इस राज्य में पैदा होते ही बच्चे पर 1.28 लाख रुपये का कर्ज! आखिर कैसे कर्जदार हो जाता है हर नवजात?… समझिए पूरा आर्थिक गणित

Tamil Nadu government white paper shows

क्या सचमुच एक बच्चा जन्म लेते ही कर्जदार हो जाता है?

कल्पना कीजिए कि किसी घर में एक बच्चा जन्म लेता है और उसी समय कहा जाता है कि उसके सिर पर 1.28 लाख रुपये का कर्ज है। सुनने में यह चौंकाने वाला लगता है, लेकिन इन दिनों तमिलनाडु की राजनीति और अर्थव्यवस्था में यही चर्चा का सबसे बड़ा विषय बना हुआ है। तमिलनाडु सरकार द्वारा जारी किए गए एक व्हाइट पेपर में दावा किया गया है कि राज्य पर कुल देनदारियां 13 लाख करोड़ रुपये से अधिक पहुंच चुकी हैं। इसी रिपोर्ट के बाद यह आंकड़ा सामने आया कि राज्य में पैदा होने वाला हर व्यक्ति औसतन 1 लाख 28 हजार 934 रुपये के कर्ज के हिस्से के साथ जन्म ले रहा है। लेकिन क्या वास्तव में कोई नवजात शिशु बैंक का कर्ज लेकर पैदा होता है? जवाब है—नहीं। इसके पीछे अर्थशास्त्र का एक बेहद सरल गणित काम करता है।

आखिर “प्रति व्यक्ति कर्ज” होता क्या है?

सरकारों पर भी कर्ज होता है। जैसे कोई परिवार घर बनाने, कारोबार बढ़ाने या अन्य जरूरतों के लिए बैंक से लोन लेता है, वैसे ही राज्य सरकारें विकास परियोजनाओं, सड़क, बिजली, स्वास्थ्य, शिक्षा और कल्याणकारी योजनाओं के लिए कर्ज लेती हैं। जब किसी राज्य का कुल कर्ज उसकी कुल आबादी से विभाजित किया जाता है, तो जो राशि निकलती है उसे “प्रति व्यक्ति कर्ज” कहा जाता है। यानी अगर किसी राज्य पर 10 लाख करोड़ रुपये का कर्ज है और उसकी आबादी लगभग 7.75 करोड़ है, तो औसतन हर व्यक्ति के हिस्से लगभग 1.28 लाख रुपये का कर्ज आता है। इसी गणना को आसान भाषा में कह दिया जाता है कि “हर बच्चा 1.28 लाख रुपये के कर्ज के साथ पैदा हो रहा है।”

तमिलनाडु पर कितना कर्ज है?

व्हाइट पेपर के अनुसार:

  • 2021 में राज्य पर कर्ज था: 5.13 लाख करोड़ रुपये
  • 2026 में कर्ज बढ़कर पहुंचा: 10 लाख करोड़ रुपये
  • कुल देनदारियां जोड़ने पर आंकड़ा: 13.18 लाख करोड़ रुपये

यानी पांच साल में कर्ज लगभग दोगुना हो गया।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि कर्ज जितना बढ़ता है, ब्याज का बोझ भी उतना ही बढ़ता है।

हर दिन 184 करोड़ रुपये सिर्फ ब्याज

राज्य सरकार को सिर्फ मूल कर्ज ही नहीं चुकाना होता, बल्कि उस पर ब्याज भी देना पड़ता है।

आंकड़ों के मुताबिक:

  • 2021-22 में ब्याज भुगतान: 41,564 करोड़ रुपये
  • 2025-26 में ब्याज भुगतान: 67,050 करोड़ रुपये

यानी सरकार हर दिन करीब 184 करोड़ रुपये सिर्फ ब्याज चुकाने में खर्च कर रही है।

सोचिए, यह राशि कई जिलों के वार्षिक विकास बजट से भी अधिक हो सकती है।

गुजरात, महाराष्ट्र और कर्नाटक से तुलना

व्हाइट पेपर में अन्य बड़े राज्यों के आंकड़े भी दिए गए हैं।

प्रति व्यक्ति कर्ज

  • तमिलनाडु: ₹1,28,934
  • कर्नाटक: ₹1,11,375
  • महाराष्ट्र: ₹77,569
  • गुजरात: ₹70,798

इन आंकड़ों के अनुसार तमिलनाडु का प्रति व्यक्ति कर्ज इन प्रमुख राज्यों से अधिक है।

हालांकि अर्थशास्त्री यह भी कहते हैं कि केवल कर्ज देखकर किसी राज्य की आर्थिक स्थिति का अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। यह भी देखना जरूरी होता है कि राज्य की आय कितनी है, उद्योग कितने मजबूत हैं और सरकार उस कर्ज का उपयोग किस काम में कर रही है।

क्या ज्यादा कर्ज हमेशा बुरी बात है?

इस सवाल का जवाब सीधा “हां” या “नहीं” में नहीं है। अगर कोई सरकार कर्ज लेकर सड़कें, उद्योग, बंदरगाह, बिजली परियोजनाएं, अस्पताल और शिक्षा संस्थान विकसित करती है, तो भविष्य में उससे आय बढ़ सकती है। लेकिन यदि कर्ज लगातार बढ़ता जाए और आय उसी गति से न बढ़े, तो आर्थिक दबाव बढ़ने लगता है। यही वजह है कि अर्थशास्त्री केवल कर्ज नहीं, बल्कि “कर्ज और आय का अनुपात” भी देखते हैं।

एक और बड़ी चिंता: बुजुर्ग होती आबादी

व्हाइट पेपर में केवल कर्ज की बात नहीं कही गई है। इसमें जनसंख्या से जुड़ी एक और चुनौती का जिक्र किया गया है।

बुजुर्ग आबादी बढ़ रही है

  • 2010 में बुजुर्ग आबादी: लगभग 10%
  • 2031 तक अनुमान: 18% से अधिक

यानी आने वाले वर्षों में राज्य में वरिष्ठ नागरिकों की संख्या तेजी से बढ़ेगी।

कामकाजी लोग घटेंगे, खर्च बढ़ेगा

दूसरी ओर काम करने वाली आबादी घटने का अनुमान है।

  • 2021 में कार्यशील आबादी: 66% से अधिक
  • 2036 में अनुमान: 63.6%

इसका अर्थ है कि टैक्स देने वाले लोगों की संख्या अपेक्षाकृत कम होगी, जबकि पेंशन, स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक सुरक्षा पर खर्च बढ़ेगा। अर्थशास्त्र की भाषा में इसे “डिपेंडेंसी रेशियो” बढ़ना कहा जाता है।

राजनीति बनाम अर्थशास्त्र

तमिलनाडु की राजनीति में यह मुद्दा इसलिए भी गर्म है क्योंकि नई सरकार ने सत्ता संभालने के बाद राज्य की वित्तीय स्थिति को लेकर सवाल उठाए हैं, जबकि पूर्व सरकार का दावा है कि कर्ज निर्धारित सीमाओं के भीतर है। यानी एक ही आंकड़े को राजनीतिक दल अलग-अलग नजरिए से पेश कर रहे हैं।

आम आदमी को क्या समझना चाहिए?

जब कोई नेता या सरकार कहती है कि “हर बच्चा लाखों रुपये के कर्ज के साथ पैदा हो रहा है”, तो इसका मतलब यह नहीं होता कि उस बच्चे को वह पैसा चुकाना पड़ेगा। यह सिर्फ एक आर्थिक सूचकांक है, जो बताता है कि राज्य पर कुल कर्ज कितना है और आबादी के हिसाब से उसका औसत भार कितना बैठता है। लेकिन यह जरूर संकेत देता है कि अगर कर्ज लगातार बढ़ता रहा और आय नहीं बढ़ी, तो भविष्य में सरकारों पर वित्तीय दबाव बढ़ सकता है। तमिलनाडु का 13 लाख करोड़ रुपये से अधिक का देनदारी बोझ केवल एक राज्य की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस चुनौती की झलक है जिसका सामना कई भारतीय राज्य कर रहे हैं। बढ़ता कर्ज, बढ़ता ब्याज, बुजुर्ग होती आबादी और घटती कार्यशील जनसंख्या आने वाले वर्षों में सरकारों की आर्थिक नीतियों की सबसे बड़ी परीक्षा होगी। फिलहाल “पैदा होते ही 1.28 लाख रुपये का कर्ज” एक राजनीतिक नारा भले बन गया हो, लेकिन इसके पीछे छिपा आर्थिक गणित हर नागरिक के लिए समझना जरूरी है, क्योंकि अंततः सरकारी खजाने की सेहत का असर विकास, रोजगार और जनकल्याण की योजनाओं पर पड़ता है।

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