नक्सलवाद पर निर्णायक विजय…भारत की सबसे बड़ी सफलता..अमित शाह की ये रणनीति बनी गेमचेंजर

भारत ने आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर एक ऐतिहासिक उपलब्धि की ओर कदम बढ़ा दिए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और गृह मंत्री अमित शाह की रणनीतिक सोच के चलते देश अब लगभग “नक्सल मुक्त भारत” के लक्ष्य के बेहद करीब पहुंच चुका है। जो इलाका कभी ‘रेड कॉरिडोर’ के नाम से जाना जाता था, आज वहां विकास और शांति की नई कहानी लिखी जा रही है।

  • नक्सलवाद पर निर्णायक विजय
  • अमित शाह की रणनीति बनी भारत की सबसे बड़ी सफलता
  • नक्सलवाद पर निर्णायक प्रहार
  • अमित शाह की रणनीति बनी गेमचेंजर

रणनीति में बदलाव: कंट्रोल से खत्म करने तक

मोदी सरकार ने नक्सलवाद के खिलाफ पुरानी “कंटेनमेंट” नीति को छोड़कर “कंप्लीट इराडिकेशन” यानी पूर्ण उन्मूलन की नीति अपनाई। पहले जहां बिखरे हुए प्रयास होते थे, वहीं अब एक यूनिफाइड और रुथलेस स्ट्रेटेजी लागू की गई। “संवाद → सुरक्षा → समन्वय” के सिद्धांत पर काम करते हुए सरकार ने हर स्तर पर तालमेल बनाया। इसके साथ ही “ट्रेस → टारगेट → न्यूट्रलाइज” की स्पष्ट कार्ययोजना ने नक्सली नेतृत्व को सीधे निशाने पर लिया।

आंकड़ों में दिखी ऐतिहासिक गिरावट

नक्सल ऑपरेशन के वर्षवार आंकड़े

वर्ष मारे गए नक्सली गिरफ्तार आत्मसमर्पण सुरक्षा बल शहीद नागरिक मौत
2026 (अब तक) 52 106 621 1 5
2025 364 1022 2337
2024 290 1090 881

कुल प्रमुख उपलब्धियां (2014–2026)

श्रेणी आंकड़े
कुल आत्मसमर्पण हजारों (लगातार वृद्धि)
टॉप नक्सली लीडर ढेर 40+
गिरफ्तार नक्सली हजारों
न्यूट्रलाइज (एनकाउंटर) लगातार बढ़ोतरी
  • हर साल आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों की संख्या में बड़ा उछाल दिख रहा है
  • 2025 में सबसे ज्यादा एनकाउंटर और सरेंडर दर्ज हुए
  • 2026 में भी ट्रेंड जारी है, लेकिन हिंसा और मौतों में भारी कमी आई है
  • रणनीति का फोकस अब “खत्म करने + मुख्यधारा में लाने” दोनों पर है

आंकड़े दे रहे सफलता की गवाही

सरकारी आंकड़ों के अनुसार हजारों नक्सलियों ने सरेंडर किया, सैकड़ों गिरफ्तार हुए और कई बड़े उग्रवादी ऑपरेशनों को ध्वस्त किया गया। कई राज्यों में नक्सलवाद लगभग समाप्ति की कगार पर पहुंच गया है। बिहार, ओडिशा और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में स्थिति पहले से काफी बेहतर हुई है, जबकि झारखंड और छत्तीसगढ़ में भी प्रभाव क्षेत्र तेजी से सिमटा है। यह बदलाव किसी एक अभियान का नहीं, बल्कि लगातार चलाए गए रणनीतिक ऑपरेशनों का परिणाम है।

बीते एक दशक में नक्सली हिंसा में भारी कमी आई है। 2004-2014 के बीच जहां 16,000 से ज्यादा हिंसक घटनाएं दर्ज हुईं, वहीं 2015-2025 के दौरान यह संख्या आधी से भी कम हो गई। सुरक्षा बलों और नागरिकों की मौतों में भी 70% से अधिक की गिरावट दर्ज की गई। 2026 तक हालात ऐसे बन चुके हैं कि नक्सल प्रभावित जिले 126 से घटकर महज 2 रह गए हैं, और “मोस्ट अफेक्टेड” जिले लगभग समाप्त हो चुके हैं। अमित शाह के नेतृत्व में सुरक्षा ढांचे को पूरी तरह मजबूत किया गया। 2014 तक जहां केवल 66 फोर्टिफाइड पुलिस स्टेशन थे, वहीं अब उनकी संख्या 594 तक पहुंच गई है। सैकड़ों नए कैंप, नाइट लैंडिंग हेलिपैड और विशेष बलों की तैनाती ने नक्सलियों के सुरक्षित ठिकानों को खत्म कर दिया। NIA और अन्य एजेंसियों के जरिए सटीक इंटेलिजेंस और तेज कार्रवाई ने ऑपरेशनों को अभूतपूर्व सफलता दिलाई।

फाइनेंशियल चोकिंग से कमजोर हुआ नेटवर्क

सरकार ने नक्सलियों की आर्थिक रीढ़ पर भी करारा प्रहार किया। करीब ₹97 करोड़ की संपत्ति जब्त कर उनके वित्तीय स्रोतों को खत्म किया गया। साथ ही “अर्बन नक्सल नेटवर्क” पर भी सख्ती से कार्रवाई कर उनके सूचना तंत्र को ध्वस्त किया गया। इससे नक्सली संगठनों की क्षमता बुरी तरह प्रभावित हुई।

विकास बना असली हथियार…आत्मसमर्पण और पुनर्वास की नीति

सरकार ने यह समझा कि नक्सलवाद का स्थायी समाधान विकास में ही छिपा है। 2014 से 2026 के बीच 12,000 किमी से ज्यादा सड़कें बनाई गईं, हजारों मोबाइल टावर लगाए गए और बैंकिंग सुविधाएं गांव-गांव तक पहुंचाई गईं। शिक्षा के क्षेत्र में ITI और स्किल सेंटर खोलकर युवाओं को मुख्यधारा से जोड़ा गया। नक्सलियों को मुख्यधारा में लाने के लिए आकर्षक आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति लागू की गई। उच्च रैंक के नक्सलियों को ₹5 लाख और अन्य को ₹2.5 लाख की सहायता के साथ प्रशिक्षण और रोजगार के अवसर दिए गए। इसी का परिणाम है कि हजारों नक्सली हथियार छोड़कर समाज में लौट आए।

बुढ़ा पहाड़ से अबूझमाड़ तक सफलता की कहानी

बुढ़ा पहाड़, चक्रबांधा, पारसनाथ और अबूझमाड़ जैसे इलाके, जो दशकों तक नक्सलियों के गढ़ थे, अब लगभग मुक्त हो चुके हैं। सुरक्षा बलों के ऑपरेशन और स्थायी कैंपों की स्थापना ने इन क्षेत्रों में सरकार की पकड़ मजबूत की। यहां अब विकास की नई किरण दिखाई दे रही है।

अमित शाह की रणनीति ने यह साबित कर दिया कि अगर नेतृत्व मजबूत हो, नीति स्पष्ट हो और क्रियान्वयन सख्त हो, तो दशकों पुरानी समस्या भी खत्म की जा सकती है। “नक्सल मुक्त भारत” अब सिर्फ एक सपना नहीं, बल्कि हकीकत बनता जा रहा है—जहां बंदूक की आवाज की जगह विकास की गूंज सुनाई दे रही है।

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