केरल में मुख्यमंत्री चयन और सरकार गठन को लेकर चला लंबा मंथन खत्म होने के बाद अब कांग्रेस हाईकमान की नजर कर्नाटक पर टिक गई है। राज्य में पिछले कई महीनों से चल रही अंदरूनी खींचतान एक बार फिर तेज होती दिखाई दे रही है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार के बीच नेतृत्व को लेकर चल रही राजनीतिक प्रतिस्पर्धा अब पार्टी के लिए नई चुनौती बनती जा रही है।
Kerala संकट खत्म होते ही Karnataka की अंदरूनी राजनीति फिर चर्चा के केंद्र में आ गई
कांग्रेस नेतृत्व ने पिछले कुछ महीनों में अपना पूरा फोकस केरल समेत कई राज्यों के चुनाव और वहां सरकार गठन पर लगाया था। इसी कारण कर्नाटक में चल रही सत्ता संघर्ष की चर्चा कुछ समय के लिए धीमी पड़ गई थी। लेकिन अब केरल का मामला लगभग सुलझने के बाद पार्टी के भीतर फिर वही सवाल उठने लगे हैं कि कर्नाटक में आगे नेतृत्व किसके हाथ में रहेगा।
पिछले साल नवंबर में भी नेतृत्व परिवर्तन की चर्चाओं ने पार्टी के भीतर हलचल मचा दी थी। उस समय हाईकमान ने किसी तरह मामला शांत करा दिया था, लेकिन कोई स्थायी समाधान सामने नहीं आया था। अब एक बार फिर दोनों खेमे सक्रिय दिखाई दे रहे हैं।
Siddaramaiah कैबिनेट विस्तार के जरिए अपनी पकड़ मजबूत करने की रणनीति में जुटे
सूत्रों के अनुसार मुख्यमंत्री सिद्धारमैया मंत्रिमंडल विस्तार और खाली पड़े मंत्री पदों को भरने के पक्ष में हैं। माना जा रहा है कि अगर कैबिनेट में फेरबदल होता है तो इससे उनकी प्रशासनिक पकड़ और मजबूत हो सकती है। पार्टी के कई विधायक भी मंत्री बनने की उम्मीद में लगातार लॉबिंग कर रहे हैं।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि सिद्धारमैया अपने समर्थकों को मंत्रिमंडल में जगह देने में सफल रहते हैं, तो इससे विधानसभा और संगठन दोनों में उनकी स्थिति और मजबूत होगी। यही वजह है कि उनका खेमा फिलहाल इंतजार और संतुलन की राजनीति पर काम कर रहा है।
DK Shivakumar अब भी मुख्यमंत्री बनने की उम्मीद छोड़े बिना दबाव बनाए हुए हैं
दूसरी तरफ डीके शिवकुमार का खेमा लगातार इस बात की याद दिला रहा है कि विधानसभा चुनाव के बाद सत्ता साझा करने को लेकर कथित समझौता हुआ था। शिवकुमार समर्थकों का मानना है कि कांग्रेस की ऐतिहासिक जीत में उनकी बड़ी भूमिका रही थी और अब उन्हें मुख्यमंत्री बनने का अवसर मिलना चाहिए।
हाल के दिनों में उनके जन्मदिन पर लगाए गए पोस्टरों ने भी राजनीतिक अटकलों को और तेज कर दिया। कई पोस्टरों में उन्हें “कर्नाटक का अगला मुख्यमंत्री” बताया गया। मैसूरु में समर्थकों ने ऐसा केक भी काटा जिसमें शिवकुमार को अगले सीएम के रूप में दिखाया गया था। इससे साफ संकेत मिला कि उनका खेमा अब खुलकर शक्ति प्रदर्शन के मूड में है।
कांग्रेस हाईकमान फिलहाल टकराव टालने की रणनीति पर आगे बढ़ रहा है
दिल्ली में पार्टी नेतृत्व फिलहाल किसी बड़े फैसले से बचता दिखाई दे रहा है। माना जा रहा है कि हाईकमान नहीं चाहता कि जल्दबाजी में लिया गया कोई भी निर्णय पार्टी को नुकसान पहुंचाए। क्योंकि अगर सिद्धारमैया को जारी रखा जाता है तो शिवकुमार समर्थक नाराज हो सकते हैं, वहीं नेतृत्व परिवर्तन होने पर सिद्धारमैया खेमे में असंतोष बढ़ सकता है।
यही कारण है कि अब तक कांग्रेस नेतृत्व ने फैसला टालने की नीति अपनाई है। लेकिन लगातार बढ़ते दबाव और सार्वजनिक राजनीतिक संकेतों के चलते यह रणनीति लंबे समय तक चल पाना मुश्किल माना जा रहा है।
आने वाले महीनों में Karnataka Congress की राजनीति और गर्म होने के संकेत
राज्य में स्थानीय निकाय चुनाव और ग्रेटर बेंगलुरु अथॉरिटी से जुड़े राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए कांग्रेस बेहद सावधानी से कदम बढ़ाना चाहती है। पार्टी की कोशिश सरकार को स्थिर बनाए रखने की है, लेकिन दोनों नेताओं की महत्वाकांक्षाएं खुलकर सामने आने लगी हैं।
अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि कांग्रेस हाईकमान आखिर कब और कैसे इस राजनीतिक संतुलन को संभालेगा। फिलहाल इतना तय माना जा रहा है कि केरल के बाद अब कर्नाटक कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी राजनीतिक परीक्षा बनने जा रहा है।