भीषण गर्मी… कमजोर पड़ता मॉनसून… सूखे की आशंका… और अब अल नीनो को लेकर आई नई चेतावनी। दुनिया पहले से रिकॉर्ड तापमान झेल रही है और अब संकेत मिल रहे हैं कि नवंबर तक धरती की तपिश कम होने वाली नहीं है। भारत में भी इसका असर सिर्फ मौसम तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि खेती, पीने के पानी, पशुपालन और ग्रामीण रोजगार पर भी इसका सीधा प्रभाव पड़ सकता है। केंद्र सरकार ने खतरे को देखते हुए 300 से अधिक जिलों को संवेदनशील मानते हुए तैयारियां शुरू कर दी हैं।
- अल नीनो का खतरा, भारत के 300 जिले निशाने पर
- नवंबर तक रह सकता है असर, खेती पर बड़ा संकट
- 43% कम बारिश ने बढ़ाई सरकार की चिंता
- 111 जिलों के लिए विशेष एक्शन प्लान तैयार
- सूखा, पानी और चारे का संकट—डबल चुनौती
अल नीनो ने बढ़ाई चिंता, नवंबर तक रह सकता है असर
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के ताजा आकलन के अनुसार जून से अगस्त के बीच अल नीनो बनने की संभावना करीब 80 प्रतिशत है, जबकि इसके नवंबर तक बने रहने की संभावना 90 प्रतिशत से भी अधिक बताई गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अल नीनो मजबूत हुआ तो दुनिया भर में तापमान सामान्य से काफी ऊपर जा सकता है और वर्षा का संतुलन पूरी तरह बिगड़ सकता है। इसका सबसे बड़ा असर उन देशों पर पड़ेगा जिनकी कृषि मानसून पर निर्भर है।
संयुक्त राष्ट्र की चेतावनी—’आग में घी’ साबित होगा अल नीनो
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने साफ शब्दों में कहा है कि अल नीनो पहले से गर्म होती दुनिया में “आग में घी” डालने जैसा होगा। उनके अनुसार—
- वैश्विक तापमान और बढ़ेगा।
- चरम मौसम की घटनाएं तेज होंगी।
- सूखा और बाढ़ दोनों की घटनाओं में वृद्धि होगी।
- खाद्य सुरक्षा और जल संकट गहराएगा।
यानी दुनिया एक और बड़े जलवायु संकट के मुहाने पर खड़ी है।
यूरोप में गर्मी का कहर, भारत भी अछूता नहीं
अल नीनो का असर केवल एशिया तक सीमित नहीं है।
- फ्रांस में भीषण गर्मी से एक हजार से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है।
- जर्मनी, स्पेन और ब्रिटेन में रिकॉर्ड तापमान दर्ज किया गया।
- कई इलाकों में सड़कें तक पिघलने लगीं।
- हीट स्ट्रोक के मरीज बढ़ रहे
भारत में भी दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, पंजाब और मध्य प्रदेश समेत कई राज्यों में सामान्य से काफी कम बारिश दर्ज की गई है।
भारत के 300 जिले खतरे में
पहले केवल 111 जिलों को अधिक संवेदनशील माना जा रहा था। लेकिन अब कृषि मंत्रालय और वैज्ञानिक एजेंसियों के नए आकलन में खतरे का दायरा बढ़कर 300 से अधिक जिलों तक पहुंच गया है। इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं—
- मध्य प्रदेश
- महाराष्ट्र
- गुजरात
- राजस्थान
- उत्तर प्रदेश
- बिहार
- झारखंड
- कर्नाटक
- तेलंगाना
- आंध्र प्रदेश
- ओडिशा
यानी देश का बड़ा कृषि क्षेत्र इस संकट की जद में आ सकता है।
ICAR की रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और कृषि मंत्रालय ने 315 जिलों का वैज्ञानिक अध्ययन किया। रिपोर्ट के अनुसार—
- 111 जिलों में सिंचाई 25 प्रतिशत से भी कम है।
- 76 जिलों में सिंचाई 25 से 50 प्रतिशत के बीच है।
- यदि मानसून कमजोर रहा तो इन जिलों में फसल उत्पादन पर सबसे अधिक असर पड़ेगा।
यानी जहां सिंचाई की व्यवस्था कमजोर है, वहां सूखे का खतरा कई गुना अधिक रहेगा।
43 प्रतिशत कम बारिश ने बढ़ाई मुश्किल
भारत मौसम विभाग के अनुसार 1 जून से 27 जून के बीच देश में सामान्य से 43 प्रतिशत कम बारिश हुई।
सामान्य वर्षा: 141.8 मिमी
इस वर्ष दर्ज वर्षा: 80.4 मिमी
क्षेत्रवार स्थिति—
- मध्य भारत में 57 प्रतिशत कम बारिश
- पूर्वोत्तर और पूर्वी भारत में 44 प्रतिशत कमी
- दक्षिण भारत में 30 प्रतिशत कमी
- उत्तर-पश्चिम भारत में 27 प्रतिशत कमी
यह आंकड़े बताते हैं कि मॉनसून की रफ्तार अभी भी सामान्य नहीं हुई है।
खरीफ फसलों पर सबसे बड़ा खतरा
कम बारिश का सीधा असर खरीफ की खेती पर पड़ सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार—
- धान , सोयाबीन, मक्का, दालें, कपास, फसलें कम बारिश से ज्यादा प्रभावित हो सकती हैं। यदि जुलाई के शुरुआती सप्ताह में अच्छी बारिश नहीं हुई तो बुवाई का क्षेत्र भी घट सकता है।
सरकार का प्लान तैयार
कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बताया कि संभावित प्रभावित जिलों की पहचान कर राज्यों को पहले ही सतर्क कर दिया गया है। सरकार की तैयारी—
- संवेदनशील जिलों की सूची राज्यों को भेजी गई।
- जिला प्रशासन को अग्रिम तैयारी के निर्देश।
- रोजगार उपलब्ध कराने की योजना।
- जल संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता।
- सूखा प्रभावित क्षेत्रों की निगरानी।
तालाब, चेक डैम और जलाशयों पर फोकस
सरकार ने निर्देश दिए हैं कि—
- पुराने तालाबों की सफाई हो।
- जलाशयों की मरम्मत की जाए।
- नए खेत-तालाब बनाए जाएं।
- चेक डैम मजबूत किए जाएं।
- वर्षा जल संग्रहण को प्राथमिकता दी जाए।
उद्देश्य साफ है—यदि बारिश कम भी हो तो उपलब्ध पानी को अधिकतम बचाया जा सके।
पीने के पानी की भी बड़ी चुनौती
सरकार ने राज्यों को निर्देश दिए हैं कि—
- संवेदनशील जिलों में पीने के पानी को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।
- जरूरत पड़ने पर दूसरे क्षेत्रों से पानी पहुंचाया जाए।
- ग्रामीण जलापूर्ति पर विशेष निगरानी रखी जाए।
जानवरों पर भी संकट
कम बारिश का असर केवल इंसानों पर नहीं पड़ेगा।
संभावित संकट—
- चारे की कमी
- पशुओं के लिए पानी का संकट
- दूध उत्पादन में गिरावट
- पशुपालकों की लागत में वृद्धि
इसी वजह से सरकार पहले से चारा भंडारण और सप्लाई की योजना तैयार कर रही है।
क्या है अल नीनो?
अल नीनो प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्र के पानी का असामान्य रूप से गर्म होना है।
इसके कारण—
- वैश्विक तापमान बढ़ जाता है।
- कई देशों में सूखा पड़ता है।
- कहीं अत्यधिक बारिश होती है।
- मानसून कमजोर हो सकता है।
- कृषि उत्पादन प्रभावित होता है।
भारत में अल नीनो का सबसे बड़ा असर दक्षिण-पश्चिम मानसून पर देखा जाता है।
क्या आगे और बढ़ेगी चिंता?
मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि जुलाई के पहले पखवाड़े में मॉनसून सामान्य गति नहीं पकड़ता तो—
- बारिश की कमी और बढ़ सकती है।
- जलाशयों का स्तर प्रभावित होगा।
- खरीफ उत्पादन घट सकता है।
- महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है।
- ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर असर दिखाई देगा।
अल नीनो अब केवल मौसम विज्ञान का विषय नहीं रह गया है। यह खेती, खाद्य सुरक्षा, पानी, पशुपालन, रोजगार और अर्थव्यवस्था से जुड़ी राष्ट्रीय चुनौती बनता जा रहा है। दुनिया पहले से रिकॉर्ड गर्मी झेल रही है और भारत में कमजोर मॉनसून ने खतरे की घंटी बजा दी है। आने वाले चार से पांच महीने यह तय करेंगे कि यह केवल मौसम का उतार-चढ़ाव रहेगा या फिर देश को बड़े सूखे और जल संकट का सामना करना पड़ेगा।





