हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ गीत सिर्फ लोकप्रिय नहीं होते, बल्कि वे एक युग की पहचान बन जाते हैं। फिल्म गाइड का गीत “आज फिर जीने की तमन्ना है” भी ऐसा ही एक अमर गीत है। दिलचस्प बात यह है कि जिस गीत को शुरुआत में खुद अभिनेता और निर्माता देव आनंद पसंद नहीं कर पाए थे, वही आगे चलकर फिल्म की सबसे बड़ी पहचान बन गया।
जब हार्ट अटैक ने रोक दी ‘गाइड’ की रफ्तार
साल 1965 में देव आनंद अपनी महत्वाकांक्षी फिल्म गाइड पर काम कर रहे थे। संगीत की जिम्मेदारी महान संगीतकार सचिन देव बर्मन (एसडी बर्मन) के पास थी। तभी अचानक उन्हें हार्ट अटैक आ गया। डॉक्टरों ने लंबा आराम करने की सलाह दी। इस दौरान कई फिल्म निर्माताओं ने अपना काम दूसरे संगीतकारों को सौंप दिया, लेकिन देव आनंद ने ऐसा नहीं किया। उन्होंने साफ कहा कि गाइड का संगीत केवल एसडी बर्मन ही देंगे, चाहे इसके लिए फिल्म की शूटिंग छह महीने तक क्यों न टालनी पड़े। यह फैसला सिर्फ एक निर्माता का नहीं, बल्कि अपने संगीतकार पर अटूट विश्वास का प्रतीक था।
सिर्फ पांच दिन… और तैयार हो गया इतिहास
स्वस्थ होने के बाद एसडी बर्मन स्टूडियो लौटे। कहा जाता है कि उन्होंने मात्र पांच दिनों में गाइड के सभी गीत तैयार कर दिए। संभव है कि बीमारी के कारण हुई देरी की भरपाई करने का भाव भी उनके मन में रहा हो। देव आनंद ने बिना किसी बदलाव के सभी गीतों को मंजूरी दे दी, लेकिन एक गीत ऐसा था जिसने उन्हें संतुष्ट नहीं किया।
जिस गीत पर देव आनंद को था संदेह
आज फिर जीने की तमन्ना है यह वही गीत था ..रिकॉर्डिंग पूरी होने के बाद देव आनंद को लगा कि यह गीत अपेक्षित प्रभाव नहीं छोड़ पाएगा। उन्होंने अपनी असहमति साथियों से भी साझा की। हालांकि पूरी यूनिट को गीत बेहद पसंद आया। फिल्म के निर्देशक विजय आनंद ने सुझाव दिया कि पहले इसकी शूटिंग कर ली जाए। यदि बाद में जरूरत महसूस हुई तो दूसरा गीत रिकॉर्ड कर लिया जाएगा।
शूटिंग के दौरान बदल गई राय
इस गीत की शूटिंग उदयपुर की खूबसूरत लोकेशनों पर हुई। शूटिंग के दौरान देव आनंद ने एक दिलचस्प बात नोटिस की। सेट पर काम करने वाले तकनीशियन हों, कलाकार हों या होटल का स्टाफ—हर कोई अनजाने में यही गीत गुनगुना रहा था। बार-बार लोगों की जुबान पर यही धुन सुनकर देव आनंद को एहसास हुआ कि शायद उनकी अपनी राय गलत थी।उन्होंने फैसला किया कि यह गीत फिल्म में यथावत रहेगा। फिल्म रिलीज हुई और यही गीत उसकी सबसे बड़ी पहचान बन गया।
एक धुन… पूरा गीत
इस गीत की सबसे अनोखी विशेषता इसकी धुन है। आमतौर पर फिल्मी गीतों में मुखड़ा और अंतरे की धुन अलग-अलग बनाई जाती है। अंतरा अपनी अलग चाल से शुरू होकर अंत में मुखड़े की धुन से जुड़ता है। लेकिन “आज फिर जीने की तमन्ना है” में एसडी बर्मन ने एक अनोखा प्रयोग किया। पूरे गीत—मुखड़े और सभी अंतरों—को लगभग एक ही मूल धुन पर रचा गया। यानी—
“कांटों से खींच के ये आंचल…”
और
“अपने ही बस में नहीं मैं…”
दोनों का संगीतात्मक प्रवाह एक ही धुन पर आगे बढ़ता है।
फिल्म संगीत में यह प्रयोग बेहद दुर्लभ माना जाता है। गीतकार शैलेंद्र ने इस गीत को जीवन में नई शुरुआत, आजादी और आत्मविश्वास का भाव दिया। एसडी बर्मन ने इसे राग मिश्र भैरवी की छाया में ऐसी धुन दी
यह पहला प्रयोग नहीं था
मुखड़े और अंतरे को एक ही धुन में ढालने का प्रयोग एसडी बर्मन ने बाद में एक और प्रसिद्ध गीत “फूलों के रंग से, दिल की कलम से” में भी किया। यह उनकी संगीत सोच और प्रयोगधर्मिता का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है। अगर उस दिन देव आनंद अपनी पहली राय पर अड़े रहते, तो शायद हिंदी सिनेमा अपने सबसे यादगार गीतों में से एक से वंचित रह जाता। यह कहानी सिर्फ एक सुपरहिट गाने की नहीं, बल्कि विश्वास, धैर्य और असाधारण प्रतिभा की भी है। एसडी बर्मन की धुन, शैलेंद्र के शब्द और देव आनंद का बदला हुआ फैसला—इन तीनों ने मिलकर ऐसा गीत रचा, जो छह दशक बाद भी हर पीढ़ी की जुबान पर है।