लोकसभा चुनाव 2019 से पहले अभिनेता Akshay Kumar द्वारा प्रधानमंत्री Narendra Modi का लिया गया गैर-राजनीतिक इंटरव्यू एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है। उस इंटरव्यू में प्रधानमंत्री से पूछा गया था कि उन्हें कौन सा आम पसंद है, जिस पर उन्होंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया था — “मालदा… बंगाल का मालदा। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी शपथ समारोह में मालदा आम की भेंट और पुराने इंटरव्यू के वायरल होने से बढ़ी सियासी चर्चाएं माखनलाल सरकार से मुलाकात और शुभेंदु अधिकारी के आम उपहार को लेकर सोशल मीडिया पर तरह-तरह की व्याख्याएं…
इसके बाद अक्षय कुमार ने हल्के अंदाज में पूछा था कि आम काटकर खाते हैं या चूसकर? इस पर मोदी ने जवाब दिया था — “दोनों तरह से।” उस समय इस बातचीत को लेकर सोशल मीडिया पर काफी चर्चा हुई थी। कुछ लोगों ने इसे हल्का-फुल्का और घरेलू अंदाज वाला इंटरव्यू बताया था, जबकि विपक्षी दलों और आलोचकों ने इसका मजाक भी उड़ाया था।
पश्चिम बंगाल में हालिया राजनीतिक घटनाक्रम और शपथ ग्रहण समारोह के बाद वही “मालदा आम” वाला प्रसंग फिर से चर्चा में आ गया है। सोशल media पर लोग पुराने इंटरव्यू की क्लिप साझा करते हुए उसके राजनीतिक मायने निकाल रहे हैं।
दरअसल, हाल में आयोजित एक बड़े राजनीतिक समारोह में 98 वर्षीय जनसंघ कार्यकर्ता माखनलाल सरकार भी मौजूद थे। उन्हें बंगाल में जनसंघ के सबसे पुराने जीवित कार्यकर्ताओं में गिना जाता है। समारोह के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने मंच पर जाकर उनके पैर छुए, उन्हें गले लगाया और सम्मान व्यक्त किया। यह दृश्य सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में काफी चर्चा का विषय बना।
बताया जा रहा है कि माखनलाल सरकार प्रधानमंत्री के लिए बंगाल के प्रसिद्ध मालदा आम लेकर पहुंचे थे। उन्होंने प्रधानमंत्री से मुलाकात के दौरान कथित तौर पर सिर्फ तीन शब्द कहे — “लक्ष्य पूरा हुआ।” इसके बाद से इस पूरे घटनाक्रम को भाजपा समर्थक लंबे राजनीतिक संघर्ष और बंगाल में पार्टी के विस्तार से जोड़कर देख रहे हैं। इसी समारोह में CM Suvendu Adhikari ने भी प्रधानमंत्री मोदी को मालदा आम भेंट किए। इसके बाद सोशल मीडिया पर 2019 के इंटरव्यू की चर्चा अचानक तेज हो गई। कई यूजर्स “मालदा… काटकर भी और चूसकर भी…” वाले बयान को वर्तमान बंगाल की राजनीति से जोड़ते हुए अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं।
हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सोशल मीडिया के दौर में पुराने बयान और प्रतीकात्मक घटनाएं अक्सर नए संदर्भों में वायरल हो जाती हैं। कई बार सामान्य बातचीत या सांस्कृतिक संदर्भ भी राजनीतिक अर्थ ग्रहण कर लेते हैं। बंगाल की राजनीति में प्रतीकों, सांस्कृतिक संकेतों और भावनात्मक संदेशों की हमेशा महत्वपूर्ण भूमिका रही है और “मालदा आम” की मौजूदा चर्चा को भी उसी संदर्भ में देखा जा रहा है।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार भाजपा लंबे समय से पश्चिम बंगाल में अपनी वैचारिक और संगठनात्मक जड़ें मजबूत करने की कोशिश कर रही है। जनसंघ के पुराने कार्यकर्ताओं को सम्मान देना और उनसे जुड़ी स्मृतियों को सामने लाना पार्टी की उसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। वहीं विपक्ष इसे भाजपा की राजनीतिक ब्रांडिंग और प्रतीकात्मक राजनीति करार दे रहा है।
सोशल मीडिया पर इस पूरे घटनाक्रम को लेकर मीम्स, वीडियो क्लिप और राजनीतिक टिप्पणियों की बाढ़ आ गई है। कुछ लोग इसे केवल एक संयोग और हल्की-फुल्की राजनीतिक चर्चा बता रहे हैं, जबकि कुछ इसे बंगाल की बदलती राजनीति का संकेत मान रहे हैं। फिलहाल इतना तय है कि “मालदा आम” अब केवल एक फल नहीं, बल्कि बंगाल की मौजूदा राजनीति में एक चर्चित प्रतीक बन चुका है। और 2019 में कही गई प्रधानमंत्री मोदी की वही पंक्ति — “काटकर भी और चूसकर भी” — एक बार फिर राजनीतिक गलियारों और सोशल मीडिया में चर्चा का केंद्र बनी हुई है।