भाजपा की नई टीम में दो मुस्लिम चेहरे: यूपी से चयन के पीछे क्या है बड़ा सियासी संदेश?
भारतीय जनता पार्टी की नई राष्ट्रीय टीम में उत्तर प्रदेश के आठ नेताओं को जगह मिलना अपने आप में बड़ा राजनीतिक संकेत है। लेकिन इन आठ नामों में दो मुस्लिम चेहरे—डॉ. तारिक मंसूर और कुंवर बासित अली—सबसे ज्यादा चर्चा में हैं। भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन की नई टीम में तारिक मंसूर को दोबारा राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया है, जबकि कुंवर बासित अली को राष्ट्रीय अल्पसंख्यक मोर्चा की कमान दी गई है। कुल 65 राष्ट्रीय पदाधिकारियों की घोषणा में छह अल्पसंख्यक नेताओं को प्रतिनिधित्व मिला है।
यह सिर्फ संगठनात्मक नियुक्ति है या 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए तैयार की गई राजनीतिक पटकथा का हिस्सा? यही इस पूरे फैसले का सबसे बड़ा सवाल है।
यूपी को सबसे ज्यादा प्रतिनिधित्व, संदेश साफ
भाजपा की नई राष्ट्रीय टीम में उत्तर प्रदेश से आठ नेताओं को जगह मिली है—यह संख्या बताती है कि पार्टी के लिए यूपी सिर्फ एक राज्य नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सत्ता की राजनीतिक धुरी है। 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में भाजपा का प्रदर्शन उसकी पिछली ताकत की तुलना में कमजोर रहा था। ऐसे में 2027 का विधानसभा चुनाव पार्टी के लिए सिर्फ एक राज्य का चुनाव नहीं होगा, बल्कि 2024 के बाद राजनीतिक पकड़ मजबूत करने की अगली बड़ी परीक्षा होगा।
यही वजह है कि राष्ट्रीय संगठन में यूपी के सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों को एक साथ साधने की कोशिश दिखाई देती है। ब्राह्मण, ओबीसी, दलित, महिला और मुस्लिम प्रतिनिधित्व—नई टीम में यूपी की सामाजिक विविधता को राजनीतिक संदेश में बदला गया है। और इसी समीकरण में तारिक मंसूर और बासित अली की भूमिका सबसे दिलचस्प हो जा ती है।
तारिक मंसूर: एएमयू से भाजपा के राष्ट्रीय मंच तक
डॉ. तारिक मंसूर का राजनीतिक सफर सामान्य पार्टी कार्यकर्ता की तरह शुरू नहीं हुआ। वे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति रहे हैं और पेशे से सर्जन हैं। उन्होंने एएमयू के जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस और सर्जरी में एमएस किया। बाद में लंबे समय तक एएमयू में अध्यापन और प्रशासनिक जिम्मेदारियों से जुड़े रहे। 2017 में उन्हें एएमयू का कुलपति बनाया गया। इसके बाद उनका राजनीतिक सफर भाजपा की ओर बढ़ा और वे पार्टी के राष्ट्रीय संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका तक पहुंचे। नई नियुक्ति में उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पद पर बरकरार रखा गया है। यानी भाजपा के लिए तारिक मंसूर सिर्फ एक मुस्लिम चेहरा नहीं हैं। उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक उपयोगिता यह है कि वे शिक्षित मुस्लिम वर्ग, एएमयू की पृष्ठभूमि और पसमांदा राजनीति—तीनों के बीच एक संपर्क सूत्र बन सकते हैं।
बासित अली: जमीनी संगठन से राष्ट्रीय जिम्मेदारी तक
दूसरी तरफ कुंवर बासित अली की कहानी अलग है। वे पश्चिमी उत्तर प्रदेश से आने वाले भाजपा के संगठनात्मक कार्यकर्ता हैं और लंबे समय तक उत्तर प्रदेश भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चे में सक्रिय रहे हैं। अब उन्हें राष्ट्रीय अल्पसंख्यक मोर्चे की कमान दी गई है। यही अंतर दोनों नेताओं को एक-दूसरे का पूरक बनाता है। तारिक मंसूर के पास संस्थागत और बौद्धिक पहचान है, जबकि बासित अ ली के पास संगठनात्मक और जमीनी अनुभव।भाजपा के लिए यह संयोजन महत्वपूर्ण है। एक चेहरा मुस्लिम समाज के प्रभावशाली और शिक्षित वर्ग तक पहुंच बनाने में उपयोगी हो सकता है, तो दूसरा स्थानीय संगठन और समुदाय के बीच संपर्क मजबूत कर सकता है।
भाजपा की रणनीति: मुस्लिम वोट नहीं, मुस्लिम समाज के भीतर नए समीकरण
यहीं से पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक पहलू सामने आता है। भाजपा लंबे समय से मुस्लिम मतदाताओं को एक समान राजनीतिक समूह के रूप में देखने के बजाय उनके भीतर मौजूद सामाजिक, जातीय और आर्थिक विविधता को संबोधित करने की कोशिश कर रही है। इसी संदर्भ में ‘पसमांदा’ राजनीति महत्वपूर्ण हो जाती है। पसमांदा शब्द आम तौर पर सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े मुस्लिम समुदायों के लिए इस्तेमाल किया जाता है। उत्तर प्रदेश में बड़ी संख्या में मुस्लिम समुदाय विभिन्न पिछड़ी बिरादरियों से जुड़ा है। भाजपा का संदेश यह रहा है कि मुस्लिम समाज के भीतर भी जिन वर्गों को राजनीतिक और सामाजिक प्रतिनिधित्व कम मिला है, उनसे अलग संवाद किया जाए। तारिक मंसूर और बासित अली की नियुक्ति को इसी व्यापक रणनीति के संदर्भ में देखा जा रहा है।
पसमांदा समीकरण क्यों महत्वपूर्ण है?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुस्लिम मतदाता लंबे समय से निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं। लेकिन मुस्लिम वोट पूरी तरह एकसमान नहीं है। बिरादरी, क्षेत्र, आर्थिक स्थिति और स्थानीय राजनीतिक समीकरण कई बार मतदान व्यवहार को प्रभावित करते हैं। यही भाजपा की रणनीति का केंद्र है। अगर मुस्लिम समाज के भीतर किसी एक बड़े वर्ग को यह संदेश दिया जाए कि उसकी राजनीतिक पहचान केवल एक विपक्षी गठबंधन का हिस्सा बनने तक सीमित नहीं है, बल्कि उसे सत्ता के संगठन में भी प्रतिनिधित्व मिल सकता है, तो इससे पारंपरिक राजनीतिक समीकरण प्रभावित हो सकते हैं।
यानी भाजपा का लक्ष्य जरूरी नहीं कि मुस्लिम वोट का बड़ा हिस्सा एक झटके में हासिल करना हो। लक्ष्य कुछ सीटों पर वोटों के अंतर को बदलना भी हो सकता है। और विधानसभा चुनाव में यही छोटा बदलाव कई बार बड़ा परिणाम देता है।
अखिलेश का ‘PDA’ वार, भाजपा का जवाब क्या?
यही वजह है कि अखिलेश यादव की PDA राजनीति के संदर्भ में भाजपा की यह रणनीति और महत्वपूर्ण हो जाती है। समाजवादी पार्टी का PDA—पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक—फॉर्मूला भाजपा के खिलाफ सामाजिक गठजोड़ बनाने की कोशिश है। अखिलेश यादव इसी सामाजिक समीकरण को लगातार राजनीतिक संदेश के रूप में आगे बढ़ा रहे हैं। ऐसे में भाजपा का पसमांदा मुस्लिमों तक पहुंच बनाने का प्रयास सीधे तौर पर PDA के ‘अल्पसंख्यक’ हिस्से में सेंध लगाने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है। अखिलेश का यह कहना कि “अब अकल आई है” दरअसल इसी राजनीतिक लड़ाई को रेखांकित करता है। सपा की रणनीति यह साबित करने की होगी कि भाजपा की मुस्लिम पहुंच सिर्फ चुनावी जरूरत है। भाजपा का जवाब यह होगा कि मुस्लिम समाज के उन वर्गों को भी राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए, जिन्हें पारंपरिक मुस्लिम राजनीति में पर्याप्त जगह नहीं मिली। यानी लड़ाई अब सिर्फ हिंदू बनाम मुस्लिम के पुराने राजनीतिक फ्रेम में नहीं, बल्कि मुस्लिम समाज के भीतर प्रतिनिधित्व किसका और किसके जरिए—इस सवाल पर भी जा सकती है।
क्या भाजपा मुस्लिम वोट बैंक तोड़ सकती है?
यहां सबसे ज्यादा सावधानी की जरूरत है। सिर्फ दो मुस्लिम नेताओं को राष्ट्रीय संगठन में जगह मिलने से यह मान लेना कि मुस्लिम वोट भाजपा की ओर बड़े पैमाने पर चला जाएगा, राजनीतिक रूप से जल्दबाजी होगी। चुनाव में उम्मीदवार, स्थानीय समीकरण, सरकार के प्रति धारणा, बेरोजगारी, कानून-व्यवस्था, महंगाई, कल्याणकारी योजनाएं और विपक्ष की रणनीति—सभी कारक काम करते हैं। लेकिन भाजपा के लिए एक-दो प्रतिशत वोट का भी महत्व है।
उत्तर प्रदेश में कई विधानसभा सीटों पर जीत-हार का अंतर इतना कम होता है कि किसी समुदाय के भीतर सीमित लेकिन केंद्रित वोट बदलाव भी परिणाम बदल सकता है। इसलिए भाजपा की रणनीति को ‘मुस्लिम वोट बैंक जीतने’ की बजाय मुस्लिम वोटों में राजनीतिक विविधता पैदा करने की कोशिश कहना ज्यादा सटीक होगा।
पश्चिमी यूपी क्यों बन रहा है बड़ा मैदान?
बासित अली का पश्चिमी उत्तर प्रदेश से आना भी रणनीतिक महत्व रखता है। पश्चिमी यूपी सामाजिक रूप से बेहद विविध क्षेत्र है। यहां जाट, मुस्लिम, गुर्जर, दलित, राजपूत, ओबीसी और अन्य सामाजिक समूहों के समीकरण चुनावी परिणामों को प्रभावित करते हैं। मेरठ क्षेत्र से आने वाला मुस्लिम चेहरा भाजपा के लिए पश्चिमी यूपी में संवाद की एक अलग खिड़की खोल सकता है।
दूसरी ओर तारिक मंसूर का अलीगढ़ और एएमयू से जुड़ाव पश्चिमी यूपी के मुस्लिम सामाजिक-शैक्षणिक प्रभाव क्षेत्र में अलग प्रकार की पहचान देता है। अर्थात दोनों नेताओं का चयन केवल ‘मुस्लिम प्रतिनिधित्व’ नहीं है। इसमें क्षेत्रीय राजनीति का भी गणित छिपा है।
2024 का झटका, 2027 की तैयारी
भाजपा के लिए 2027 की सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ सत्ता बचाना नहीं है। उसे 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद बदले राजनीतिक समीकरणों को भी पलटना है। 2024 में उत्तर प्रदेश में भाजपा की लोकसभा सीटें 2019 की तुलना में काफी कम हुईं। इस परिणाम ने यह संकेत दिया कि विपक्षी सामाजिक गठजोड़ को नजरअंदाज करना महंगा पड़ सकता है।
अब भाजपा की रणनीति दो दिशाओं में चलती दिखाई देती है— एक तरफ हिंदुत्व और मजबूत संगठन का आधार कायम रखना, दूसरी तरफ सामाजिक समीकरणों में नए विस्तार की कोशिश करना। मुस्लिम समाज में पसमांदा पहुंच इसी दूसरी रणनीति का हिस्सा है।
सपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या?
अखिलेश यादव के PDA फॉर्मूले की ताकत इस बात में है कि वह पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक मतदाताओं को एक साझा रा जनीतिक मंच देने की कोशिश करता है। लेकिन इसकी चुनौती भी उतनी ही बड़ी है। क्या सभी पिछड़ी जातियां एक साथ रहेंगी? क्या दलित मतदाता पूरी तरह इस गठजोड़ के साथ रहेगा? क्या मुस्लिम समाज का पूरा वोट एक ही राजनीतिक दिशा में जाएगा? और सबसे महत्वपूर्ण— क्या भाजपा मुस्लिम समाज के भीतर पसमांदा बनाम अशरफ या सामाजिक प्रतिनिधित्व के सवाल को राजनीतिक मुद्दा बना पाएगी? यहीं 2027 का चुनाव दिलचस्प हो सकता है।
दो चेहरे, लेकिन संदेश पूरे यूपी के लिए
भाजपा ने तारिक मंसूर और बासित अली को सिर्फ दो मुस्लिम चेहरों के रूप में नियुक्त नहीं किया है। राजनीतिक संदेश इससे बड़ा है। तारिक मंसूर कहते हैं—भाजपा मुस्लिम समाज के शिक्षित और संस्थागत प्रभाव वाले वर्ग से संवाद कर सकती है। बासित अली का चयन कहता है—भाजपा जमीनी मुस्लिम संगठन तक पहुंच बनाने के लिए अपने कार्यकर्ताओं को ऊपर ला सकती है। और दोनों मिलकर यह संदेश देते हैं कि भाजपा मुस्लिम समाज को केवल चुनावी भाषणों में नहीं, बल्कि संगठनात्मक ढांचे में भी प्रतिनिधित्व देने का दावा करना चाहती है।
क्या यह रणनीति चुनाव में असर डालेगी?
इसका जवाब 2027 के नतीजों में मिलेगा, लेकिन अभी से तीन संभावित असर दिखाई देते हैं।
पहला—मुस्लिम वोट में एकरूपता तोड़ने की भाजपा की कोशिश तेज होगी।
दूसरा—सपा के PDA मॉडल को भाजपा सीधे चुनौती देगी।
तीसरा—पसमांदा राजनीति यूपी की चुनावी बहस का बड़ा विषय बन सकती है।
हालांकि भाजपा के सामने चुनौती यह भी है कि संगठनात्मक नियुक्ति को जमीन पर सामाजिक स्वीकार्यता में बदलना आसान नहीं होगा। किसी नेता की नियुक्ति और किसी समुदाय का मतदान व्यवहार—दो अलग चीजें हैं।
सबसे बड़ा सवाल: चेहरा बदलेगा या वोट?
यही इस पूरी नियुक्ति की असली परीक्षा है। तारिक मंसूर और बासित अली को राष्ट्रीय जिम्मेदारी देकर भाजपा ने संदेश जरूर दे दिया है कि वह मुस्लिम समाज के भीतर नए सामाजिक समीकरण तलाश रही है। अखिलेश यादव ने PDA के जरिए जिस सामाजिक एकजुटता की राजनीति खड़ी की है, भाजपा अब उसी सामाजिक जमीन में नए रास्ते तलाशती दिख रही है। लेकिन चुनाव में संदेश से ज्यादा मायने रखता है उसका असर। क्या पसमांदा मुस्लिम भाजपा को सिर्फ प्रतिनिधित्व देने वाली पार्टी के रूप में देखेंगे या वास्तव में वोटिंग व्यवहार बदलेंगे? क्या बासित अली की जमीनी पकड़ और तारिक मंसूर की संस्थागत पहचान भाजपा को उन इलाकों तक पहुंचा पाएगी जहां पार्टी की पारंपरिक पकड़ कमजोर है? और क्या अखिलेश यादव PDA के भीतर इस संभावित सेंध को रोक पाएंगे? 2027 का उत्तर प्रदेश चुनाव शायद सिर्फ भाजपा बनाम सपा की लड़ाई नहीं होगा। यह सामाजिक गठजोड़ बनाम सामाजिक पुनर्संयोजन की भी लड़ाई हो सकता है। भाजपा ने अपनी तरफ से पहला कदम उठा दिया है। अब असली परीक्षा यह है कि तारिक मंसूर और बासित अली राष्ट्रीय पदाधिकारी से आगे बढ़कर क्या यूपी के चुनावी मैदान में राजनीतिक प्रभाव पैदा कर पाते हैं। क्योंकि चुनाव में चेहरों की नियुक्ति खबर बनाती है, लेकिन वोटों का बदलाव ही इतिहास लिखता है।