देशभर में बढ़ती गर्मी और मौसम के बदलते मिजाज के बीच अब कृषि क्षेत्र की चिंता भी बढ़ने लगी है। मौसम वैज्ञानिकों की नजरें प्रशांत महासागर में विकसित हो रही अल-नीनो परिस्थितियों पर टिकी हैं। यह जलवायु घटना दुनिया के कई देशों की बारिश व्यवस्था को प्रभावित करती है और भारत में भी इसका सीधा असर मानसून पर पड़ सकता है। यदि इसका प्रभाव बढ़ता है तो खेती-किसानी से जुड़े लाखों किसानों को मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।
कमजोर मानसून की आशंका ने कृषि क्षेत्र की बढ़ाई चिंता
विशेषज्ञों के अनुसार अल-नीनो सक्रिय होने पर समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है। इसका प्रभाव मानसूनी हवाओं की ताकत पर पड़ता है, जिससे वर्षा की मात्रा कम हो सकती है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में बारिश की कमी सीधे फसल उत्पादन को प्रभावित करती है। यही वजह है कि कृषि विभाग और मौसम विशेषज्ञ लगातार हालात पर नजर बनाए हुए हैं।
धान की खेती पर सबसे ज्यादा असर पड़ने की संभावना
खरीफ सीजन की सबसे महत्वपूर्ण फसल धान को पर्याप्त पानी की आवश्यकता होती है। रोपाई के शुरुआती चरण में खेतों में पानी का भराव जरूरी माना जाता है। यदि मानसून कमजोर रहता है तो धान की बुआई में देरी हो सकती है और उत्पादन में भी गिरावट देखने को मिल सकती है। यही कारण है कि धान उत्पादक राज्यों के किसान इस बार मौसम के पूर्वानुमानों पर विशेष ध्यान दे रहे हैं।
कपास, गन्ना और दलहनी फसलें भी जोखिम के दायरे में
सिर्फ धान ही नहीं, बल्कि कपास और गन्ने जैसी नकदी फसलें भी अल-नीनो के प्रभाव से प्रभावित हो सकती हैं। पानी की कमी और बढ़ते तापमान के कारण कपास की फसल में कीटों का प्रकोप बढ़ने की आशंका रहती है। वहीं गन्ना, जिसे लंबे समय तक सिंचाई की जरूरत होती है, जल संकट के कारण प्रभावित हो सकता है। इसके अलावा अरहर, मूंग और उड़द जैसी दलहनी फसलों की वृद्धि भी मिट्टी में नमी की कमी से धीमी पड़ सकती है।
जल संरक्षण और आधुनिक तकनीकें बन सकती हैं किसानों की ताकत
विशेषज्ञों का मानना है कि बदलते मौसम के दौर में किसानों को पारंपरिक खेती के साथ आधुनिक तकनीकों को भी अपनाना होगा। कम पानी में बेहतर उत्पादन देने वाली उन्नत किस्मों का चयन, ड्रिप इरिगेशन और स्प्रिंकलर जैसी तकनीकों का उपयोग पानी बचाने में मदद कर सकता है। इससे कम वर्षा की स्थिति में भी फसल को आवश्यक नमी मिल सकेगी।
मौसम की जानकारी के आधार पर खेती की रणनीति बनाना होगा जरूरी
कृषि वैज्ञानिक किसानों को सलाह दे रहे हैं कि वे मौसम विभाग की ताजा जानकारी और पूर्वानुमानों पर लगातार नजर रखें। बुआई का समय स्थानीय मौसम के अनुसार तय करें और मल्चिंग जैसी तकनीकों से मिट्टी की नमी को सुरक्षित रखें। साथ ही एक ही फसल पर निर्भर रहने के बजाय बहुफसली खेती अपनाने से जोखिम कम किया जा सकता है। यदि एक फसल प्रभावित होती है तो दूसरी फसल किसानों की आय को संतुलित रखने में मदद कर सकती है।