ईरान में बाजार खुले, लेकिन खरीदार गायब; कॉलेज कैंपस में विरोध की आहट, सरकार ने दमन की तैयारी तेज की
ईरान में युद्ध के छह महीने बाद हालात सामान्य दिखाने की कोशिश जरूर हो रही है, लेकिन जमीन पर तस्वीर अलग है। तेहरान के बाजार खुले हैं, दुकानें चल रही हैं, सड़कों पर आवाजाही भी दिखाई दे रही है, लेकिन महंगाई, आर्थिक दबाव और भविष्य को लेकर अनिश्चितता ने आम लोगों की खरीदारी की क्षमता को बुरी तरह प्रभावित किया है। अखबार में प्रकाशित तेहरान से जुड़ी रिपोर्ट के मुताबिक, बाजार खुले होने के बावजूद कई जगहों पर ग्राहक नजर नहीं आ रहे हैं। दूसरी तरफ कॉलेज कैंपस में विरोध की आहट और सरकार की ओर से संभावित दमन की तैयारियां एक नए तनाव की ओर इशारा कर रही हैं।
बाजार खुले हैं, लेकिन जेब खाली है
ईरान की मौजूदा आर्थिक स्थिति को समझने के लिए बाजार सबसे बड़ा संकेतक है। रिपोर्ट में बताया गया है कि तेहरान में बाजार और दुकानें खुल रही हैं, लेकिन लोगों की खरीदारी कम हुई है। यानी समस्या सिर्फ सामान उपलब्ध होने की नहीं है, बल्कि लोगों की खरीदने की क्षमता कमजोर हो चुकी है।
महंगाई का असर रोजमर्रा की जरूरतों पर साफ दिखाई दे रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक पिछले छह महीने में ईरान में अंडों की कीमत करीब 147 प्रतिशत, खाद्य तेल की कीमत 128 प्रतिशत और कुकिंग ऑयल की कीमत कई गुना तक बढ़ने का उल्लेख है। ऐसे में परिवारों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि सीमित आय में घर का बजट कैसे चलाया जाए।
युद्ध या लंबे सैन्य तनाव की सबसे पहली कीमत आम नागरिक को महंगाई के रूप में चुकानी पड़ती है। सप्लाई चेन प्रभावित होती है, आयात महंगा होता है, मुद्रा पर दबाव बढ़ता है और सरकार के लिए सब्सिडी तथा जरूरी वस्तुओं की उपलब्धता बनाए रखना कठिन होता जाता है।
छह महीने बाद भी युद्ध का असर खत्म नहीं
रिपोर्ट में ईरान के एक नागरिक के अनुभव का उल्लेख है, जिसके मुताबिक युद्ध के शुरुआती दिनों का डर अब कुछ कम हुआ है, लेकिन राजनीति और भविष्य को लेकर चिंता बनी हुई है।
यह अंतर बेहद महत्वपूर्ण है।
पहले चिंता थी—आज क्या होगा?
अब चिंता है—कल क्या होगा?
यानी नागरिकों का मानसिक दबाव तत्काल युद्ध के डर से आगे बढ़कर आर्थिक और राजनीतिक अनिश्चितता में बदल रहा है। अगर लोगों को यह भरोसा नहीं है कि आने वाले महीनों में कीमतें स्थिर होंगी, रोजगार सुरक्षित रहेगा और राजनीतिक स्थिति सुधरेगी, तो बाजारों का खुला होना अपने आप में सामान्य स्थिति का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
कॉलेज कैंपस क्यों बन रहे हैं अहम?
ईरान में विश्वविद्यालय लंबे समय से राजनीतिक असंतोष की अभिव्यक्ति के महत्वपूर्ण केंद्र रहे हैं। रिपोर्ट में कॉलेज कैंपस में विरोध की आहट और सरकार द्वारा दमन की तैयारी का जिक्र किया गया है।
यह सरकार के लिए सबसे संवेदनशील स्थिति हो सकती है। आर्थिक संकट जब युवाओं की बेरोजगारी, भविष्य की चिंता और राजनीतिक असंतोष से जुड़ जाता है, तब विश्वविद्यालयों में आंदोलन तेजी से फैल सकता है।
युवाओं का सवाल सिर्फ महंगाई तक सीमित नहीं होता। वे पूछते हैं—शिक्षा के बाद नौकरी मिलेगी या नहीं? देश की अर्थव्यवस्था कब सुधरेगी? राजनीतिक स्थिरता कब आएगी? और उनके भविष्य का रास्ता क्या होगा?
इसलिए कैंपस की हलचल को केवल छात्र विरोध मानना बड़ी रणनीतिक भूल हो सकती है। यह व्यापक सामाजिक असंतोष का शुरुआती संकेत भी बन सकता है।
सरकार की रणनीति—बातचीत या दमन?
रिपोर्ट में सरकार द्वारा संभावित दमन की तैयारी का संकेत दिया गया है। यह स्थिति ईरान के सामने सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती पैदा करती है।
सरकार के पास दो रास्ते हैं—पहला, आर्थिक समस्याओं और युवाओं की शिकायतों को बातचीत के जरिए संभालना; दूसरा, विरोध को सुरक्षा व्यवस्था के जरिए नियंत्रित करना।
दमन तत्काल तौर पर सड़कों पर विरोध को कम कर सकता है, लेकिन इसके साथ एक बड़ा जोखिम जुड़ा है। अगर आर्थिक समस्या बनी रहती है तो असंतोष खत्म नहीं होता, बल्कि वह भीतर ही भीतर बढ़ सकता है।
यही वजह है कि किसी भी सरकार के लिए आर्थिक संकट के दौरान केवल कानून-व्यवस्था पर निर्भर रहना दीर्घकाल में महंगा साबित हो सकता है।
फांसी के आंकड़े भी चिंता बढ़ा रहे हैं
रिपोर्ट में पिछले छह महीनों में 511 लोगों को फांसी दिए जाने और लगभग 78 लोगों के अगले महीने मौत की सजा के खतरे में होने का उल्लेख किया गया है। यदि ये आंकड़े सही हैं, तो यह ईरान में कठोर सुरक्षा और न्यायिक कार्रवाई के बढ़ते स्तर की गंभीर तस्वीर पेश करते हैं।
ऐसे आंकड़े अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ईरान की छवि और मानवाधिकारों को लेकर सवाल बढ़ा सकते हैं। खासतौर पर उस समय जब देश पहले से आर्थिक संकट और राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा हो।
असली संकट बाजार से बड़ा है
ईरान की मौजूदा स्थिति को सिर्फ युद्ध या महंगाई के नजरिए से देखना पर्याप्त नहीं होगा। असली संकट अर्थव्यवस्था + राजनीति + युवा असंतोष + सुरक्षा नीति के बीच बन रहे गठजोड़ का है।
बाजार खुले हैं, लेकिन ग्राहक कम हैं। कॉलेज खुले हैं, लेकिन कैंपस में असंतोष है। सरकार नियंत्रण बनाए रखना चाहती है, लेकिन जनता आर्थिक राहत चाहती है।
यही विरोधाभास आने वाले समय में ईरान की दिशा तय कर सकता है।
अगर सरकार महंगाई पर नियंत्रण, रोजगार और जरूरी वस्तुओं की उपलब्धता में सुधार करने में सफल होती है, तो असंतोष को सीमित किया जा सकता है। लेकिन यदि कीमतें इसी तरह बढ़ती रहीं और राजनीतिक प्रतिक्रिया का मुख्य तरीका दमन बना रहा, तो कॉलेज कैंपस से उठने वाली आवाजें धीरे-धीरे समाज के दूसरे हिस्सों तक पहुंच सकती हैं।
यानी ईरान में फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि बाजार खुले हैं या बंद। असली सवाल यह है कि बाजार खुले होने के बावजूद आम ईरानी की जेब कितनी खाली है और कॉलेज कैंपस में उठ रही आवाज कितनी दूर तक जाती है।
नोट: ऊपर का विश्लेषण आपके साझा किए गए अखबार की रिपोर्ट और उसमें दिए गए आंकड़ों पर आधारित है; 511 फांसी, महंगाई प्रतिशत आदि आंकड़ों का स्वतंत्र सत्यापन इसमें नहीं किया गया है।




