ग्लोबल संकट के बीच नया आर्थिक मॉडल तलाशती दुनिया, क्या भारत तैयार है बदलाव के लिए?
मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध ने जहां वैश्विक अस्थिरता बढ़ाई है, वहीं यह दुनिया की अर्थव्यवस्था को नए ढांचे में ढालने का मौका भी बनकर उभरा है। पश्चिमी देशों में अब “पोस्ट-नियो लिबरल” आर्थिक मॉडल पर चर्चा तेज हो गई है, जिसमें राज्य की भूमिका, सहकारी संस्थाओं और श्रमिकों की भागीदारी को मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा पूंजीवादी व्यवस्था, जहां मुनाफा ही केंद्र में है, सामाजिक असमानता और श्रमिक शोषण को बढ़ा रही है। ऐसे में नए मॉडल की जरूरत महसूस की जा रही है, जहां निर्णय लेने में आम लोगों और कामगारों की भागीदारी बढ़े।
भारत के संदर्भ में यह बहस और महत्वपूर्ण हो जाती है। यहां भी आर्थिक असमानता, बड़े कॉरपोरेट समूहों का बढ़ता प्रभाव और रोजगार से जुड़ी चुनौतियां सामने हैं। हालांकि राजनीतिक और बौद्धिक स्तर पर अब तक कोई स्पष्ट वैकल्पिक मॉडल सामने नहीं आया है। स्पेन जैसे देशों में “वर्कप्लेस डेमोक्रेसी” यानी कार्यस्थल पर लोकतंत्र की अवधारणा पर काम हो रहा है, जहां कर्मचारी सिर्फ मजदूर नहीं बल्कि हिस्सेदार भी बनें। इस मॉडल में सहकारी संस्थाओं को बढ़ावा देने की बात की जा रही है। भारत की अमूल जैसी सहकारी संस्था को भी इस दिशा में एक उदाहरण माना जा रहा है।
दुनिया इस समय “पॉलीक्राइसिस” यानी कई संकटों—जैसे जलवायु परिवर्तन, महंगाई, युद्ध और तकनीकी बदलाव—का सामना कर रही है। ऐसे में राज्य की भूमिका फिर से अहम हो गई है, खासकर ग्रीन एनर्जी और टिकाऊ विकास की दिशा में।
भारत के सामने भी बड़ा सवाल यही है कि क्या वह इन वैश्विक बहसों में सक्रिय भूमिका निभाएगा या पुराने ढांचे में ही आगे बढ़ेगा। जलवायु परिवर्तन के असर—अनियमित मानसून, बढ़ती गर्मी और प्राकृतिक आपदाओं—को देखते हुए भारत के लिए नई आर्थिक सोच अपनाना जरूरी होता जा रहा है। कुल मिलाकर, विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य उन्हीं देशों का होगा जो पारंपरिक सोच से आगे बढ़कर साहसिक और नए समाधान अपनाएंगे।