जब सूखा सरकारें गिरा देता था, अब क्यों नहीं?
1965-67 के अकाल से आज के कमजोर मानसून तक, भारत की अर्थव्यवस्था ने कैसे बदली अपनी तस्वीर
बारिश सामान्य से 12.6 फीसदी कम हुई है। सूखे खेत, परेशान किसान और कुछ इलाकों में महंगाई का दबाव दिखाई दे सकता है। लेकिन आज कमजोर मानसून का मतलब यह नहीं है कि देश आर्थिक संकट की तरफ बढ़ रहा है। कुछ दशक पहले तस्वीर बिल्कुल अलग थी। तब मानसून की नाकामी सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं रहती थी। उसका सीधा असर खाद्यान्न उत्पादन, महंगाई, सरकारी खजाने और आखिरकार राजनीति पर पड़ता था। यानी कभी बारिश की कमी सरकारों के लिए राजनीतिक संकट बन जाती थी। आज वही स्थिति अर्थव्यवस्था के लिए एक चुनौती तो है, लेकिन पूरे देश को हिला देने वाला संकट नहीं।
1965 का सूखा और ‘शिप टू माउथ’ भारत
1965 में भारत लगातार दो कमजोर मानसून की शुरुआत का सामना कर रहा था। खाद्यान्न उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हुआ। खाने-पीने की चीजों की कीमतें बढ़ीं और देश को अमेरिका से मिलने वाली खाद्य सहायता पर निर्भर होना पड़ा। उस दौर में भारत की स्थिति को ‘शिप टू माउथ’ कहा जाता था। यानी विदेश से जहाजों में अनाज आता था और उसी से देश की खाद्य जरूरतें पूरी होती थीं। भारत के पास आज जैसी मजबूत खाद्यान्न भंडारण व्यवस्था नहीं थी। कृषि पूरी तरह मानसून पर निर्भर थी और सिंचाई का दायरा भी सीमित था। इसलिए बारिश की कमी का मतलब सीधे भोजन की कमी था।
सूखा आया तो राजनीति भी हिल गई
1965-67 के संकट का असर सिर्फ अर्थव्यवस्था तक नहीं रहा। खाद्य संकट, महंगाई और दूसरी आर्थिक परेशानियां राजनीतिक असंतोष में बदलने लगीं। 1967 के चुनाव में कांग्रेस केंद्र में सरकार बनाने में सफल रही, लेकिन कई राज्यों में उसे सत्ता गंवानी पड़ी। बाद के वर्षों में दल-बदल ने राजनीतिक अस्थिरता को और बढ़ाया। हालांकि उस दौर के राजनीतिक संकट की वजह सिर्फ सूखा नहीं था। पाकिस्तान के साथ युद्ध, विदेशी सहायता पर रोक, रुपये का अवमूल्यन और अन्य आर्थिक परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण थीं। लेकिन लगातार कमजोर मानसून ने संकट को गहरा जरूर किया।
1972 के बाद भी सूखे का असर
1971 में इंदिरा गांधी ने ‘गरीबी हटाओ’ के नारे के साथ बड़ी राजनीतिक जीत हासिल की। पाकिस्तान के साथ युद्ध और बांग्लादेश के निर्माण के बाद उनकी राजनीतिक स्थिति बेहद मजबूत हुई। लेकिन इसके तुरंत बाद देश को एक और गंभीर सूखे का सामना करना पड़ा। यह दौर याद दिलाता है कि जब किसी देश की अर्थव्यवस्था कृषि और मानसून पर अत्यधिक निर्भर हो, तब मौसम सिर्फ मौसम नहीं रहता। वह अर्थव्यवस्था और राजनीति दोनों को प्रभावित करने वाली ताकत बन जाता है।
फिर भारत ने क्या बदला?
आज की स्थिति को समझने के लिए सबसे बड़ा फर्क कृषि और खाद्य सुरक्षा में आया बदलाव है। हरित क्रांति के बाद भारत ने खाद्यान्न उत्पादन में बड़ी छलांग लगाई। सिंचाई का विस्तार हुआ। उन्नत बीज, उर्वरक और कृषि तकनीक का इस्तेमाल बढ़ा। इसके साथ ही सरकार ने खाद्यान्न खरीद और भंडारण की व्यवस्था को मजबूत किया। सार्वजनिक वितरण प्रणाली और खाद्य सुरक्षा के दूसरे उपायों ने भी कमजोर फसल के असर को सीमित करने में भूमिका निभाई। यही वजह है कि आज मानसून कमजोर होने पर भी देश के सामने तत्काल वैसा खाद्य संकट नहीं खड़ा होता, जैसा 1960 के दशक में दिखाई देता था।
अर्थव्यवस्था अब सिर्फ खेती पर निर्भर नहीं
दूसरा बड़ा बदलाव अर्थव्यवस्था की संरचना में हुआ है। 1960 के दशक में कृषि का राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में बहुत बड़ा हिस्सा था और करोड़ों लोगों की आय सीधे खेती से जुड़ी थी। आज उद्योग और सेवा क्षेत्र अर्थव्यवस्था में कहीं बड़ी भूमिका निभाते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि मानसून का महत्व खत्म हो गया है। किसानों की आय, ग्रामीण मांग, खाद्य कीमतें और कुछ कृषि उत्पादों की कीमतें आज भी बारिश से प्रभावित होती हैं। कमजोर मानसून से ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव आ सकता है। लेकिन उसका असर पूरी अर्थव्यवस्था में उसी अनुपात में फैलना जरूरी नहीं है।
अब सूखा सरकार नहीं गिराता, लेकिन चेतावनी जरूर देता है
आज कमजोर मानसून का सबसे बड़ा असर स्थानीय और क्षेत्रीय स्तर पर दिखाई दे सकता है। किसी इलाके में पानी की कमी हो सकती है। सिंचाई प्रभावित हो सकती है। फसल का उत्पादन घट सकता है। किसानों की लागत और आय का संतुलन बिगड़ सकता है। कुछ खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर दबाव आ सकता है। यानी खतरा खत्म नहीं हुआ है, उसका स्वरूप बदल गया है। अब चुनौती यह है कि कमजोर बारिश का असर किसानों की आय, खाद्य महंगाई और ग्रामीण मांग तक कितना सीमित रखा जा सकता है।
1965 और आज के भारत में सबसे बड़ा फर्क
1965 का भारत मानसून का इंतजार करता था क्योंकि उसके पास विकल्प सीमित थे। आज भारत के पास सिंचाई, खाद्यान्न भंडार, बेहतर कृषि तकनीक, मौसम पूर्वानुमान, बाजार व्यवस्था और अपेक्षाकृत विविध अर्थव्यवस्था जैसे कई सुरक्षा कवच हैं। यही वजह है कि आज 12.6 फीसदी कम बारिश चिंता की खबर जरूर है, लेकिन अपने आप में राष्ट्रीय आर्थिक तबाही का संकेत नहीं। कभी भारत में बारिश की कमी का मतलब था अनाज की कमी। अनाज की कमी का मतलब था महंगाई। महंगाई का मतलब था आर्थिक संकट और आर्थिक संकट जल्दी ही राजनीतिक संकट में बदल सकता था। आज कहानी बदल चुकी है। कमजोर मानसून अब भी किसानों के लिए गंभीर चुनौती है। खाद्य महंगाई का खतरा भी बना रहता है। लेकिन भारत ने पिछले छह दशकों में ऐसे कई सुरक्षा कवच तैयार किए हैं, जिनसे मौसम के झटके को पूरी अर्थव्यवस्था तक पहुंचने से रोका जा सकता है। यानी कभी मानसून सरकारों की किस्मत तय करता था। आज मानसून अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है, लेकिन उसकी दिशा तय करने वाली अकेली ताकत नहीं है।