2029 में ही लागू हो सकता है महिला आरक्षण…50% सीटें बढ़ाने का ये है फॉर्मूला!

Women reservation implemented

लोकसभा-विधानसभाओं में सीट वृद्धि के साथ 33% महिला भागीदारी सुनिश्चित करने की तैयारी

देश में महिला आरक्षण को लेकर एक बार फिर सियासी हलचल तेज हो गई है। केंद्र की एनडीए सरकार अब महिला आरक्षण कानून को 2034 के बजाय 2029 से लागू करने की दिशा में काम कर रही है। इसके साथ ही एक नया फॉर्मूला भी सामने आया है, जिसके तहत लोकसभा और विधानसभा सीटों में लगभग 50 प्रतिशत तक वृद्धि की जा सकती है, ताकि महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करना व्यावहारिक रूप से आसान हो सके।

राज्यवार सीटों का प्रस्तावित नया गणित (महिला आरक्षण के साथ)

राज्य वर्तमान सीटें प्रस्तावित सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित
उत्तर प्रदेश 80 120 40
महाराष्ट्र 48 72 24
पश्चिम बंगाल 42 63 21
बिहार 40 60 20
तमिलनाडु 39 59 20
मध्य प्रदेश 29 44 15
कर्नाटक 28 42 14
गुजरात 26 39 13
आंध्र प्रदेश 25 38 13
राजस्थान 25 38 13
ओडिशा 21 32 11
केरल 20 30 10
तेलंगाना 17 26 9
असम 14 21 7
झारखंड 14 21 7
पंजाब 13 20 7
छत्तीसगढ़ 11 17 6
हरियाणा 10 15 5
दिल्ली 7 11 4
उत्तराखंड 5 8 3
जम्मू और कश्मीर 5 8 3
हिमाचल प्रदेश 4 6 2
अरुणाचल प्रदेश 2 3 1
गोवा 2 3 1

सूत्रों के मुताबिक, इस प्रस्ताव पर गंभीर स्तर पर चर्चा चल रही है और इसे लेकर कई राजनीतिक दलों से राय-मशविरा भी किया गया है। अमित शाह ने इस विषय पर विभिन्न दलों के नेताओं के साथ संवाद किया है, ताकि इस बड़े संवैधानिक बदलाव पर सहमति बनाई जा सके। इस संभावित बदलाव के पीछे सरकार का तर्क है कि मौजूदा सीट संरचना में सीधे 33% आरक्षण लागू करने से कई जटिलताएं सामने आ सकती हैं, खासकर सीटों के पुनर्निर्धारण और राजनीतिक संतुलन को लेकर। ऐसे में सीटों की संख्या बढ़ाकर महिलाओं के लिए अलग से स्थान सुनिश्चित करने का रास्ता ज्यादा व्यावहारिक माना जा रहा है।

राज्यों में सीटों का नया गणित

प्रस्तावित फॉर्मूले के तहत देश के बड़े राज्यों में लोकसभा सीटों की संख्या में बड़ा इजाफा हो सकता है। उदाहरण के तौर पर उत्तर प्रदेश की सीटें 80 से बढ़ाकर 120 करने का प्रस्ताव है, जिनमें से 40 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो सकती हैं। इसी तरह महाराष्ट्र में 48 से 72, पश्चिम बंगाल में 42 से 63 और बिहार में 40 से 60 सीटें प्रस्तावित हैं।

दक्षिण भारत के राज्यों में भी बदलाव का असर दिखेगा। तमिलनाडु में 39 से 59 सीटें होने की संभावना है। वहीं मध्य प्रदेश, कर्नाटक और गुजरात जैसे राज्यों में भी सीटों में उल्लेखनीय वृद्धि का प्रस्ताव है। इस नए ढांचे के तहत कुल मिलाकर 196 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो सकती हैं। इसके अलावा अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित सीटों में भी वृद्धि होगी। मौजूदा व्यवस्था में जहां SC के लिए 84 और ST के लिए 47 सीटें आरक्षित हैं, वहीं नए प्रस्ताव में इन्हें बढ़ाकर क्रमशः 126 और 70 किया जा सकता है। इनमें से SC महिलाओं के लिए 42 और ST महिलाओं के लिए 27 सीटें आरक्षित होने की संभावना जताई जा रही है।

राजनीतिक दलों के बीच बढ़ी बहस

महिला आरक्षण को लेकर सियासत भी तेज हो गई है। भाजपा सांसद हेमा मालिनी ने इस बिल का समर्थन करते हुए कहा कि महिलाओं को मजबूत बनाने और संसद में उनकी भागीदारी बढ़ाने के लिए यह कदम जरूरी है। उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्रीय स्तर के मुद्दों पर विपक्ष को एकजुटता दिखानी चाहिए। वहीं डिंपल यादव ने इस मुद्दे पर सरकार से स्पष्टता मांगी है। उनका कहना है कि विपक्ष यह देखना चाहता है कि सरकार किस फॉर्मेट में बिल लाने जा रही है और उसमें क्या प्रावधान होंगे। समाजवादी पार्टी का रुख फिलहाल “वेट एंड वॉच” का नजर आ रहा है। भाजपा सांसद रवि किशन ने इसे ऐतिहासिक पहल बताते हुए कहा कि जिस तरह पहले बुनियादी सुविधाओं को लेकर बड़े बदलाव हुए, उसी तरह अब महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी में भी बड़ा परिवर्तन देखने को मिलेगा।

क्या 2029 में संभव है लागू होना?

विशेषज्ञों का मानना है कि महिला आरक्षण को लागू करने में सबसे बड़ी बाधा परिसीमन (delimitation) और जनगणना से जुड़ी प्रक्रियाएं हैं। मौजूदा कानून के अनुसार, नई जनगणना और उसके आधार पर परिसीमन के बाद ही आरक्षण लागू हो सकता है। ऐसे में 2029 तक इसे लागू करने के लिए इन प्रक्रियाओं को समयबद्ध तरीके से पूरा करना होगा। अगर सरकार इस दिशा में तेजी से काम करती है, तो 2029 का लोकसभा चुनाव महिला प्रतिनिधित्व के लिहाज से ऐतिहासिक साबित हो सकता है। हालांकि इसके लिए राजनीतिक सहमति और संवैधानिक प्रक्रियाओं को पूरा करना अनिवार्य होगा।

बदलाव का बड़ा संदेश

कुल मिलाकर, महिला आरक्षण को जल्दी लागू करने और सीटों में वृद्धि का यह प्रस्ताव भारतीय राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत देता है। अगर यह योजना लागू होती है तो संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी अभूतपूर्व स्तर तक पहुंच सकती है। यह न केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व को संतुलित करेगा, बल्कि नीति निर्माण में महिलाओं की भूमिका को भी मजबूत करेगा। हालांकि अंतिम फैसला राजनीतिक सहमति और विधायी प्रक्रिया पर निर्भर करेगा, लेकिन इतना तय है कि आने वाले समय में यह मुद्दा देश की राजनीति के केंद्र में बना रहेगा।

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