अमरनाथ यात्रा में इस वर्ष एक ऐसा घटनाक्रम सामने आया जिसने करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाओं को झकझोर दिया। प्राकृतिक रूप से बनने वाला बाबा बर्फानी का शिवलिंग यात्रा शुरू होने के कुछ ही दिनों बाद लगभग पूरी तरह पिघल गया। जहां सामान्यतः शिवलिंग लंबे समय तक श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए मौजूद रहता था, वहीं इस बार करीब 15 दिनों के भीतर ही उसका आकार 90 प्रतिशत से अधिक समाप्त हो गया। सवाल उठने लगे कि आखिर ऐसा क्यों हुआ? क्या यह सिर्फ प्राकृतिक घटना है या हिमालय पर मंडराते जलवायु संकट का बड़ा संकेत?
पर्यावरण वैज्ञानिकों और हिमालयी विशेषज्ञों का मानना है कि यह कोई सामान्य घटना नहीं है। उनके अनुसार पश्चिमी हिमालय में तापमान तेजी से बढ़ रहा है और इसका सीधा असर अमरनाथ गुफा की नाजुक प्राकृतिक संरचना पर दिखाई दे रहा है। समुद्र तल से लगभग 3,888 मीटर की ऊंचाई पर स्थित गुफा का तापमान इस बार लंबे समय तक हिम बनने के लिए अनुकूल नहीं रह पाया।
हिमालय दुनिया से तेज गर्म हो रहा
द हिमालया इनिशिएटिव के रणनीतिक सलाहकार और पद्मश्री सम्मानित पर्यावरण वैज्ञानिक डॉ. एकलव्य शर्मा के अनुसार हिमालय दुनिया के औसत तापमान की तुलना में कहीं अधिक तेजी से गर्म हो रहा है। इसे वैज्ञानिक भाषा में “एलिवेशन डिपेंडेंट वार्मिंग” कहा जाता है। उनका कहना है कि यदि ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन इसी तरह जारी रहा तो इस सदी के अंत तक हिमालय के ऊंचे इलाकों का तापमान 5 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है। डॉ. शर्मा के अनुसार वर्ष 2000 से 2022 के बीच हिमालय के ग्लेशियरों और बर्फ से ढके क्षेत्र में 23 प्रतिशत से अधिक की कमी दर्ज की गई है। 2010 के बाद यह प्रक्रिया और तेज हो गई है। इसका असर केवल अमरनाथ तक सीमित नहीं है बल्कि पूरे हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र पर दिखाई दे रहा है।
कम बर्फबारी और बदलता मौसम भी कारण
विशेषज्ञ बताते हैं कि इस बार सर्दियों में अपेक्षाकृत कम बर्फबारी हुई। इसके साथ ही बारिश के पैटर्न में बदलाव और गर्म हवाओं के प्रभाव ने शिवलिंग के निर्माण और उसके संरक्षण दोनों को प्रभावित किया। जब शुरुआती बर्फ कम बनती है तो गर्मी बढ़ने पर उसके तेजी से पिघलने की संभावना भी बढ़ जाती है।
भीड़ और व्यवस्थाओं का भी असर
दिल्ली विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर हिमालयन स्टडीज के निदेशक प्रोफेसर बी.डब्ल्यू. पांडे का कहना है कि इस बार अमरनाथ यात्रा में श्रद्धालुओं की संख्या रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची। पहले चार दिनों में ही लगभग 93 हजार श्रद्धालु गुफा तक पहुंच चुके थे। बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी, रोशनी, जनरेटर, अस्थायी ढांचे और अन्य व्यवस्थाओं से गुफा के अंदर की सूक्ष्म जलवायु प्रभावित हुई। आईआईटी बॉम्बे की प्रोफेसर शर्मिष्ठा पटनायक के अनुसार केवल जलवायु परिवर्तन ही नहीं, बल्कि गुफा के आसपास बढ़ते निर्माण कार्य, बिजली व्यवस्था, अस्थायी कैंप, मशीनरी और मानवीय गतिविधियों ने भी प्राकृतिक संतुलन को प्रभावित किया। गुफा का अपना एक संवेदनशील तापीय वातावरण होता है, जो बाहरी गर्मी से आसानी से प्रभावित हो जाता है।
विशेषज्ञों की चेतावनी
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अभी भी हिमालय के संरक्षण को गंभीरता से नहीं लिया गया तो भविष्य में ग्लेशियरों का पिघलना, जल संकट, जैव विविधता का नुकसान और प्राकृतिक आपदाओं का खतरा लगातार बढ़ेगा। अमरनाथ का तेजी से पिघलता शिवलिंग केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि हिमालय में तेजी से बदलती जलवायु का स्पष्ट संकेत भी है।
क्या करना होगा?
विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि अमरनाथ गुफा की सूक्ष्म जलवायु को बचाने के लिए श्रद्धालुओं की दैनिक संख्या का वैज्ञानिक निर्धारण, निर्माण गतिविधियों पर नियंत्रण, उच्च उत्सर्जन वाले उपकरणों के सीमित उपयोग, पर्यावरण-अनुकूल व्यवस्थाओं को बढ़ावा और स्थानीय समुदायों की भागीदारी जरूरी है। उनका मानना है कि आस्था और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाकर ही बाबा बर्फानी की इस अनमोल प्राकृतिक धरोहर को सुरक्षित रखा जा सकता है।
अमरनाथ का शिवलिंग हर वर्ष प्रकृति के अद्भुत चमत्कार के रूप में करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बनता है। लेकिन इस बार उसका समय से पहले पिघल जाना केवल धार्मिक नहीं, बल्कि पर्यावरणीय चेतावनी भी है। विशेषज्ञ साफ कह रहे हैं कि यदि जलवायु परिवर्तन की रफ्तार नहीं थमी और हिमालय पर बढ़ता मानवीय दबाव नियंत्रित नहीं हुआ, तो आने वाले वर्षों में ऐसे दृश्य और भी सामान्य हो सकते हैं। बाबा बर्फानी का यह संदेश केवल आस्था का नहीं, बल्कि प्रकृति को बचाने का भी आह्वान है।