₹7.5 करोड़ में स्थायी अमेरिकी वीज़ा…इसमें 13 हजार भारतीय, चीन पिछड़ा..जानें क्या है ₹7.5 करोड़ वाला वीज़ा?

Permanent US visa

₹7.5 करोड़ वाला वीज़ा? ये अमेरिका का EB-5 इन्वेस्टर वीज़ा है, जिसे अब ट्रंप प्रशासन में Gold Card के नाम से नया रूप दिया गया है। खेल सीधा है – अगर आप अमेरिका में $800,000 से 1,050,000 डॉलर यानी लगभग ₹7 से ₹9 करोड़ निवेश करते हो और 10 अमेरिकियों के लिए नौकरी बनाते हो, तो अमेरिका आपको और आपके परिवार को हमेशा के लिए ग्रीन कार्ड दे देता है। इसे Citizenship by Investment कहते हैं। यानी पैसा दो, पासपोर्ट लो। इसके लिए दुनिया में सबसे ज्यादा आवेदन भारतीयों के हैं – करीब 13,000, और इस मामले में हमने चीन को भी पीछे छोड़ दिया है। दुबई के 5 फैमिली ऑफिस में भी सबसे ज्यादा पूछताछ भारतीयों की ही है।

13 हजार भारतीय क्यों भाग रहे हैं? 3 बड़ी वजह
चीन से आगे क्यों?

चीन में EB-5 का वेटिंग लिस्ट 10-12 साल का हो गया है, क्योंकि उनका कोटा फुल है। भारत का कोटा अभी भी खाली है, इसलिए भारतीय अमीरों के लिए ये सबसे तेज़ रास्ता है। दूसरा, चीन में पूंजी बाहर ले जाना बहुत मुश्किल है, भारत में LRS स्कीम से एक परिवार साल का $250,000 आसानी से बाहर भेज सकता है।

ये कौन लोग हैं?
ये IT वाले या नौकरी वाले नहीं हैं। ये वो लोग हैं जो खबर की दूसरी लाइन में दिख रहे हैं – “पेट, थायराइड… अमीर छात्र पहले स्कूल छोड़कर…” – मतलब दूसरी पीढ़ी के बिजनेसमैन। जिनके पास भारत में फैक्ट्री, हॉस्पिटल, या स्टार्टअप से कैश है, पर उन्हें अपने बच्चों के लिए अमेरिका की सुरक्षा और पढ़ाई चाहिए।
₹7.5 करोड़ उनके लिए बड़ी रकम नहीं है। मुंबई में एक 3BHK का दाम भी यही है।

H-1B से मोहभंग:
पहले भारतीय इंजीनियर H-1B से अमेरिका जाता था, फिर 15 साल ग्रीन कार्ड का इंतजार करता था। अब अमीर परिवार कह रहा है – 15 साल इंतजार क्यों करना, सीधा पैसा देकर ग्रीन कार्ड ले लो। ये H-1B वाली लाइन से निकलने का VIP गेट है।
3. इसका भारत पर क्या असर होगा?

वेल्थ ड्रेन, ब्रेन ड्रेन से भी खतरनाक
एक आम इंजीनियर जब जाता है तो उसकी सैलरी जाती है। जब एक करोड़पति जाता है तो उसके साथ उसकी पूरी पूंजी, उसका टैक्स, और उसकी अगली पीढ़ी का बिजनेस भी जाता है। Morgan Stanley की रिपोर्ट के अनुसार 2024-25 में 4,300 मिलियनेयर ने भारत छोड़ा, जो 2026 में 6,500 तक पहुंच सकता है।

दुबई का रोल
खबर में दुबई का जिक्र इसलिए है क्योंकि ज्यादातर भारतीय पैसा पहले दुबई जाता है, फिर दुबई से अमेरिका के EB-5 प्रोजेक्ट में लगता है। दुबई अब भारतीय अमीरों का वेटिंग रूम बन गया है।

रिस्क भी है…₹7.5 करोड़ देने से ग्रीन कार्ड की गारंटी नहीं है। अगर आपने जिस अमेरिकी प्रोजेक्ट में पैसा लगाया वो फेल हो गया, तो पैसा भी गया और वीज़ा भी नहीं मिला। अमेरिका में ऐसे 30% प्रोजेक्ट फेल होते हैं। कई गुजराती और पंजाबी परिवारों के साथ ऐसा हो चुका है।

ये खबर बताती है कि अमेरिका अब टैलेंट नहीं, पैसा इंपोर्ट कर रहा है। और भारतीय अमीर इसे सबसे जल्दी समझ गया है। पहले कहा जाता था – अमेरिकन ड्रीम मतलब मेहनत से अमीर बनो। नया अमेरिकन ड्रीम है – अमीर हो तो अमेरिका आ जाओ। 13,000 आवेदन सिर्फ एक नंबर नहीं है। ये 13,000 x ₹7.5 करोड़ = लगभग ₹1 लाख करोड़ का कैपिटल है जो भारत से बाहर जाने के लिए लाइन में खड़ा है।

Exit mobile version