उत्तर प्रदेश के रामपुर में बनी मौलाना मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी इन दिनों राजनीतिक और प्रशासनिक विवाद के केंद्र में है। समाजवादी पार्टी के नेता आज़म ख़ान ने इस यूनिवर्सिटी की स्थापना कराई थी और इसकी आधारशिला समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव ने रखी थी। हाल में रामपुर विकास प्राधिकरण ने यूनिवर्सिटी परिसर की 40 इमारतों में से 38 को गिराने का आदेश दिया था। यूनिवर्सिटी प्रशासन ने इस आदेश के खिलाफ अपील की, जबकि समाजवादी पार्टी के नेताओं ने रामपुर पहुंचकर इसका विरोध किया। बाद में मुरादाबाद मंडल के कमिश्नर ने फिलहाल इस आदेश पर रोक लगा दी।
इस यूनिवर्सिटी का नाम मौलाना मोहम्मद अली जौहर के नाम पर रखा गया है। जौहर अविभाजित भारत के प्रमुख राजनीतिक नेताओं, पत्रकारों और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े व्यक्तित्वों में शामिल थे। वे मुस्लिम लीग और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, दोनों के अध्यक्ष रहे। उनका जन्म 1878 में रामपुर में हुआ था।
रामपुर से शुरू हुआ सफर
मोहम्मद अली जौहर का जन्म एक शिक्षित और संपन्न पठान परिवार में हुआ था। वे रोहिल्ला जनजाति के यूसुफ़ज़ई क़बीले से ताल्लुक रखते थे। वे शौकत अली और ज़ुल्फ़िकार अली के साथ मशहूर ‘अली बंधुओं’ में शामिल थे। कम उम्र में ही उनके पिता का निधन हो गया था। इसके बाद उनकी मां आबादी बानो बेगम ने उनके पालन-पोषण और शिक्षा की जिम्मेदारी संभाली। आबादी बानो बेगम बाद में ‘बी अम्मा’ के नाम से प्रसिद्ध हुईं और स्वतंत्रता आंदोलन में भी उनका योगदान बताया जाता है।
बी अम्मा ने अपने बेटों की बेहतर शिक्षा के लिए अपनी जमीन-जायदाद तक गिरवी रख दी। मोहम्मद अली और उनके भाई शौकत अली ने अलीगढ़ के मोहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज से शिक्षा हासिल की। वर्ष 1898 में मोहम्मद अली ने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी की बीए परीक्षा में पहला स्थान हासिल किया। इसके बाद वे उच्च शिक्षा के लिए ब्रिटेन गए और ऑक्सफोर्ड के लिंकन कॉलेज में मॉडर्न हिस्ट्री की पढ़ाई की। भारत लौटने के बाद उन्होंने रामपुर रियासत में शिक्षा निदेशक के तौर पर काम किया और बाद में बड़ौदा में भी सेवा दी।
शिक्षा और पत्रकारिता में बड़ी भूमिका
मोहम्मद अली जौहर केवल राजनेता नहीं थे। वे लेखक, पत्रकार और प्रभावशाली वक्ता भी थे। स्रोत के मुताबिक उन्होंने अंग्रेज़ी और उर्दू दोनों भाषाओं में कई प्रमुख अखबारों में लेख लिखे। उन्होंने ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खिलाफ अपनी पत्रकारिता को भी एक प्रभावी माध्यम बनाया।
14 जनवरी 1911 को उन्होंने कलकत्ता से अंग्रेज़ी साप्ताहिक अखबार ‘द कॉमरेड’ शुरू किया। यह अखबार जल्द ही लोकप्रिय हो गया। लगभग 20 महीने बाद इसे तत्कालीन ब्रिटिश भारत की नई राजधानी दिल्ली ले जाया गया। वर्ष 1913 में उन्होंने उर्दू दैनिक ‘हमदर्द’ भी शुरू किया। हालांकि बाद में ब्रिटिश सरकार ने इन अखबारों को बंद करा दिया।
जौहर शिक्षा के क्षेत्र में भी सक्रिय रहे। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के विस्तार के लिए काम किया। वर्ष 1920 में अलीगढ़ में जामिया मिलिया इस्लामिया की स्थापना करने वालों में भी वे शामिल थे। बाद में जामिया को दिल्ली स्थानांतरित किया गया।
मुस्लिम लीग से कांग्रेस तक राजनीतिक सफर
मोहम्मद अली जौहर का राजनीतिक जीवन भी उतना ही महत्वपूर्ण रहा। मौलाना मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक उन्होंने 1906 में मुस्लिम लीग के सदस्य के रूप में राजनीतिक सफर शुरू किया। वर्ष 1917 में नजरबंदी के दौरान उन्हें सर्वसम्मति से मुस्लिम लीग का अध्यक्ष चुना गया। वर्ष 1919 में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हुए और 1923 में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने।
उन्होंने 1919 में एक मुस्लिम प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करते हुए इंग्लैंड की यात्रा भी की। इस प्रतिनिधिमंडल का उद्देश्य ब्रिटिश सरकार पर दबाव बनाना था कि वह तुर्की के सुल्तान और ख़लीफ़ा को पद से हटाए जाने के मुद्दे पर हस्तक्षेप करे। ब्रिटिश सरकार से अपेक्षित समर्थन नहीं मिलने के बाद भारत में ख़िलाफ़त समिति का गठन हुआ।
गांधी और ख़िलाफ़त आंदोलन से जुड़ाव
ख़िलाफ़त आंदोलन के दौरान मोहम्मद अली जौहर ने महात्मा गांधी समेत कई नेताओं के साथ मिलकर काम किया। वर्ष 1921 में शौकत अली, हकीम अजमल ख़ान, मुख्तार अहमद अंसारी और गांधी के साथ उनका गठबंधन बना। इसी दौर में ख़िलाफ़त आंदोलन और असहयोग आंदोलन के बीच भी राजनीतिक सहयोग देखने को मिला।
हालांकि बाद के वर्षों में उनके राजनीतिक विचारों में कांग्रेस नेतृत्व से मतभेद भी सामने आए। वर्ष 1928 में नेहरू रिपोर्ट को लेकर उन्होंने मोतीलाल नेहरू और महात्मा गांधी की आलोचना की। वे मुसलमानों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्रों की मांग के पक्ष में थे और नेहरू रिपोर्ट में इसे खारिज किए जाने का विरोध करते थे। उन्होंने मोहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग के चौदह सूत्रीय प्रस्तावों का समर्थन किया।
आज़ादी के लिए आखिरी दौर तक संघर्ष
वर्ष 1930 में खराब स्वास्थ्य के बावजूद मोहम्मद अली जौहर ने लंदन में गोलमेज़ सम्मेलन में हिस्सा लिया। इसी दौरान उन्होंने भारत की स्वतंत्रता को लेकर अपना प्रसिद्ध बयान दिया कि वे गुलाम देश में वापस नहीं लौटना चाहते और उनकी इच्छा थी कि या तो भारत को आज़ादी मिले या उनकी कब्र के लिए दो गज जमीन दी जाए।
4 जनवरी 1931 को लंदन में मोहम्मद अली जौहर का निधन हो गया। उनके पार्थिव शरीर को यरुशलम ले जाया गया और 23 जनवरी 1931 को मस्जिद अल-अक्सा के पास बैतुल-मुक़द्दस में दफनाया गया।
इसलिए रखा गया यूनिवर्सिटी का नाम
मोहम्मद अली जौहर की पहचान केवल किसी एक राजनीतिक संगठन से जुड़े नेता के रूप में नहीं थी। वे शिक्षा, पत्रकारिता, राजनीति और स्वतंत्रता आंदोलन—इन सभी क्षेत्रों में सक्रिय रहे। रामपुर में जन्म लेने के कारण उनका स्थानीय जुड़ाव भी विशेष महत्व रखता है। यही वजह है कि रामपुर में स्थापित यूनिवर्सिटी का नाम उनके नाम पर रखा गया।
मौजूदा विवाद के बीच मोहम्मद अली जौहर का नाम एक बार फिर चर्चा में है। लेकिन उनके करीब एक सदी पुराने राजनीतिक और सामाजिक जीवन को देखें तो उनका व्यक्तित्व उस दौर के भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की जटिलताओं, हिंदू-मुस्लिम राजनीति, पत्रकारिता और शिक्षा के विकास से गहराई से जुड़ा दिखाई देता है।





