World Savings Day Special | सिक्कों से एसआईपी तक पहुंचा बचत का सफर | परिवारों की वित्तीय बचत में म्यूचुअल फंड की हिस्सेदारी 2.1 से बढ़कर 13.1 प्रतिशत | संपत्ति बढ़ी, लेकिन कर्ज का बोझ भी बढ़ा
कभी घर के किसी कोने में रखी मिट्टी की गुल्लक में सिक्के डालना बचत की पहली सीख हुआ करती थी। गुल्लक भरने का इंतजार रहता था और उसमें जमा छोटी-छोटी रकम भविष्य की उम्मीद बनती थी। वक्त बदला तो गुल्लक की जगह बैंक खाते, एफडी और डाकघर की योजनाओं ने ले ली। अब डिजिटल दौर में एसआईपी, म्यूचुअल फंड और ऑनलाइन निवेश बचत के नए चेहरे बन गए हैं।
यानी बचत का तरीका बदल गया, लेकिन आर्थिक सुरक्षा की जरूरत आज भी उतनी ही है। इसी सोच के साथ आज 30 अक्टूबर को भारत में विश्व बचत दिवस मनाया जा रहा है। खास बात यह है कि दुनिया में यह दिवस 31 अक्टूबर को मनाया जाता है, लेकिन भारत में इसकी तारीख एक दिन पहले है। आखिर क्यों बदली बचत की तारीख? क्या भारतीय परिवार अब पारंपरिक बचत से निवेश की ओर बढ़ रहे हैं? और क्या बढ़ती वित्तीय संपत्ति के साथ कर्ज का बोझ भी चिंता बढ़ा रहा है? विश्व बचत दिवस पर देखिए यह खास रिपोर्ट।
गुल्लक से शुरू हुआ बचत का सफर
बचत की कहानी केवल पैसों को जोड़ने की कहानी नहीं है। यह आर्थिक अनुशासन और भविष्य की तैयारी का भी प्रतीक है। एक दौर था जब बच्चे अपनी जेब खर्च से मिले सिक्के मिट्टी की गुल्लक में जमा करते थे। घरों में महिलाएं छोटी-छोटी रकम अलग रखती थीं। परिवार की बचत का बड़ा हिस्सा बैंक जमा, डाकघर की योजनाओं और सावधि जमा में लगाया जाता था।
लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। मोबाइल फोन पर निवेश, ऑनलाइन बैंकिंग और नियमित मासिक निवेश ने बचत को नई पहचान दी है। विश्व बचत दिवस का उद्देश्य भी यही है कि लोग अपनी आय का कुछ हिस्सा भविष्य के लिए सुरक्षित रखें। केवल पैसा जमा करना ही नहीं, बल्कि खर्च, बचत और निवेश के बीच संतुलन बनाना भी सीखें।
1924 से जुड़ा है विश्व बचत दिवस का इतिहास
विश्व बचत दिवस की शुरुआत का इतिहास करीब एक सदी पुराना है। वर्ष 1924 में इटली के मिलान शहर में आयोजित अंतरराष्ट्रीय बचत बैंक कांग्रेस में बचत की आदत को बढ़ावा देने और बैंकिंग के प्रति लोगों में जागरूकता पैदा करने पर जोर दिया गया था। इसी आयोजन से विश्व बचत दिवस की शुरुआत जुड़ी है। दुनिया के अधिकांश देशों में यह दिवस 31 अक्टूबर को मनाया जाता है, लेकिन भारत में 30 अक्टूबर को मनाने की परंपरा है। इसकी वजह भी ऐतिहासिक है। 31 अक्टूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई थी। इसके बाद भारत में विश्व बचत दिवस का आयोजन 30 अक्टूबर को किया जाने लगा। यानी भारत में इस दिवस की तारीख बदलने के पीछे एक राष्ट्रीय त्रासदी की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है।
बचत का नया चेहरा, म्यूचुअल फंड और एसआईपी
अब बात बचत के बदलते तरीकों की। भारत में परिवारों की वित्तीय बचत का रुझान धीरे-धीरे पारंपरिक बैंक जमा से आगे बढ़ रहा है। वित्त मंत्रालय की ओर से लोकसभा में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2020-21 में परिवारों की कुल वित्तीय बचत में म्यूचुअल फंड की हिस्सेदारी 2.1 प्रतिशत थी। वर्ष 2024-25 में यह बढ़कर 13.1 प्रतिशत हो गई। म्यूचुअल फंड में परिवारों की वित्तीय बचत भी इसी अवधि में करीब 60 हजार करोड़ रुपये से बढ़कर 4.7 लाख करोड़ रुपये पहुंच गई।
एसआईपी यानी व्यवस्थित निवेश योजना का चलन भी तेजी से बढ़ा है। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, वित्त वर्ष 2017 में एसआईपी के जरिए औसत मासिक निवेश चार हजार करोड़ रुपये से कम था। वित्त वर्ष 2026 के अप्रैल से नवंबर के दौरान यह बढ़कर 28 हजार करोड़ रुपये से अधिक हो गया। ये आंकड़े बताते हैं कि अब बचत का मतलब केवल बैंक खाते में रकम जमा करना नहीं रह गया है। लोग अपने वित्तीय लक्ष्यों के अनुसार निवेश के अलग-अलग विकल्प तलाश रहे हैं।
संपत्ति बढ़ी, लेकिन कर्ज भी बढ़ रहा है
बचत और निवेश की बढ़ती प्रवृत्ति के बीच एक दूसरा पहलू भी है। भारतीय परिवारों की वित्तीय संपत्ति बढ़ी है, लेकिन उनके ऊपर वित्तीय देनदारियों का बोझ भी बढ़ रहा है। वित्त मंत्रालय के लोकसभा में दिए गए जवाब के मुताबिक, मार्च 2021 में परिवारों की वित्तीय संपत्ति 228.7 लाख करोड़ रुपये थी, जो मार्च 2025 में बढ़कर 352.6 लाख करोड़ रुपये हो गई।
वहीं वित्तीय देनदारियां भी इसी अवधि में 77.7 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 136.6 लाख करोड़ रुपये पहुंच गईं। मार्च 2025 में वित्तीय देनदारियों की सालाना वृद्धि दर 12.9 प्रतिशत रही, जबकि वित्तीय संपत्तियों की वृद्धि दर 10.1 प्रतिशत थी। यह अंतर एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा करता है। क्या परिवार जितनी तेजी से संपत्ति बना रहे हैं, उतनी ही तेजी से कर्ज के जाल से भी बच पा रहे हैं? आर्थिक सुरक्षा के लिए केवल निवेश बढ़ाना काफी नहीं है। आय और खर्च का संतुलन, कर्ज का प्रबंधन और आपातकालीन जरूरतों के लिए धन सुरक्षित रखना भी उतना ही जरूरी है।
बचत का मंत्र, छोटी रकम से बड़ी तैयारी
विश्व बचत दिवस का सबसे बड़ा संदेश यही है कि बचत की शुरुआत बड़ी रकम से नहीं, छोटी आदत से होती है। हर महीने आय का एक निश्चित हिस्सा अलग रखना, गैरजरूरी खर्चों पर नियंत्रण करना और आपातकालीन जरूरतों के लिए अलग धन जमा करना आर्थिक अनुशासन की बुनियाद है। बैंक बचत खाता, आवर्ती जमा, डाकघर की योजनाएं और पीपीएफ जैसे विकल्प अलग-अलग जरूरतों के लिए उपलब्ध हैं। वहीं म्यूचुअल फंड और एसआईपी में बाजार का जोखिम जुड़ा होता है। इसलिए निवेश से पहले अपने वित्तीय लक्ष्य, समय अवधि और जोखिम उठाने की क्षमता को समझना जरूरी है। डिजिटल भुगतान के दौर में छोटी-छोटी रकम कब खर्च हो जाती है, कई बार इसका अंदाजा भी नहीं लगता। ऐसे में खर्च का हिसाब रखना और नियमित बचत की आदत बनाना पहले से ज्यादा जरूरी हो गया है।
बचत के बदलते दौर में पांच जरूरी बातें
1. बचत और निवेश में अंतर समझें। बचत का उद्देश्य जरूरत के समय पैसा उपलब्ध रखना है, जबकि निवेश का उद्देश्य समय के साथ धन बढ़ाना हो सकता है। दोनों की भूमिका अलग है।
2. आपातकालीन धन जरूर रखें। अचानक नौकरी छूटने, बीमारी या किसी अन्य मुश्किल परिस्थिति में काम आने वाली रकम को अलग रखना जरूरी है।
3. एसआईपी को गारंटी न समझें। एसआईपी निवेश का तरीका है, निश्चित मुनाफे की योजना नहीं। म्यूचुअल फंड का प्रतिफल बाजार के उतार-चढ़ाव पर निर्भर करता है।
4. कर्ज और निवेश का संतुलन बनाएं। अधिक ब्याज वाले कर्ज को नजरअंदाज करके निवेश करना आर्थिक दबाव बढ़ा सकता है।
5. लक्ष्य के हिसाब से निवेश करें। बच्चों की पढ़ाई, घर, सेवानिवृत्ति और अन्य जरूरतों के लिए अलग-अलग समय अवधि और जोखिम के अनुसार योजना बनाएं।
मिट्टी की गुल्लक से शुरू हुआ बचत का सफर आज मोबाइल की स्क्रीन तक पहुंच गया है। कभी सिक्के जोड़कर भविष्य के सपने बुने जाते थे, आज लोग हर महीने हजारों करोड़ रुपये एसआईपी के जरिए निवेश कर रहे हैं। लेकिन विश्व बचत दिवस हमें एक जरूरी बात याद दिलाता है। आर्थिक मजबूती केवल ज्यादा कमाने या ज्यादा निवेश करने से नहीं आती। सही समय पर बचत, समझदारी से निवेश और कर्ज पर नियंत्रण—इन तीनों का संतुलन ही भविष्य को सुरक्षित बना सकता है। क्योंकि बचत की असली ताकत रकम के आकार में नहीं, बल्कि उस आदत में छिपी होती है, जो मुश्किल वक्त में परिवार का सहारा बनती है।