मध्य पूर्व में जारी तनाव और युद्ध के बीच अब कूटनीतिक हलचल तेज होती दिखाई दे रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump के ताजा दावे ने पूरी दुनिया का ध्यान एक बार फिर होर्मुज स्ट्रेट की ओर खींच दिया है। ट्रंप ने संकेत दिए हैं कि ईरान के साथ बातचीत अंतिम चरण में पहुंच चुकी है और समझौते के तहत होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने पर सहमति बन सकती है।
यह वही समुद्री मार्ग है जिसे लेकर पिछले कई हफ्तों से अमेरिका और ईरान के बीच भारी तनाव बना हुआ था। ईरान लगातार इस रणनीतिक रास्ते पर अपना नियंत्रण मजबूत करने की बात करता रहा है, जबकि अमेरिका और पश्चिमी देश इसे अंतरराष्ट्रीय व्यापार और तेल आपूर्ति के लिए बेहद अहम मानते हैं। दुनिया के बड़े हिस्से का तेल व्यापार इसी रास्ते से गुजरता है।
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि मामला इतना आसान नहीं है। चर्चा में यह भी सामने आया कि ईरान की ताकतवर सैन्य इकाई आईआरजीसी यानी इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर किसी न किसी रूप में टैक्स या नियंत्रण बनाए रखना चाहती है। यही वजह है कि संभावित समझौते के बावजूद वैश्विक स्तर पर आशंकाएं बनी हुई हैं।
विश्लेषकों का कहना है कि अगर ईरान जहाजों से शुल्क वसूलने की नीति पर कायम रहता है तो भारत सहित कई देशों की चिंता बढ़ सकती है। भारत की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है और होर्मुज स्ट्रेट उसका प्रमुख समुद्री मार्ग है। दूसरी ओर चीन को इससे अपेक्षाकृत कम असर पड़ सकता है क्योंकि ईरान के साथ उसके संबंध अलग स्तर पर माने जाते हैं।
इस बीच अमेरिका में भी हलचल तेज हो गई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक ट्रंप ने व्हाइट हाउस में शीर्ष सैन्य अधिकारियों और सुरक्षा सलाहकारों के साथ हाई लेवल मीटिंग की है। माना जा रहा है कि यदि बातचीत विफल होती है तो अमेरिका सैन्य विकल्पों पर भी विचार कर सकता है। अमेरिकी मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि पेंटागन ने संभावित सैन्य कार्रवाई की तैयारियां भी तेज कर दी हैं।
सूत्रों के मुताबिक ट्रंप ने अपने बेटे की शादी के कार्यक्रम से दूरी बनाकर राष्ट्रीय सुरक्षा बैठकों को प्राथमिकता दी। इसे लेकर अमेरिका में भी राजनीतिक और रणनीतिक चर्चाएं तेज हो गई हैं। वहीं ईरान ने साफ कहा है कि वह अपनी शर्तों से पीछे हटने को तैयार नहीं है और किसी भी नए हमले का पहले से अधिक कड़ा जवाब दिया जाएगा।ईरानी नेतृत्व का कहना है कि उसकी सेनाएं पूरी तरह तैयार हैं और देश की सुरक्षा से समझौता नहीं किया जाएगा। दूसरी तरफ अमेरिकी खुफिया एजेंसियां ईरान के सैन्य ठिकानों और गुप्त ऑपरेशन केंद्रों की लगातार निगरानी कर रही हैं।
अब पूरी दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या वास्तव में होर्मुज स्ट्रेट को लेकर कोई स्थायी समझौता हो पाएगा या फिर यह सिर्फ अस्थायी कूटनीतिक प्रयास साबित होगा। अगर डील सफल होती है तो 84 दिनों से जारी तनाव और युद्ध जैसे हालात में बड़ी राहत मिल सकती है। लेकिन यदि बातचीत विफल रही तो मध्य पूर्व एक बार फिर बड़े सैन्य टकराव की ओर बढ़ सकता है।