संघर्ष से शिखर तक: यूपीएससी में मध्यप्रदेश के 61 युवाओं ने लिखी प्रेरणा की नई इबारत…दिव्यांगता को पछाड़ चढ़ा सफलता का पहाड़

upsc in Madhya Pradesh

दिव्यांगता, अभाव और चुनौतियों को हराकर रचा इतिहास,

मध्यप्रदेश के युवाओं ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि कठिनाइयाँ चाहे जितनी भी बड़ी क्यों न हों, दृढ़ संकल्प और निरंतर परिश्रम से हर मंजिल हासिल की जा सकती है। संघ लोक सेवा आयोग (UPSC-2025) परीक्षा में प्रदेश के 61 प्रतिभाशाली अभ्यर्थियों ने सफलता का परचम लहराया है। इन युवाओं की कहानियाँ सिर्फ सफलता की नहीं, बल्कि संघर्ष, साहस और आत्मविश्वास की जीवंत मिसाल हैं। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव 23 मार्च को इन चयनित अभ्यर्थियों से संवाद कर उन्हें सम्मानित  किया और उनके अनुभवों से अन्य युवाओं को प्रेरित करने का प्रयास किया।

बेटियों ने भी लहराया परचम

यूपीएससी जैसी कठिन परीक्षा में प्रदेश की बेटियों ने भी शानदार प्रदर्शन किया है। इंदौर की अनन्या शर्मा (13वीं रैंक), खंडवा की रूपल जायसवाल (43वीं), इंदौर की दीक्षा चौरसिया (44वीं), रीवा की समीक्षा द्विवेदी (56वीं) और नरसिंहपुर की दीक्षा पाटकर (88वीं) ने यह साबित किया कि सफलता में लिंग कोई बाधा नहीं होता।

टॉप रैंकर्स में एमपी की मजबूत मौजूदगी

इस बार प्रदेश के कई अभ्यर्थियों ने देशभर में शीर्ष स्थान हासिल किए—

इन उपलब्धियों ने मध्यप्रदेश को राष्ट्रीय स्तर पर गौरवान्वित किया है।

दिव्यांगता भी नहीं बनी बाधा

इंदौर के अक्षत बल्दवा की कहानी सबसे ज्यादा प्रेरणादायक है। दृष्टिहीन होने के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और 173वीं रैंक हासिल की। ‘रेटिनोब्लास्टोमा’ जैसी गंभीर बीमारी से जूझते हुए उन्होंने शिक्षा जारी रखी और नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी से पढ़ाई करते हुए सिविल सेवा का लक्ष्य हासिल किया। उनका कहना है— “असली दृष्टि आंखों से नहीं, बल्कि मन से होती है।”

अभावों से निकलकर बनी मिसाल

विदिशा जिले की प्राची चौहान ने किसान परिवार से आने के बावजूद चौथे प्रयास में 260वीं रैंक हासिल की। वे कहती हैं— “असफलताएं हमें मजबूत बनाती हैं, बस धैर्य बनाए रखना जरूरी है। टीकमगढ़ की मोहसिना बानो, जिनके पिता दुकानदार और मां आंगनवाड़ी कार्यकर्ता हैं, ने 648वीं रैंक प्राप्त कर यह साबित किया कि सही रणनीति और निरंतरता ही सफलता की कुंजी है।

सरकारी कॉलेज से पढ़ाई, सफलता पक्की

छोटे से शहर नरसिंहपुर में रहने वाली प्राची जैन का तीसरा प्रयास सफल रहा…उन्होंने 714वीं रैंक हासिल की । उन्होंने सरोजिनी नायडू शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय से पढ़ाई की और अनुशासन व सकारात्मक सोच को अपनी सफलता का आधार बताया।

किसान पुत्र ने चार प्रयासों में पाई जीत

मंदसौर के अंकुश पाटीदार ने 780वीं रैंक हासिल कर संघर्ष की मिसाल पेश की। उन्होंने देवी अहिल्या विश्वविद्यालय से स्नातक किया और चार प्रयासों के बाद सफलता पाई। उनकी प्रेरणा उनकी बहनें रहीं, जिन्होंने हर कठिन समय में उनका साथ दिया।

सरकारी संस्थानों का बढ़ता योगदान

61 में से 15 अभ्यर्थियों ने शासकीय कॉलेजों और विश्वविद्यालयों से पढ़ाई कर सफलता हासिल की है। यह आंकड़ा प्रदेश के सरकारी शैक्षणिक संस्थानों की गुणवत्ता और युवाओं की मेहनत को दर्शाता है।

सफलता का संदेश

इन सभी कहानियों में एक बात समान है

मध्यप्रदेश के ये युवा आज न केवल अपने परिवार और प्रदेश का नाम रोशन कर रहे हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए उम्मीद और प्रेरणा की नई रोशनी भी बन गए हैं।

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