26 अगस्त को नेपाल की ओर से आई भूस्खलन आपदा के कारण चीन-नेपाल सीमा पर बड़े पैमाने
पर जनहानि और लोगों के लापता होने की घटना पर छिंगहाई-शीत्सांग पठार और हिमालय क्षेत्र
पर लंबे समय से शोध कर रहे वरिष्ठ विद्वान और नेपाल के पूर्व राजदूत डॉ. कृष्ण प्रसाद ओली ने
28 अगस्त की रात चाइना मीडिया ग्रुप(सीएमजी) नेपाली विभाग को दिए एक साक्षात्कार में
कहा कि जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालय क्षेत्र में प्राकृतिक आपदाएँ बढ़ रही हैं। उन्होंने कहा
कि इन आपदाओं से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग, वैज्ञानिक अनुसंधान
तथा प्रौद्योगिकी और अनुभवों के आदान-प्रदान को मजबूत करना जरूरी है।
साक्षात्कार के दौरान डॉ. ओली ने हिमालय क्षेत्र में प्राकृतिक आपदाओं के कारणों और उनकी
रोकथाम से जुड़ी चुनौतियों का विस्तार से विश्लेषण किया। उन्होंने बताया कि नेपाल पूरी तरह
हिमालयी ग्लेशियरों के मूल क्षेत्र में स्थित है, जहां भूगर्भीय और जलवायु परिस्थितियां बेहद
विशिष्ट हैं। यही वजह है कि यहां हिमस्खलन, बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाएँ अक्सर आती रहती
हैं। नेपाल दुनिया के उन देशों में शामिल है, जो जलवायु परिवर्तन से जुड़ी आपदाओं से सबसे
अधिक प्रभावित हैं और लंबे समय से गंभीर आपदा जोखिमों का सामना कर रहा है। ऐसे में इस
क्षेत्र में जलवायु आपदाओं के कारणों, पूर्व चेतावनी, रोकथाम, नियंत्रण और आपदा के बाद
पुनर्वास से जुड़े नियमित और गहन वैज्ञानिक शोध की तत्काल जरूरत है। उन्होंने कहा कि इस
क्षेत्र में चीन का लंबे समय का अनुभव और उसकी व्यापक क्षमता नेपाल के लिए ठोस सहयोग का
आधार बन सकती है।
इसी संदर्भ में डॉ. ओली ने हिमालयी जलवायु अनुसंधान और आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में चीन की
क्षमता की सराहना की। उन्होंने कहा कि चीन लंबे समय से हिमालय क्षेत्र पर जलवायु परिवर्तन के
प्रभावों का अध्ययन कर रहा है और इस दौरान उसने महत्वपूर्ण वैज्ञानिक उपलब्धियां हासिल की
हैं। साथ ही, चीन के पास समृद्ध व्यावहारिक अनुभव और पर्याप्त संसाधन भी हैं। आपदा की पूर्व
चेतावनी देने वाली प्रौद्योगिकी, आपातकालीन बचाव और दीर्घकालिक आपदा रोकथाम की
योजनाओं के क्षेत्र में चीन ने एक परिपक्व व्यवस्था विकसित की है और इसके अच्छे परिणाम भी
सामने आए हैं। चीन और नेपाल की भौगोलिक निकटता, साझा भविष्य और सहयोग के मजबूत
आधार को देखते हुए नेपाल को चीन के साथ व्यापक सहयोग और गहरा करने की जरूरत है,
ताकि चीन की प्रौद्योगिकी, विशेषज्ञता, संसाधनों और अनुभव का लाभ लेकर अपनी आपदा
रोकथाम और न्यूनीकरण क्षमता को मजबूत किया जा सके।
डॉ. ओली ने यह भी जोर देकर कहा कि हिमालयी क्षेत्र में जलवायु आपदाओं की कोई सीमा नहीं
होती और कोई भी देश अकेले इन व्यापक जोखिमों का सामना नहीं कर सकता। इसलिए सभी
देशों को आम सहमति बनाकर आपसी सहयोग बढ़ाना होगा और क्षेत्रीय आपदा रोकथाम एवं
न्यूनीकरण के लिए एक मजबूत सहयोग व्यवस्था तैयार करनी होगी। इससे जलवायु परिवर्तन से
पैदा होने वाली साझा चुनौतियों का अधिक प्रभावी ढंग से सामना किया जा सकेगा।
हाल में कुछ विदेशी मीडिया और व्यक्तियों की ओर से इस भूस्खलन आपदा को लेकर किए गए
दुर्भावनापूर्ण प्रचार और चीन को बदनाम करने के प्रयासों पर डॉ. ओली ने कड़ी निंदा की। उन्होंने
स्पष्ट कहा कि इस तरह की टिप्पणियां वैज्ञानिक तथ्यों के पूरी तरह विपरीत हैं। *नेचर* जैसी
अंतरराष्ट्रीय विज्ञान पत्रिकाओं में प्रकाशित कई अध्ययनों से यह सामने आया है कि हिमालय
क्षेत्र में इस तरह की आपदाओं का एक प्रमुख कारण जलवायु परिवर्तन के चलते ग्लेशियरों की
अस्थिरता है। उन्होंने कहा कि चीन को बदनाम करने वाली इन टिप्पणियों का कोई वैज्ञानिक
आधार नहीं है और प्राकृतिक आपदाओं का राजनीतिकरण विज्ञान की भावना के पूरी तरह खिलाफ
है।
अंत में डॉ. ओली ने जोर देकर कहा कि प्राकृतिक आपदाएं पूरी मानवता के लिए साझा चुनौती हैं
और इनका स्वरूप मूल रूप से वैज्ञानिक है। उन्होंने नेपाल के सभी पक्षों से वैज्ञानिक तथ्यों का
सम्मान करने, पूर्वाग्रहों और अफवाहों को दूर रखने तथा निष्पक्ष और तटस्थ रुख अपनाने की
अपील की। उन्होंने कहा कि चीन के साथ सहयोग की आम सहमति बनाकर जलवायु प्रबंधन और
आपदा रोकथाम के क्षेत्र में सहयोग को और गहरा करना चाहिए। इससे हिमालय क्षेत्र की
पारिस्थितिक सुरक्षा के साथ-साथ चीन और नेपाल दोनों देशों के लोगों की जान-माल की सुरक्षा
भी सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी।
(साभार- चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)





