुरक्षा, फिर अवसर और अंततः नेतृत्व। स्वास्थ्य और पोषण ने जीवन की शुरुआत को सुरक्षित करने की कोशिश की। शिक्षा और कौशल ने अवसरों का रास्ता खोला। जनधन, मुद्रा, स्वयं सहायता समूह और लखपति दीदी जैसे कार्यक्रमों ने आर्थिक भागीदारी का आधार बनाया। आवास, पानी और स्वच्छ ईंधन ने गरिमा को मजबूत किया। पंचायतों, संसद और रक्षा क्षेत्र में बढ़ती भागीदारी ने नेतृत्व का नया क्षितिज खोला। यही इस पूरी विकास यात्रा का सबसे बड़ा संदेश है—भारत की महिला अब योजना की प्राप्तकर्ता भर नहीं है; वह परिवार की आर्थिक शक्ति, गांव की उद्यमी, खेत की तकनीकी साझेदार, डिजिटल अर्थव्यवस्था की भागीदार और लोकतंत्र की निर्णयकर्ता बन रही है।

2047 के विकसित भारत की कहानी इसलिए केवल GDP, उद्योग और बुनियादी ढांचे की कहानी नहीं होगी। उसकी असली ताकत इस बात से तय होगी कि देश की आधी आबादी को कितने अवसर, कितनी आर्थिक स्वतंत्रता और कितनी निर्णय लेने की शक्ति मिली। नारी शक्ति को विकास का केंद्र बनाने का अर्थ यही है—महिला के लिए विकास नहीं, महिला के साथ और महिला के नेतृत्व में विकास।

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