ऑस्ट्रेलिया का प्यारा-सा कोआला आज संकट में है, लेकिन उसके संकट की कहानी नई नहीं है। वैज्ञानिकों ने कोआला के आनुवंशिक इतिहास में करीब एक लाख साल पीछे जाकर जो तस्वीर खोजी है, वह बेहद दिलचस्प है। नए जीनोमिक अध्ययन के मुताबिक कोआला की आबादी में बड़ी गिरावट इंसानों के ऑस्ट्रेलिया पहुंचने से पहले ही शुरू हो चुकी थी। यानी कोआला के इतिहास में पहली बड़ी आबादी गिरावट के लिए सीधे तौर पर इंसानों को जिम्मेदार ठहराने वाली पुरानी धारणा अब कमजोर पड़ती है।
लेकिन इस शोध की असली कहानी सिर्फ इतनी नहीं है। कोआला पहले भी जलवायु के बड़े संकट से बच चुका है। फर्क यह है कि आज उसके सामने संकट का कारण प्रकृति से ज्यादा मानव गतिविधियां हैं।
डीएनए ने खोला हजारों साल पुराना राज
सिडनी विश्वविद्यालय और टेक्सास ए एंड एम विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने कोआला के जीनोम का विस्तृत अध्ययन किया। इसके लिए चार माता-पिता-संतान समूहों के जीनोम से नई आनुवंशिक म्यूटेशन दर का अनुमान लगाया गया और फिर जंगलों में पाए जाने वाले 457 कोआला के पूरे जीनोम का विश्लेषण कर उनकी आबादी का पुराना इतिहास दोबारा तैयार किया गया। यह अध्ययन जून 2026 में Molecular Biology and Evolution में प्रकाशित हुआ।
शोध में कोआला की औसत म्यूटेशन दर 6.12 × 10⁻⁹ प्रति आधार युग्म प्रति पीढ़ी आंकी गई, जो अध्ययन में इस्तेमाल मानव अनुमान की तुलना में लगभग आधी है। यही नई दर वैज्ञानिकों को कोआला की आबादी के इतिहास की समय-रेखा को अधिक सटीक तरीके से समझने में मदद करती है। यानी वैज्ञानिकों ने कोआला के डीएनए को सिर्फ पहचान के लिए नहीं, बल्कि एक तरह की जैविक घड़ी की तरह इस्तेमाल किया।
सबसे बड़ा झटका इंसानों से पहले लगा
अध्ययन के मुताबिक कोआला की आबादी करीब 1.20 लाख साल पहले घटनी शुरू हुई और लगभग 60 हजार साल पहले उसकी प्रभावी आबादी सबसे निचले स्तर पर पहुंची। यह समय ऑस्ट्रेलिया में जलवायु के अधिक ठंडे और शुष्क होने तथा वातावरण के क्रमिक शुष्कीकरण से जुड़ा हुआ था।
यहां एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक सावधानी भी जरूरी है। अध्ययन सीधे यह साबित नहीं करता कि केवल तापमान में बदलाव ही कोआला की आबादी गिरने का एकमात्र कारण था। शोधकर्ता इसे उस दौर में ऑस्ट्रेलिया के बदलते पर्यावरण और शुष्कीकरण से जोड़ते हैं। बदलते आवास और जंगलों के अलग-अलग हिस्सों में बंटने से कोआला की आबादी पर दबाव पड़ा होगा।
लेकिन एक बात स्पष्ट होती है—कोआला की प्राचीन आबादी में बड़ी गिरावट आधुनिक इंसानों के ऑस्ट्रेलिया पहुंचने से पहले शुरू हो चुकी थी। अध्ययन में ऑस्ट्रेलिया में आधुनिक मानव आगमन का अनुमान लगभग 65 हजार से 47 हजार साल पहले का संदर्भ देता है।
जब हजारों नहीं, छोटी आबादी ने बचाई पूरी प्रजाति
यहां कहानी और रोचक हो जाती है। इतनी बड़ी गिरावट के बाद भी कोआला पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। एक छोटी आबादी कठिन परिस्थितियों में बची रही। बाद में पर्यावरणीय परिस्थितियां बदलीं तो कोआला फिर फैलने लगा। शोध के अनुसार आधुनिक कोआला आबादी बाद में पांच आनुवंशिक आबादियों में विभाजित हुईं, जो आज मुख्य रूप से ऑस्ट्रेलिया के पूर्वी तट पर पाई जाती हैं। यह विभाजन लगभग 6 हजार से 30 हजार वर्ष पहले के बीच हुआ। यानी आज अलग-अलग क्षेत्रों में मिलने वाले कोआला दरअसल उस प्राचीन आबादी के वंशज हैं, जिसने जलवायु और पर्यावरण के बेहद कठिन दौर को पार किया था।
प्रकृति से बच निकले, इंसानी दबाव में फंस गए
यहीं यह शोध वर्तमान समय से जुड़ता है। कोआला ने हजारों साल पहले प्राकृतिक जलवायु बदलाव का सामना किया। लेकिन आज उसके सामने आवास का नुकसान, जंगलों का कटना, आग, बीमारी और मानवीय गतिविधियों से जुड़ा दबाव मौजूद है। पहले के आनुवंशिक शोधों में भी यह सामने आया है कि ऐतिहासिक शिकार और बाद की मानवीय गतिविधियों ने कोआला की आबादी और आनुवंशिक विविधता पर असर डाला है।
इसलिए अतीत और वर्तमान के संकट में एक महत्वपूर्ण अंतर है। तब वातावरण बदला और कोआला ने खुद को बचाया। आज वातावरण और उसका आवास इंसानी गतिविधियों से तेजी से बदल रहा है।
सबसे बड़ा सबक—छोटी आबादी कितनी बड़ी कीमत चुकाती है
जीनोमिक अध्ययन संरक्षण के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आबादी का आकार घटने के साथ आनुवंशिक विविधता भी प्रभावित हो सकती है। अगर किसी प्रजाति की आबादी लंबे समय तक बहुत छोटी रहती है, तो उसके पास बदलते वातावरण, बीमारी या दूसरे संकटों से निपटने के लिए आनुवंशिक विकल्प सीमित हो सकते हैं। कोआला के मामले में वैज्ञानिकों ने जो पुराना जनसंख्या इतिहास तैयार किया है, वह संरक्षण विशेषज्ञों को यह समझने में मदद कर सकता है कि अलग-अलग आबादियां कितनी जुड़ी हुई हैं और उनकी आनुवंशिक स्थिति कैसी है। शोधकर्ताओं ने इसे भविष्य के विकासवादी और संरक्षण संबंधी अध्ययनों के लिए महत्वपूर्ण संसाधन बताया है।
कोआला की कहानी अब चेतावनी भी है
कोआला का इतिहास एक दिलचस्प विरोधाभास सामने रखता है। एक लाख साल पहले प्रकृति ने परीक्षा ली।
करीब 60 हजार साल पहले आबादी अपने न्यूनतम स्तर तक पहुंची। फिर कोआला ने वापसी की। लेकिन आज परिस्थिति अलग है।
अब सवाल यह नहीं है कि कोआला कभी जलवायु परिवर्तन से बचा था या नहीं। सवाल यह है कि क्या उसकी वर्तमान आबादी के पास मानव-निर्मित तेज बदलावों से बचने के लिए पर्याप्त आवास और आनुवंशिक विविधता बची रहेगी?
यही इस नए शोध का सबसे बड़ा संदेश है। कोआला की प्राचीन कहानी हमें बताती है कि यह प्रजाति संकट से उबरने की क्षमता रखती है। लेकिन उसकी आधुनिक कहानी यह चेतावनी देती है कि अगर संकट लगातार बढ़ता रहा और सुरक्षित आवास घटता गया, तो लाखों वर्षों की विकास यात्रा को बचाना केवल प्रकृति के भरोसे संभव नहीं होगा। कोआला पहले भी लगभग खत्म होने के कगार तक पहुंचा था। फर्क सिर्फ इतना है कि तब दुश्मन बदलता हुआ मौसम था, और आज उसके सामने इंसान के बनाए बदलते हालात हैं।