मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच एक बार फिर दुनिया की नजर अहम समुद्री मार्गों पर टिक गई है। यमन के हूती विद्रोहियों की ओर से बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य को बंद करने की चेतावनी ने वैश्विक चिंता बढ़ा दी है। इस घटनाक्रम ने इतिहास के एक बड़े टकराव—स्वेज संकट—की याद ताजा कर दी है, जिसने कभी वैश्विक ताकतों की रणनीति और संतुलन को हिला दिया था।
- मिडिल ईस्ट में बढ़ता तनाव
- बाब अल-मंदेब पर संकट
- क्या दोहराएगा इतिहास ‘स्वेज संकट’?
- बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य पर खतरे की घंटी
- स्वेज संकट की याद क्यों आई?
- वैश्विक ताकतों का टकराव और दबाव की राजनीति
- स्वेज नहर पर निर्भर दुनिया का व्यापार
- तेल, व्यापार और महंगाई पर संभावित असर
क्या था स्वेज संकट?
साल 1956 में मिस्र के राष्ट्रपति गमल अब्देल नासिर ने स्वेज नहर का राष्ट्रीयकरण कर दिया। उस समय इस नहर पर ब्रिटेन और फ्रांस का प्रभाव था और यह यूरोप के लिए तेल आपूर्ति का सबसे अहम रास्ता था। नासिर के इस कदम से पश्चिमी देशों के हितों को बड़ा झटका लगा।
इसके जवाब में यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस और इज़रायल ने एक गुप्त योजना बनाई, जिसे “सेव्रेस प्रोटोकॉल” कहा गया। इस योजना के तहत इज़रायल ने सिनाई प्रायद्वीप पर हमला किया, जिसके बाद ब्रिटेन और फ्रांस ने हस्तक्षेप कर नहर पर कब्जा करने की कोशिश की।
क्यों नाकाम हुआ हमला?
सैन्य ताकत होने के बावजूद यह अभियान ज्यादा दिन नहीं टिक सका। उस समय संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति ड्वाइट डी. आइजनहावर ने इस कार्रवाई का कड़ा विरोध किया। अमेरिका ने अपने ही सहयोगियों पर आर्थिक दबाव बनाया, वहीं सोवियत संघ ने भी सैन्य प्रतिक्रिया की चेतावनी दी। अंतरराष्ट्रीय दबाव के चलते ब्रिटेन, फ्रांस और इज़रायल को पीछे हटना पड़ा और यह संकट उनके लिए राजनीतिक हार साबित हुआ।
आज के हालात क्यों अहम?
आज स्वेज नहर दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। यूरोप, एशिया और अफ्रीका के बीच व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। इस नहर तक पहुंच काफी हद तक बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य पर निर्भर करती है। ऐसे में यदि यह मार्ग बाधित होता है, तो वैश्विक सप्लाई चेन पर सीधा असर पड़ता है।
हूती विद्रोहियों की धमकी के बाद आशंका जताई जा रही है कि अगर इस जलडमरूमध्य को बंद किया गया, तो जहाजों को अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप के रास्ते लंबा सफर तय करना पड़ेगा। इससे समय और लागत दोनों में भारी वृद्धि होगी।
क्या होगा आर्थिक असर?
विशेषज्ञों के मुताबिक, इस तरह की स्थिति में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी से उछाल आ सकता है। यूरोप और एशिया तक तेल की सप्लाई प्रभावित होगी, जिससे ईंधन महंगा हो सकता है। शिपिंग कंपनियों की लागत भी बढ़ेगी—एक यात्रा पर खर्च लाखों डॉलर तक बढ़ सकता है। इसका असर अंततः वैश्विक बाजार और आम उपभोक्ताओं पर पड़ेगा।
क्या दोहराया जा सकता है इतिहास?
हालात भले ही 1956 जैसे पूरी तरह न हों, लेकिन रणनीतिक दबाव और शक्ति संतुलन की लड़ाई आज भी जारी है। फर्क सिर्फ इतना है कि तब दबाव ब्रिटेन-फ्रांस पर था, जबकि आज निगाहें संयुक्त राज्य अमेरिका की भूमिका पर टिकी हैं। कुल मिलाकर, बाब अल-मंदेब में बढ़ता तनाव सिर्फ क्षेत्रीय मुद्दा नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन सकता है। आने वाले समय में यह तय करेगा कि इतिहास खुद को दोहराता है या दुनिया इस बार कोई नया रास्ता निकालती है।