क्या पाकिस्तान के टुकड़े होंगे? ब्रिक्स देशों को बलूचिस्तान की चिट्ठी से क्यों मचा हड़कंप…

Pakistan break apart

क्या पाकिस्तान के टुकड़े होने वाले हैं? क्या बलूचिस्तान की आजादी का मुद्दा अब अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंच गया है? और क्या दिल्ली में होने वाली ब्रिक्स बैठक पाकिस्तान के लिए नई मुसीबत लेकर आ सकती है?

इन सवालों ने पाकिस्तान की सियासत और कूटनीति में हलचल जरूर बढ़ा दी है. लेकिन सबसे पहले तस्वीर साफ कर दें. ब्रिक्स में पाकिस्तान को तोड़ने या उसके टुकड़े करने का कोई आधिकारिक प्रस्ताव नहीं है. ब्रिक्स किसी देश की सीमाएं बदलने या किसी देश के विभाजन का फैसला करने वाला संगठन भी नहीं है.

फिर बलूचिस्तान के नेता की चिट्ठी इतनी अहम क्यों हो गई है?

दरअसल, नई दिल्ली में 12 और 13 सितंबर 2026 को होने वाले 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से ठीक पहले बलूच अलगाववादी नेता मीर यार बलोच की ओर से ब्रिक्स के 11 सदस्य देशों को खुला पत्र भेजा गया है. इस पत्र में बलूचिस्तान की स्वतंत्रता, संप्रभुता और आत्मनिर्णय के अधिकार को लेकर अंतरराष्ट्रीय समर्थन मांगा गया है. यानी ब्रिक्स में पाकिस्तान के विभाजन का प्रस्ताव नहीं आया है, लेकिन बलूचिस्तान ने ब्रिक्स के मंच को पाकिस्तान के खिलाफ अपनी आवाज को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाने के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश जरूर की है.

बलूचिस्तान ने ब्रिक्स से क्या मांगा?

‘रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान’ की ओर से लिखे गए खुले पत्र में बलूच नेताओं ने ब्रिक्स देशों से बलूचिस्तान की राष्ट्रीय स्थिति, स्वतंत्रता और आत्मनिर्णय के अधिकार पर विचार करने की अपील की है. दूसरी बड़ी मांग यह है कि बलूचिस्तान के मुद्दे को ब्रिक्स के एजेंडे में जगह दी जाए. यानी बलूच नेतृत्व चाहता है कि पाकिस्तान इसे अपना आंतरिक मामला बताकर दुनिया से दूर न रख सके. वह चाहता है कि बलूचिस्तान के मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय बहस का हिस्सा बनाया जाए. इसके साथ ही भविष्य में ब्रिक्स देशों के साथ सीधे राजनयिक, आर्थिक, सुरक्षा और समुद्री संबंध स्थापित करने की इच्छा भी जताई गई है. ग्वादर बंदरगाह का मुद्दा इस संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण है. क्योंकि ग्वादर सिर्फ पाकिस्तान का एक बंदरगाह नहीं है. यह चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे यानी सीपीईसी का अहम हिस्सा है. और यहीं से इस पूरे मामले का सबसे बड़ा भू-राजनीतिक पहलू सामने आता है.

11 अगस्त 1947 का हवाला क्यों?

बलूच नेताओं ने अपने पत्र में 11 अगस्त 1947 की ऐतिहासिक घटना का हवाला देते हुए दावा किया है कि बलूचिस्तान की स्वतंत्रता और संप्रभुता का अधिकार समाप्त नहीं हुआ था और पाकिस्तान ने बाद में इस क्षेत्र पर अवैध कब्जा किया. यह दावा बलूच अलगाववादी आंदोलन की उस ऐतिहासिक व्याख्या का हिस्सा है जिसके जरिए वह अपने संघर्ष को सिर्फ पाकिस्तान के खिलाफ विद्रोह नहीं बल्कि स्वतंत्रता और आत्मनिर्णय की लड़ाई के रूप में पेश करता है.  यानी लड़ाई सिर्फ जमीन की नहीं है.

कहानी नैरेटिव की भी है.

पाकिस्तान इसे अपना अभिन्न हिस्सा मानता है. बलूच अलगाववादी संगठन इसे कब्जे और दमन का मामला बताते हैं.अब बलूच नेतृत्व कोशिश कर रहा है कि उसकी कहानी पाकिस्तान की सीमाओं से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचे.

चीन के सामने सबसे बड़ी चुनौती

इस पूरे घटनाक्रम में चीन की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है. चीन पाकिस्तान का करीबी रणनीतिक सहयोगी है. चीन ने पाकिस्तान में सीपीईसी के तहत अरबों डॉलर की परियोजनाओं में निवेश किया है और ग्वादर बंदरगाह इस परियोजना का महत्वपूर्ण केंद्र है. लेकिन बलूचिस्तान में चीनी नागरिकों और परियोजनाओं को पहले भी सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना पड़ा है. इसलिए अगर बलूचिस्तान का मुद्दा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ज्यादा जोर पकड़ता है, तो इसका असर सिर्फ पाकिस्तान पर नहीं पड़ेगा. चीन के आर्थिक और रणनीतिक हित भी सीधे प्रभावित हो सकते हैं. यही कारण है कि ब्रिक्स के मंच पर बलूचिस्तान का मुद्दा उठाने की कोशिश को बीजिंग के लिए भी संवेदनशील माना जाएगा.

भारत के लिए क्यों अहम है यह मामला?

बलूचिस्तान का मुद्दा भारत और पाकिस्तान के पुराने तनाव से भी जुड़ जाता है. भारत लंबे समय से पाकिस्तान पर आतंकवाद और मानवाधिकारों के मुद्दे को लेकर सवाल उठाता रहा है. ऐसे में पाकिस्तान के भीतर से उठने वाली अलगाव और मानवाधिकार संबंधी आवाजें इस्लामाबाद के लिए कूटनीतिक चुनौती बन सकती हैं. लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है. बलूचिस्तान के मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा मिलना और भारत द्वारा बलूचिस्तान की स्वतंत्रता को आधिकारिक मान्यता देना दो अलग-अलग बातें हैं. ब्रिक्स के मंच पर किसी संगठन या नेता की अपील आ जाना अपने आप में भारत की आधिकारिक नीति में बदलाव नहीं है. इसलिए इसे सीधे पाकिस्तान के विभाजन की शुरुआत बताना जल्दबाजी होगी.

क्या ब्रिक्स पाकिस्तान को तोड़ सकता है?

जवाब है. नहीं.   ब्रिक्स की संरचना और उद्देश्य को देखते हुए ऐसा कोई तंत्र नहीं है जिसके जरिए संगठन किसी सदस्य या गैर-सदस्य देश को विभाजित करने का फैसला कर सके. इसके अलावा ब्रिक्स के भीतर चीन जैसा शक्तिशाली सदस्य पाकिस्तान का करीबी सहयोगी है. इसलिए यह कल्पना करना कि ब्रिक्स बैठक में बैठकर पाकिस्तान के टुकड़े करने का फैसला हो जाएगा, वास्तविक कूटनीतिक परिस्थितियों से मेल नहीं खाता. लेकिन इसका दूसरा पहलू ज्यादा महत्वपूर्ण है. ब्रिक्स पाकिस्तान को नहीं तोड़ेगा, लेकिन बलूचिस्तान का मुद्दा पाकिस्तान की मुश्किलें जरूर बढ़ा सकता है. अगर बलूचिस्तान में अस्थिरता बढ़ती है, अगर मानवाधिकार के आरोप अंतरराष्ट्रीय मंच पर लगातार उठते हैं और अगर चीन की परियोजनाएं भी सुरक्षा संकट से प्रभावित होती हैं, तो पाकिस्तान पर आर्थिक और कूटनीतिक दबाव बढ़ सकता है.

सबसे बड़ा सवाल. क्या बलूचिस्तान अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बन रहा है?

 यही इस पूरे घटनाक्रम का असली केंद्र है.  बलूच अलगाववादी नेतृत्व की कोशिश है कि दुनिया बलूचिस्तान को पाकिस्तान के आंतरिक प्रशासनिक हिस्से के रूप में नहीं बल्कि एक राजनीतिक विवाद के रूप में देखे. ब्रिक्स देशों को भेजी गई चिट्ठी इसी रणनीति का हिस्सा दिखाई देती है. ब्रिक्स में इस अपील पर कोई औपचारिक निर्णय हो या न हो, लेकिन संदेश जरूर गया है कि पाकिस्तान के भीतर का बलूच संकट अब अंतरराष्ट्रीय नैरेटिव में जगह बनाने की कोशिश कर रहा है. और पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ी चिंता यही है.

क्योंकि किसी देश की सीमाएं सिर्फ नक्शे पर नहीं बचतीं. उनकी सुरक्षा के साथ-साथ उस देश का अंतरराष्ट्रीय नैरेटिव भी महत्वपूर्ण होता है. आज सवाल यह नहीं है कि कल पाकिस्तान के टुकड़े हो जाएंगे या नहीं. असली सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान बलूचिस्तान में बढ़ते असंतोष को नियंत्रित कर पाएगा? क्या वह चीन के रणनीतिक हितों की रक्षा कर पाएगा? और क्या वह अंतरराष्ट्रीय मंच पर बलूचिस्तान के सवाल को सिर्फ अपना आंतरिक मामला बताकर रोक पाएगा? तो साफ है. ब्रिक्स में पाकिस्तान के टुकड़े करने का कोई प्रस्ताव नहीं है. लेकिन ब्रिक्स सम्मेलन से ठीक पहले बलूचिस्तान की चिट्ठी ने पाकिस्तान के लिए एक नया कूटनीतिक मोर्चा जरूर खोल दिया है. एक तरफ बलूचिस्तान आजादी और आत्मनिर्णय की मांग को अंतरराष्ट्रीय समर्थन दिलाने की कोशिश कर रहा है. दूसरी तरफ पाकिस्तान इसे अपना आंतरिक मामला मानता है. और तीसरी तरफ चीन के सामने ग्वादर और सीपीईसी जैसे अपने रणनीतिक हितों की सुरक्षा की चुनौती है. यानी पाकिस्तान के टुकड़े होने का फैसला ब्रिक्स में नहीं होने वाला. लेकिन बलूचिस्तान की आवाज अगर लगातार अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचती रही, तो पाकिस्तान की मुश्किलें जरूर टुकड़ों में बढ़ सकती हैं. 

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