भारतीय ज्यादा जी रहे हैं, लेकिन स्वस्थ जीवन के साल कम WHO रिपोर्ट में सामने आई तस्वीर, भारत की औसत उम्र 71 साल, हेल्दी लाइफ एक्सपेक्टेंसी सिर्फ 60.6 साल

Indians are living longer but spending few years in good health WHO report reveals the picture

लंबी जिंदगी हर किसी की चाहत होती है, लेकिन सवाल सिर्फ यह नहीं कि इंसान कितने साल जी रहा है। असली सवाल यह है कि उन सालों में से कितने साल वह स्वस्थ और सक्रिय रह पा रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी WHO के ताजा अनुमानों में भारत को लेकर इसी अंतर की तस्वीर सामने आई है। वर्ष 2023 में भारत में जन्म के समय औसत जीवन प्रत्याशा 71 साल रही। यानी औसतन एक भारतीय के करीब 71 साल तक जीने का अनुमान है। लेकिन स्वस्थ जीवन की औसत अवधि इससे करीब 10 साल कम रही। 2023 में भारत की हेल्दी लाइफ एक्सपेक्टेंसी 60.6 साल आंकी गई।

पाकिस्तान से आगे, लेकिन बांग्लादेश से पीछे

WHO के आंकड़ों में भारत की स्थिति पड़ोसी देशों के बीच भी दिलचस्प दिखाई देती है। 2023 में भारत की औसत जीवन प्रत्याशा 71 साल रही, जबकि पाकिस्तान में यह 68.2 साल थी। यानी भारत में औसत जीवन प्रत्याशा पाकिस्तान से करीब 3 साल ज्यादा रही। लेकिन बांग्लादेश भारत से आगे रहा। वहां 2023 में जन्म के समय औसत जीवन प्रत्याशा 72.7 साल थी। यानी दक्षिण एशिया में सिर्फ ज्यादा आबादी या आर्थिक आकार से जीवन प्रत्याशा तय नहीं होती। स्वास्थ्य व्यवस्था, पोषण, जीवनशैली और बीमारियों का बोझ भी इसमें बड़ी भूमिका निभाता है।

अमेरिका और कनाडा से कितना पीछे?

अगर भारत की तुलना विकसित देशों से करें तो अंतर और बड़ा दिखाई देता है। 2023 में अमेरिका में औसत जीवन प्रत्याशा 78.5 साल और कनाडा में 81.4 साल थी। भारत और अमेरिका के बीच करीब साढ़े सात साल का अंतर रहा, जबकि कनाडा की तुलना में अंतर 10 साल से ज्यादा रहा। लेकिन यहां भी केवल जीवन प्रत्याशा देखना पर्याप्त नहीं है। असली तस्वीर तब सामने आती है जब स्वस्थ जीवन के वर्षों को इसमें शामिल किया जाए।

71 साल की जिंदगी, स्वस्थ साल सिर्फ 60.6

भारत में 2023 की हेल्दी लाइफ एक्सपेक्टेंसी 60.6 साल रही। यानी जीवन प्रत्याशा और स्वस्थ जीवन के बीच करीब 10 साल का अंतर दिखाई देता है। इसका मतलब यह नहीं है कि हर भारतीय 60.6 साल के बाद बीमार हो जाता है। यह एक आबादी-स्तरीय औसत अनुमान है। इस आंकड़े का संकेत यह है कि जीवन के अंतिम वर्षों में बीमारी, विकलांगता या स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का बोझ बढ़ सकता है। यहीं से स्वास्थ्य नीति की असली चुनौती शुरू होती है। सिर्फ लोगों की उम्र बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। कोशिश यह होनी चाहिए कि लोग ज्यादा साल तक स्वस्थ, सक्रिय और आत्मनिर्भर भी रहें।

कोरोना के बाद क्या बदला?

भारत की हेल्दी लाइफ एक्सपेक्टेंसी में भी उतार-चढ़ाव दिखाई दिया। 2019 में यह 60.5 साल थी। 2021 में कोरोना महामारी के दौरान घटकर 58.4 साल रह गई। इसके बाद 2022 में इसमें सुधार हुआ और यह 60.2 साल पहुंची। 2023 में यह 60.6 साल हो गई। यानी महामारी के झटके के बाद स्वस्थ जीवन के वर्षों में सुधार हुआ, लेकिन WHO के मुताबिक वैश्विक स्तर पर स्वस्थ जीवन की अवधि में सुधार जीवन प्रत्याशा की तुलना में धीमी गति से हुआ है।

असली चुनौती बीमारी से बचाव की

इन आंकड़ों का सबसे बड़ा संदेश यही है कि स्वास्थ्य व्यवस्था की सफलता सिर्फ मृत्यु दर कम करने या जीवन प्रत्याशा बढ़ाने से नहीं मापी जा सकती। उच्च रक्तचाप, मधुमेह, हृदय रोग, कैंसर जैसी गैर-संचारी बीमारियां लंबे समय तक इलाज और देखभाल की जरूरत पैदा कर सकती हैं। ऐसे में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं, समय पर जांच, पोषण, व्यायाम, मानसिक स्वास्थ्य और बीमारी की रोकथाम पर जोर बढ़ाना जरूरी हो जाता है।

लंबी जिंदगी नहीं, स्वस्थ जिंदगी लक्ष्य

WHO के ग्लोबल हेल्थ एस्टीमेट्स में वर्ष 2000 से 2023 तक जीवन प्रत्याशा, स्वस्थ जीवन प्रत्याशा, मृत्यु के कारण और बीमारी के बोझ जैसे कई संकेतकों का आकलन किया गया है। इस रिपोर्ट की तस्वीर को एक लाइन में समझें तो भारत में लोग पाकिस्तान की तुलना में औसतन ज्यादा जी रहे हैं, लेकिन बांग्लादेश, अमेरिका और कनाडा से जीवन प्रत्याशा में पीछे हैं। और इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि जिंदगी के कुल वर्षों और स्वस्थ वर्षों के बीच करीब एक दशक का अंतर मौजूद है। यही आने वाले वर्षों की सबसे बड़ी स्वास्थ्य चुनौती है। सवाल सिर्फ यह नहीं कि भारतीय कितने साल जिएं। सवाल यह है कि वे कितने साल स्वस्थ, सक्रिय और सम्मानजनक जीवन जिएं।

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