स्कूल के भीतर हैवानियत! छह साल की मासूम पर तीसरी कक्षा के छात्र का जानलेवा हमला
सवाल सिर्फ एक बच्चे की हिंसक हरकत का नहीं, सवाल उस स्कूल व्यवस्था का भी है, जहां माता-पिता अपने बच्चों को सुरक्षित भविष्य की उम्मीद के साथ भेजते हैं, लेकिन स्कूल परिसर में ही उनकी सुरक्षा पर सवाल खड़े हो जाते हैं।
हरियाणा के पंचकूला की यह घटना किसी भी अभिभावक को झकझोर देने के लिए काफी है। तीसरी कक्षा में पढ़ने वाला एक छात्र, केजी में पढ़ने वाली महज छह साल की विशेष आवश्यकता वाली बच्ची को कथित तौर पर बहाने से स्कूल की पहली मंजिल पर ले जाता है। फिर जो कुछ होता है, वह बचपन की मासूमियत और स्कूल की सुरक्षा व्यवस्था, दोनों पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, बच्ची के सिर और चेहरे पर पत्थर, गमले और ईंट से कई वार किए गए। बच्ची गंभीर रूप से घायल होकर बेहोश हो गई। उसे पहले पंचकूला के सिविल अस्पताल ले जाया गया और फिर गंभीर हालत में चंडीगढ़ के पीजीआईएमईआर भेजा गया।
लेकिन इस घटना में सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर स्कूल के भीतर ऐसा कैसे हो गया?
पहला सवाल… स्कूल की निगरानी कहां थी?
स्कूल केवल पढ़ाई कराने की जगह नहीं है। वह बच्चों की सुरक्षा और देखभाल की जिम्मेदारी उठाने वाला संस्थान भी है। जब कोई बच्चा अपने अभिभावकों से दूर स्कूल में होता है, तो उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी स्कूल प्रबंधन और वहां तैनात कर्मचारियों की होती है।
अगर आरोपी छात्र बच्ची को बहाने से पहली मंजिल पर ले गया, तो सवाल उठता है कि उस समय शिक्षक कहां थे? क्या बच्चों की आवाजाही पर निगरानी नहीं थी? क्या स्कूल में सीसीटीवी कैमरे काम कर रहे थे? क्या संवेदनशील स्थानों पर कर्मचारियों की तैनाती थी?
ये सवाल जांच का विषय हैं, लेकिन इनके जवाब मिलना बेहद जरूरी है।
दूसरा सवाल… बच्चों में इतनी हिंसा कहां से आ रही है?
तीसरी कक्षा में पढ़ने वाला बच्चा उम्र के उस दौर में होता है, जब उसे सही और गलत का अंतर समझाने, संवेदनशील बनाने और व्यवहार सिखाने की जिम्मेदारी परिवार और विद्यालय दोनों की होती है।
ऐसी घटना को केवल बच्चों की शरारत कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। हालांकि, आरोपी बच्चे की उम्र को देखते हुए उसके व्यवहार, परिस्थितियों और घटना के पीछे के कारणों की बाल-मनोवैज्ञानिक दृष्टि से जांच जरूरी है।
यह भी समझना होगा कि बच्चों में आक्रामकता के पीछे कौन-से पारिवारिक, सामाजिक या दूसरे कारक काम कर रहे हैं। बिना जांच किसी बच्चे या उसके परिवार को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा।
तीसरा सवाल… विशेष आवश्यकता वाली बच्ची की सुरक्षा कौन करेगा?
इस घटना का सबसे संवेदनशील पहलू यह है कि पीड़ित बच्ची विशेष आवश्यकता वाली बताई जा रही है। ऐसे बच्चों को विद्यालय में अतिरिक्त देखभाल, सहयोग और सुरक्षित वातावरण की जरूरत होती है।
अगर स्कूल में ऐसे बच्चों के लिए अलग सुरक्षा व्यवस्था, प्रशिक्षित कर्मचारी और नियमित निगरानी नहीं है, तो समावेशी शिक्षा का उद्देश्य अधूरा रह जाता है।
अब जवाबदेही तय होनी चाहिए
इस पूरे मामले में स्कूल प्रबंधन की भूमिका की जांच होनी चाहिए। सीसीटीवी फुटेज की पड़ताल हो, घटना के समय मौजूद शिक्षकों और कर्मचारियों से पूछताछ हो और यह पता लगाया जाए कि बच्ची इतनी देर तक निगरानी से बाहर कैसे रही।
साथ ही, आरोपी छात्र के साथ भी बाल अधिकारों और कानून के अनुरूप व्यवहार करते हुए विशेषज्ञों से उसका मूल्यांकन कराया जाना चाहिए।
क्योंकि यहां मुद्दा किसी एक बच्चे को अपराधी घोषित करने का नहीं, बल्कि ऐसी घटना की पुनरावृत्ति रोकने का है।
सबसे बड़ा सवाल
माता-पिता अपने बच्चों को स्कूल इसलिए भेजते हैं कि वहां वे सुरक्षित रहेंगे, सीखेंगे और आगे बढ़ेंगे। लेकिन अगर स्कूल की चारदीवारी के भीतर ही छह साल की मासूम बच्ची सुरक्षित नहीं है, तो अभिभावक भरोसा किस पर करें?
स्कूलों में केवल अनुशासन और परीक्षा परिणामों की समीक्षा नहीं होनी चाहिए। सुरक्षा व्यवस्था, बच्चों के व्यवहार, शिक्षकों की निगरानी और विशेष आवश्यकता वाले विद्यार्थियों की देखभाल भी उतनी ही महत्वपूर्ण होनी चाहिए।
आखिर स्कूल ज्ञान का मंदिर है या ऐसी जगह, जहां मासूम बच्चों की सुरक्षा भी सवालों के घेरे में आ जाए?
यह घटना पूरे शिक्षा तंत्र के लिए चेतावनी है। बच्चों को केवल पढ़ाना काफी नहीं है, उन्हें सुरक्षित रखना और संवेदनशील इंसान बनाना भी उतना ही जरूरी है।