देश की राजनीति में आज एक दिलचस्प तस्वीर देखने को मिल रही है। एक तरफ नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी INDIA ब्लॉक के सांसदों के साथ सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ बीजेपी महिला मोर्चा कांग्रेस मुख्यालय इंदिरा भवन के बाहर प्रदर्शन कर रहा है। कांग्रेस का प्रदर्शन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने और कथित ‘वोट चोरी’ के मुद्दे पर केंद्रित है। वहीं बीजेपी महिला मोर्चा कांग्रेस सांसद और जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर अंगोमचा बिमोल अकोइजम के खिलाफ यौन उत्पीड़न के आरोपों को लेकर कार्रवाई की मांग कर रहा है। दोनों दलों का एक ही दिन सड़कों पर उतरना राजनीतिक रूप से अहम है। सवाल यह है कि क्या बीजेपी विपक्ष के प्रदर्शन को कमजोर करने के लिए जवाबी मोर्चा खोल रही है या दोनों दल अपने-अपने मुद्दों पर पहले से तय कार्यक्रम के तहत प्रदर्शन कर रहे हैं? इस घटनाक्रम के राजनीतिक मायने समझना जरूरी है।
राहुल गांधी INDIA ब्लॉक के सांसदों के साथ सुप्रीम कोर्ट मार्च कर रहे हैं
राहुल गांधी के नेतृत्व में INDIA ब्लॉक के सांसदों का मार्च चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर है। विपक्ष का आरोप है कि मतदाता सूची में गड़बड़ियों के जरिए ‘वोट चोरी’ की जा रही है। विपक्षी नेता मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे या उन्हें पद से हटाने की मांग उठा रहे हैं। राहुल गांधी ने इस मुद्दे पर विपक्षी दलों और अन्य लोगों से साथ आने की अपील भी की थी। विपक्ष की कोशिश है कि चुनावी प्रक्रिया से जुड़े सवालों को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया जाए। हालांकि, चुनावी अनियमितताओं को लेकर विपक्ष के आरोपों और चुनाव आयोग के पक्ष को अलग-अलग समझना जरूरी है।
बीजेपी महिला मोर्चा AICC कार्यालय के बाहर क्यों कर रहा है प्रदर्शन?
दूसरी तरफ बीजेपी महिला मोर्चा कांग्रेस मुख्यालय इंदिरा भवन के बाहर प्रदर्शन कर रहा है। इस प्रदर्शन का मुद्दा कांग्रेस सांसद अंगोमचा बिमोल अकोइजम के खिलाफ लगे यौन उत्पीड़न के आरोप हैं। बीजेपी महिला मोर्चा इस मामले में उनकी गिरफ्तारी और कांग्रेस से बाहर किए जाने की मांग कर रहा है। बीजेपी का सवाल है कि महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान की बात करने वाली कांग्रेस अपने सांसद के मामले में क्या कदम उठाएगी। यह मामला राजनीतिक रूप से इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अकोइजम कांग्रेस सांसद होने के साथ जेएनयू में प्रोफेसर भी रहे हैं। विश्वविद्यालय ने शिकायतों की जांच के बाद उन्हें सेवा से बर्खास्त किया है। दिल्ली पुलिस ने भी शिकायत के आधार पर एफआईआर दर्ज की है। हालांकि, आरोपों के मामले में कानूनी प्रक्रिया और आरोपी का पक्ष भी महत्वपूर्ण है।
क्या बीजेपी INDIA ब्लॉक के प्रदर्शन को काउंटर करने के लिए सड़क पर उतरी?
यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल है। जब राहुल गांधी और विपक्षी सांसद सुप्रीम कोर्ट मार्च के जरिए चुनाव आयोग को लेकर सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं, उसी समय बीजेपी महिला मोर्चा कांग्रेस को उसके सांसद से जुड़े मामले पर घेर रहा है। इससे राजनीतिक बहस का केंद्र दो अलग-अलग मुद्दों पर बंटता दिखाई देता है। एक तरफ विपक्ष चुनावी प्रक्रिया और मुख्य चुनाव आयुक्त को लेकर सवाल उठा रहा है, तो दूसरी तरफ बीजेपी कांग्रेस से महिला सुरक्षा और अपने सांसद के खिलाफ कार्रवाई पर जवाब मांग रही है। इससे कांग्रेस को एक साथ दो मोर्चों पर जवाब देना पड़ सकता है। लेकिन केवल समय एक होने से यह साबित नहीं होता कि प्रदर्शन खास तौर पर राहुल गांधी के मार्च को रोकने या उसका असर कम करने के लिए आयोजित किया गया है।
क्या बीजेपी सच में INDIA ब्लॉक के विरोध प्रदर्शन से दबाव में है?
यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि बीजेपी विपक्ष के प्रदर्शन से डर गई है। राजनीति में विरोध प्रदर्शन केवल विरोध दर्ज कराने का माध्यम नहीं होते, बल्कि जनमत बनाने और मीडिया में मुद्दों को प्रमुखता दिलाने का तरीका भी होते हैं। विपक्ष चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाकर सरकार और चुनाव आयोग पर दबाव बनाना चाहता है। वहीं बीजेपी कांग्रेस सांसद के खिलाफ आरोपों को उठाकर कांग्रेस नेतृत्व से जवाब मांग रही है। दोनों दल अपने समर्थकों के सामने अपने-अपने मुद्दे को महत्वपूर्ण साबित करने की कोशिश कर रहे हैं। बीजेपी का प्रदर्शन विपक्षी मार्च के राजनीतिक प्रभाव को चुनौती दे सकता है, लेकिन इसे डर का प्रमाण मानने के लिए ठोस आधार जरूरी है। इसी तरह कांग्रेस के मार्च से भी अपने आप यह साबित नहीं होता कि विपक्ष की मांगें स्वीकार कर ली जाएंगी।
एक ही दिन दो राजनीतिक मोर्चे, आखिर क्या निकलेंगे इसके मायने?
इस घटनाक्रम का सबसे बड़ा संदेश यही है कि देश की राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप के साथ सड़क पर शक्ति प्रदर्शन भी अहम भूमिका निभा रहा है। कांग्रेस चुनाव आयोग और मतदाता सूची के मुद्दे पर जवाब मांग रही है, जबकि बीजेपी महिला मोर्चा कांग्रेस को अपने सांसद के खिलाफ कार्रवाई के सवाल पर घेर रहा है। बीजेपी का यह विरोध प्रदर्शन पहले से घोषित कार्यक्रमों की कड़ी भी है, इसलिए इसे केवल सुप्रीम कोर्ट मार्च की प्रतिक्रिया बताना सही नहीं होगा।
एक ही दिन कांग्रेस और बीजेपी का सड़कों पर उतरना महज विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि राजनीतिक नैरेटिव पर कब्जा करने की लड़ाई भी माना जा सकता है। राहुल गांधी INDIA ब्लॉक के सांसदों के साथ सुप्रीम कोर्ट मार्च करके चुनाव आयोग, मतदाता सूची और कथित वोट चोरी के मुद्दे को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में लाना चाहते हैं। विपक्ष की रणनीति है कि चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाकर सरकार और चुनाव आयोग पर दबाव बनाया जाए।
दूसरी ओर, बीजेपी महिला मोर्चा का इंदिरा भवन के बाहर प्रदर्शन कांग्रेस को उसके सांसद के खिलाफ लगे यौन उत्पीड़न के आरोपों पर घेरने की कोशिश है। इससे बीजेपी कांग्रेस के सामने महिला सुरक्षा और जवाबदेही का सवाल खड़ा कर रही है। राजनीतिक तौर पर इसका फायदा यह हो सकता है कि कांग्रेस के विरोध प्रदर्शन के साथ-साथ मीडिया और जनता का ध्यान दूसरे मुद्दे की ओर भी जाए।
क्या बीजेपी INDIA ब्लॉक के प्रदर्शन से डर रही है? फिलहाल ऐसा निष्कर्ष निकालने के लिए पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं। लेकिन यह जरूर है कि दोनों दल एक-दूसरे के राजनीतिक संदेश को चुनौती दे रहे हैं। कांग्रेस चुनावी पारदर्शिता को मुद्दा बना रही है, जबकि बीजेपी कांग्रेस की जवाबदेही पर सवाल उठा रही है।इस पूरे घटनाक्रम का असली असर इस बात से तय होगा कि जनता किस मुद्दे को अधिक गंभीरता से लेती है और दोनों दल अपने आरोपों के समर्थन में कितने ठोस तथ्य सामने रखते हैं। फिलहाल यह सियासी मुकाबला सिर्फ सड़कों तक सीमित नहीं है, बल्कि जनमत और राजनीतिक विश्वसनीयता की लड़ाई भी है।