गांव-गांव डेयरी नेटवर्क विस्तार की तैयारी
मध्यप्रदेश को देश की ‘मिल्क कैपिटल’ बनाने के संकल्प को जमीन पर उतारने के लिए सरकार ने डेयरी क्षेत्र में गतिविधियां तेज कर दी हैं। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने दुग्ध उत्पादन बढ़ाने, पशुपालकों की आय में वृद्धि करने और पूरी डेयरी व्यवस्था को मजबूत बनाने के निर्देश दिए हैं। समीक्षा बैठक में बताया गया कि प्रदेश में करीब 2 हजार नई दुग्ध सहकारी समितियां गठित की जा चुकी हैं।
राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के एमपी स्टेट को-ऑपरेटिव डेयरी फेडरेशन और दुग्ध संघों का कार्यभार संभालने के बाद हुई राज्य स्तरीय संचालन समिति की बैठक में डेयरी क्षेत्र के विस्तार की रणनीति पर चर्चा हुई।
27 फीसदी बढ़ा दुग्ध संकलन
प्रदेश में डेयरी क्षेत्र के विस्तार का सबसे बड़ा संकेत दुग्ध संकलन के आंकड़ों में दिखाई दे रहा है। वर्ष 2024-25 में प्रदेश में प्रतिदिन 8.73 लाख किलोग्राम दूध का संकलन हो रहा था। यह आंकड़ा 2025-26 में बढ़कर 9.66 लाख किलोग्राम प्रतिदिन और 2026-27 में जुलाई तक 9.75 लाख किलोग्राम प्रतिदिन पहुंच गया। सरकार के मुताबिक पिछले दो वर्षों में दुग्ध संकलन में 27 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इसका सीधा संबंध दुग्ध उत्पादकों को होने वाले भुगतान से भी है। वर्ष 2024-25 में जहां दुग्ध उत्पादकों को 1,477 करोड़ रुपये का भुगतान हुआ था, वहीं 2025-26 में यह बढ़कर 1,780 करोड़ रुपये हो गया। यानी दूध का उत्पादन और संकलन बढ़ने के साथ पशुपालकों तक पहुंचने वाली आर्थिक राशि में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
3827 नई समितियां बनाने का लक्ष्य
डेयरी सहकारिता को गांवों तक पहुंचाने के लिए सरकार ने बड़ा लक्ष्य तय किया है। प्रदेश में 1,926 नई दुग्ध सहकारी समितियां गठित की गई हैं, जबकि 801 निष्क्रिय समितियों को दोबारा क्रियाशील बनाया गया है। अब वर्ष 2028-29 तक 3,827 अतिरिक्त दुग्ध सहकारी समितियों के गठन का लक्ष्य रखा गया है। सरकार की व्यापक योजना अगले पांच वर्षों में प्रदेश के कम से कम 50 प्रतिशत गांवों में प्राथमिक डेयरी सहकारी समितियां स्थापित करने की है। इसका अर्थ केवल दूध खरीदने के केंद्र बढ़ाना नहीं है। इसका मकसद गांव के पशुपालक को संगठित डेयरी व्यवस्था से जोड़ना, दूध के नियमित बाजार का निर्माण करना और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में डेयरी की भूमिका बढ़ाना है।
ग्वालियर-जबलपुर को मिला वित्तीय सहारा
डेयरी क्षेत्र में अधोसंरचना बढ़ाने के लिए ग्वालियर और जबलपुर दुग्ध संघों को भी वित्तीय सहायता मिली है। राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड ने ग्वालियर दुग्ध संघ को 470 लाख रुपये और जबलपुर दुग्ध संघ को 500 लाख रुपये का ब्याज मुक्त ऋण उपलब्ध कराया है। इस राशि का उपयोग दुग्ध संकलन और प्रसंस्करण से जुड़ी गतिविधियों में किया जाएगा। यह व्यवस्था दूध के उत्पादन से लेकर उसके प्रसंस्करण तक की क्षमता बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा सकती है।
अब सिर्फ दूध नहीं, पूरी वैल्यू चेन पर जोर
सरकार की रणनीति अब सिर्फ दूध का उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं दिखाई दे रही है। मुख्यमंत्री ने पूरी डेयरी वैल्यू चेन के डिजिटलीकरण और विपणन व्यवस्था में सूचना प्रौद्योगिकी आधारित मॉनिटरिंग पर जोर दिया है। इसका उद्देश्य दूध के संकलन से लेकर प्रसंस्करण, वितरण और बिक्री तक की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और प्रभावी बनाना है। इसके साथ ही दूध से बने उत्पादों की बढ़ती बिक्री को देखते हुए शहरी क्षेत्रों में नए डेयरी पार्लर खोलने पर भी जोर दिया गया है। घी, दही और छाछ जैसे उत्पादों का बाजार बढ़ाना डेयरी कारोबार को सिर्फ कच्चे दूध की बिक्री से आगे ले जा सकता है।
माइक्रो एटीएम और महिला सदस्यता पर फोकस
डेयरी सहकारी समितियों में माइक्रो एटीएम स्थापित करने के प्रयास भी किए जाएंगे। इसका उद्देश्य सहकारी समितियों को ग्रामीण वित्तीय सेवाओं से जोड़ने की दिशा में कदम बढ़ाना है। वहीं, एमपीसीडीएफ को दुग्ध सहकारी समितियों में महिला सदस्यता को प्रोत्साहित करने के निर्देश दिए गए हैं। यह पहल डेयरी अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकती है, क्योंकि ग्रामीण परिवारों में पशुपालन और दूध उत्पादन से जुड़ी गतिविधियों में महिलाओं की भूमिका पहले से महत्वपूर्ण रहती है।
‘मिल्क कैपिटल’ का लक्ष्य कितना बड़ा?
मध्यप्रदेश को मिल्क कैपिटल बनाने की रणनीति को तीन स्तरों पर देखा जा सकता है।
पहला—उत्पादन बढ़ाना।
अधिक पशुपालकों को डेयरी सहकारिता से जोड़ना और दूध संकलन बढ़ाना।
दूसरा—बाजार का विस्तार।
दूध के साथ घी, दही, छाछ और अन्य उत्पादों की बिक्री बढ़ाना तथा शहरी क्षेत्रों में नए पार्लर विकसित करना।
तीसरा—तकनीक और सहकारिता।
डिजिटल मॉनिटरिंग, पूरी वैल्यू चेन का डिजिटलीकरण और माइक्रो एटीएम जैसी व्यवस्थाओं के जरिए डेयरी सहकारी समितियों को आधुनिक बनाना।
अगर इन तीनों मोर्चों पर लक्ष्य के मुताबिक काम होता है तो इसका असर सिर्फ दूध उत्पादन के आंकड़ों पर नहीं, बल्कि ग्रामीण आय, रोजगार और पशुपालकों की आर्थिक स्थिति पर भी पड़ सकता है।
असली चुनौती उत्पादन नहीं, व्यवस्था की मजबूती
हालांकि ‘मिल्क कैपिटल’ बनने की राह में सबसे बड़ी चुनौती केवल दूध का उत्पादन बढ़ाना नहीं होगी। असली चुनौती होगी—उत्पादन से बाजार तक पूरी व्यवस्था को कुशल बनाना। नई समितियां बनाना पहला कदम है। उन्हें लंबे समय तक सक्रिय रखना, किसानों को बेहतर भुगतान दिलाना, दूध की गुणवत्ता सुनिश्चित करना, प्रसंस्करण क्षमता बढ़ाना और शहरी बाजार में उत्पादों की मांग पैदा करना उससे बड़ी चुनौती है। 801 निष्क्रिय समितियों को फिर से सक्रिय करने का फैसला इसी चुनौती की ओर संकेत करता है।
गांव से शहर तक डेयरी अर्थव्यवस्था का विस्तार
मध्यप्रदेश सरकार की मौजूदा रणनीति में डेयरी को ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जोड़कर देखने के साथ-साथ इसे संगठित बाजार का हिस्सा बनाने पर भी जोर दिखाई देता है। करीब दो हजार नई समितियों का गठन, हजारों अतिरिक्त समितियां बनाने का लक्ष्य, बढ़ता दूध संकलन, उत्पादकों को बढ़ता भुगतान और प्रसंस्करण एवं विपणन पर फोकस—ये सभी कदम मिलकर प्रदेश में डेयरी सेक्टर के बड़े विस्तार का संकेत देते हैं। अब मध्यप्रदेश का लक्ष्य सिर्फ ज्यादा दूध पैदा करना नहीं, बल्कि दूध को ग्रामीण समृद्धि, सहकारिता, महिला भागीदारी और आधुनिक बाजार से जोड़कर एक मजबूत डेयरी अर्थव्यवस्था तैयार करना है। यही मॉडल अगर गांव से लेकर शहर तक प्रभावी ढंग से लागू हुआ, तो ‘मिल्क कैपिटल’ का संकल्प सिर्फ राजनीतिक घोषणा नहीं, बल्कि मध्यप्रदेश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की नई पहचान बन सकता है।