विवाह के बाद संतान प्राप्ति हर दंपति की स्वाभाविक अभिलाषा होती है। लेकिन कई बार तमाम प्रयासों के बावजूद संतान सुख मिलने में देरी होती है। ऐसी स्थिति में दंपति मानसिक तनाव और निराशा से घिर जाते हैं। भारतीय ज्योतिष और धार्मिक परंपराओं में संतान प्राप्ति में आने वाली बाधाओं के निवारण के लिए कई शास्त्रोक्त उपाय बताए गए हैं। इनमें ग्रहों की शांति, विशेष पूजा-पाठ, व्रत, दान और संतान गोपाल मंत्र का जाप शामिल है।
कुंडली का पंचम भाव और संतान सुख का संबंध
ज्योतिष शास्त्र में जन्म कुंडली के पंचम भाव को संतान भाव माना गया है। मान्यता है कि इस भाव की स्थिति, इसके स्वामी और बृहस्पति जैसे ग्रहों का प्रभाव संतान सुख के विषय में महत्वपूर्ण संकेत देता है। यदि पंचम भाव निर्बल या किसी ग्रह से पीड़ित हो तो ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार संतान प्राप्ति में विलंब अथवा बाधा की आशंका मानी जाती है।
प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्यों के अनुसार ऐसी स्थिति में कुंडली के ग्रहों की स्थिति के आधार पर एक या दो शास्त्रोक्त उपाय श्रद्धापूर्वक किए जा सकते हैं।
ग्रहों के अनुसार संतान सुख के लिए उपाय
1. सूर्य से संबंधित बाधा: यदि संतान भाव सूर्य से पीड़ित माना जाए तो हरिवंश पुराण का विधिवत श्रवण करें और उसके बाद पुराण का दान करें।
2. चंद्रमा से संबंधित बाधा: चंद्रमा के प्रतिकूल प्रभाव की स्थिति में रामेश्वर तीर्थ में स्नान, एक लाख गायत्री मंत्रों का जाप तथा चांदी के पात्र में दूध भरकर दान करने का विधान बताया गया है।
3. मंगल से संबंधित बाधा: मंगल के कारण संतान भाव प्रभावित होने पर भूमि दान और प्रदोष व्रत करने का सुझाव दिया गया है।
4. बुध से संबंधित बाधा: बुध के प्रतिकूल प्रभाव के निवारण के लिए विष्णु सहस्रनाम का जाप करना शुभ माना गया है।
5. गुरु से संबंधित बाधा: बृहस्पति को संतान सुख का प्रमुख कारक ग्रह माना जाता है। गुरु की शांति के लिए गुरुवार को फलदार वृक्ष लगवाने तथा ब्राह्मण को स्वर्ण और वस्त्र का दान करने का विधान बताया गया है।
6. शुक्र से संबंधित बाधा: शुक्र से संबंधित दोषों के निवारण के लिए गौदान और आभूषणों से सुसज्जित लक्ष्मी-नारायण की मूर्ति का दान करने की मान्यता है।
7. शनि से संबंधित बाधा: शनि के प्रतिकूल प्रभाव की स्थिति में पीपल का वृक्ष लगाने, उसकी पूजा करने, रुद्राभिषेक कराने और ब्रह्मा की मूर्ति का दान करने का विधान बताया गया है।
संतान गोपाल मंत्र: संतान प्राप्ति के लिए विशेष साधना
संतान सुख की कामना से भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप की आराधना का विशेष महत्व माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार संतान गोपाल मंत्र का जाप संतान प्राप्ति की कामना से किया जाता है।
संतान गोपाल मंत्र इस प्रकार है—
ॐ देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहम् शरणं गतः॥
ज्योतिषीय परंपरा में इस मंत्र का प्रतिदिन एक हजार बार, लगातार सौ दिनों तक जाप करने का विधान बताया गया है। इसके बाद दस हजार मंत्रों से हवन, एक हजार मंत्रों से तर्पण, सौ मंत्रों से मार्जन तथा दस ब्राह्मणों को भोजन कराने की परंपरा का उल्लेख मिलता है।
वराह पुराण में पुत्र व्रत का विधान
संतान प्राप्ति की कामना से वराह पुराण में पुत्र व्रत का भी उल्लेख मिलता है। इस व्रत का संबंध भगवान विष्णु की आराधना से है।
विधान के अनुसार भाद्रपद कृष्ण पक्ष की सप्तमी को उपवास रखकर भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। अगले दिन भगवान की आराधना के साथ निम्न मंत्र से तिलों की 108 आहुतियां देने और ब्राह्मण भोजन कराने का विधान बताया गया है।
मंत्र—
ॐ क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय गोपीजनवल्लभाय स्वाहा।
इसके बाद बिल्व फल ग्रहण कर षड्रस युक्त भोजन करने की परंपरा बताई गई है। मान्यता के अनुसार वर्षभर प्रत्येक महीने की सप्तमी को इसी प्रकार व्रत करने से संतान सुख की कामना की जाती है।
गर्भधारण के बाद भी ग्रहों के अनुसार दान का विधान
ज्योतिषीय मान्यताओं में गर्भधारण के बाद गर्भ के नौ महीनों को अलग-अलग ग्रहों से जोड़कर देखा गया है। मान्यता है कि प्रत्येक महीने के अधिपति ग्रह से संबंधित वस्तुओं का उसके निर्धारित वार में दान करने से गर्भ की रक्षा और स्वस्थ संतान के लिए शुभ फल प्राप्त होते हैं।
गर्भ के नौ महीनों के अनुसार दान की परंपरा इस प्रकार बताई गई है—
पहला महीना – शुक्र: शुक्रवार को चावल, चीनी, गेहूं का आटा, दूध, दही, चांदी, सफेद वस्त्र और दक्षिणा का दान।
दूसरा महीना – मंगल: मंगलवार को गुड़, तांबा, सिंदूर, लाल वस्त्र, लाल फल और दक्षिणा का दान।
तीसरा महीना – गुरु: गुरुवार को पीले वस्त्र, हल्दी, स्वर्ण, पपीता, चने की दाल, बेसन और दक्षिणा का दान।
चौथा महीना – सूर्य: रविवार को गुड़, गेहूं, तांबा, सिंदूर, लाल वस्त्र, लाल फल और दक्षिणा का दान।
पांचवां महीना – चंद्रमा: सोमवार को चावल, चीनी, गेहूं का आटा, दूध, दही, चांदी, सफेद वस्त्र और दक्षिणा का दान।
छठा महीना – शनि: शनिवार को काले तिल, काले उड़द, तेल, लोहा, काले वस्त्र और दक्षिणा का दान।
सातवां महीना – बुध: बुधवार को हरे वस्त्र, मूंग, कांसे का पात्र, हरी सब्जियां और दक्षिणा का दान।
आठवां महीना – लग्नेश ग्रह: गर्भाधान के समय कुंडली में लग्नेश ग्रह से संबंधित वस्तुओं का उसके निर्धारित वार में दान करने का विधान है। यदि लग्नेश की जानकारी न हो तो अन्न, वस्त्र और फल का दान करने की परंपरा बताई गई है।
नौवां महीना – चंद्रमा: सोमवार को चावल, चीनी, गेहूं का आटा, दूध, दही, चांदी, सफेद वस्त्र और दक्षिणा का दान।
आस्था के साथ जरूरी है चिकित्सा परामर्श
संतान सुख जीवन की एक बड़ी अभिलाषा है और संतान प्राप्ति में देरी दंपति के लिए भावनात्मक रूप से कठिन हो सकती है। भारतीय धार्मिक परंपराओं में बताए गए ये उपाय श्रद्धा और आध्यात्मिक विश्वास से जुड़े हैं। हालांकि इन उपायों से संतान प्राप्ति या गर्भ की सुरक्षा सुनिश्चित होने का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।
संतान प्राप्ति में परेशानी होने पर स्त्री और पुरुष दोनों को विशेषज्ञ चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए। गर्भधारण के बाद नियमित जांच और चिकित्सकीय सलाह का पालन करना भी जरूरी है।
आस्था मन को संबल देती है, चिकित्सा सही दिशा दिखाती है। इसलिए संतान सुख की कामना में पूजा-पाठ और चिकित्सा को एक-दूसरे का विकल्प नहीं, बल्कि अलग-अलग भूमिका के रूप में देखना चाहिए।