दिल्ली के पावर बैलेंस में बड़ा बदलाव संभव
राष्ट्रीय राजनीति में हालिया घटनाक्रमों ने सत्ता के समीकरणों को लेकर नई चर्चाओं को जन्म दिया है। माना जा रहा है कि यदि विपक्षी दलों के कुछ सांसद सत्तारूढ़ गठबंधन के समर्थन में आते हैं, तो केंद्र की राजनीति में सहयोगी दलों की भूमिका पहले जैसी निर्णायक नहीं रह सकती।
“TMC-उद्धव सेना में टूट की चर्चा से बदलेगा सत्ता संतुल
JDU और TDP की भूमिका पर उठे सवाल
TMC और उद्धव सेना में टूट की चर्चा
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी All India Trinamool Congress के कुछ सांसदों ने अलग रास्ता चुना है। वहीं महाराष्ट्र में Shiv Sena (Uddhav Balasaheb Thackeray) के कई सांसदों के भी पार्टी छोड़ने की अटकलें लगाई जा रही हैं। यदि ऐसा होता है तो इसका सीधा फायदा भाजपा और एनडीए को मिल सकता है।
जेडीयू की स्थिति क्यों कमजोर पड़ सकती है?
Janata Dal (United) के पास लोकसभा में 12 सांसद हैं। 2024 के चुनाव के बाद केंद्र में सरकार गठन के समय जेडीयू का समर्थन बेहद महत्वपूर्ण माना गया था। लेकिन यदि भाजपा को अन्य दलों या बागी सांसदों का अतिरिक्त समर्थन मिल जाता है, तो सरकार के लिए जेडीयू की राजनीतिक उपयोगिता पहले की तुलना में कम हो सकती है।
बिहार में भी बदली राजनीतिक तस्वीर
बिहार की राजनीति में भी जेडीयू की स्थिति पहले जैसी नहीं रही है। लंबे समय तक राज्य की राजनीति में नेतृत्वकारी भूमिका निभाने वाली पार्टी अब भाजपा के मुकाबले अपेक्षाकृत कमजोर मानी जा रही है। मुख्यमंत्री पद पर भाजपा की मौजूदगी ने राज्य में शक्ति संतुलन बदल दिया है, जिससे जेडीयू के प्रभाव को लेकर नए सवाल उठ रहे हैं।
TDP की सौदेबाजी की ताकत भी घट सकती है
आंध्र प्रदेश की सत्ताधारी Telugu Desam Party के पास लोकसभा में 16 सांसद हैं। अब तक केंद्र सरकार के लिए यह संख्या काफी महत्वपूर्ण रही है। लेकिन यदि एनडीए को अतिरिक्त समर्थन मिल जाता है, तो टीडीपी की राजनीतिक सौदेबाजी की ताकत भी सीमित हो सकती है।
भाजपा को मिल सकता है रणनीतिक फायदा
यदि विपक्षी दलों से सांसदों का समर्थन एनडीए को मिलता है, तो भाजपा को संसद में अधिक मजबूती मिलेगी। इससे सरकार की स्थिरता बढ़ेगी और महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने में सहयोगी दलों पर निर्भरता कम हो सकती है।