उत्तर प्रदेश में 2027 का विधानसभा चुनाव अभी दूर है, लेकिन सियासी तैयारियों की आहट तेज हो गई है। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन का काशी दौरा इसी तैयारी की एक अहम कड़ी के तौर पर देखा जा रहा है। काशी में नितिन नबीन का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तारीफ करना, संगठन के पदाधिकारियों के साथ बैठकें करना, जनसभा करना और फिर जेन-जी से संवाद करना—इन तमाम कार्यक्रमों को एक साथ देखें तो तस्वीर साफ होती है।
बीजेपी की नजर सिर्फ काशी पर नहीं, बल्कि पूरे पूर्वांचल के चुनावी समीकरण पर है। और इसकी वजह भी है। 2022 में पूर्वांचल की तस्वीर एक जैसी नहीं रही थी। कहीं बीजेपी गठबंधन ने मजबूत प्रदर्शन किया तो कहीं समाजवादी पार्टी गठबंधन ने बड़ी चुनौती दी। यही अंतर 2027 की रणनीति का अहम आधार बन सकता है।
काशी में संगठन, निशाने पर पूर्वांचल
नितिन नबीन के काशी दौरे में सार्वजनिक कार्यक्रम के साथ संगठन पर भी जोर दिखाई देता है। बीजेपी के आधिकारिक कार्यक्रम के मुताबिक उनका दौरा संगठनात्मक गतिविधियों और जनसभा से जुड़ा है। यानी काशी में संदेश सिर्फ राजनीतिक मंच से देने की कोशिश नहीं है, बल्कि बूथ और संगठन तक चुनावी तैयारी को ले जाने का संकेत भी है। काशी बीजेपी के लिए सिर्फ एक लोकसभा क्षेत्र नहीं, बल्कि पूर्वांचल की राजनीति का बड़ा प्रतीक है। इसलिए यहां से निकलने वाला संगठनात्मक संदेश आसपास के जिलों तक पहुंचाने की कोशिश स्वाभाविक तौर पर 2027 की तैयारी का हिस्सा बनती है।
2022 में आजमगढ़ ने बढ़ाई थी चुनौती
अब सबसे अहम आंकड़ा।
2022 के विधानसभा चुनाव में आजमगढ़ मंडल की 21 सीटों में बीजेपी गठबंधन को सिर्फ 3 सीटें मिली थीं, जबकि समाजवादी पार्टी गठबंधन ने 17 सीटें जीती थीं। एक सीट अन्य के खाते में गई थी। यानी बीजेपी के लिए आजमगढ़ मंडल ऐसा इलाका रहा, जहां 2022 के प्रदर्शन के बाद 2027 में वापसी की गुंजाइश और चुनौती दोनों मौजूद हैं। इसके उलट गोरखपुर मंडल की 28 सीटों में बीजेपी गठबंधन ने 27 सीटें जीती थीं। इससे पूर्वांचल के भीतर ही बीजेपी के मजबूत और कमजोर इलाकों का फर्क साफ दिखाई देता है। एक तरफ गोरखपुर का मजबूत प्रदर्शन, दूसरी तरफ आजमगढ़ की चुनौती—यही बीजेपी की पूर्वांचल रणनीति का बड़ा विरोधाभास है।
वाराणसी में मुकाबला भी महत्वपूर्ण
वाराणसी मंडल की 28 विधानसभा सीटों में 2022 में बीजेपी गठबंधन को 15 और समाजवादी पार्टी गठबंधन को 13 सीटें मिली थीं। यानी यहां अंतर बहुत बड़ा नहीं था। इसलिए काशी में संगठन को मजबूत करने की कवायद का एक मतलब यह भी है कि बीजेपी अपने मजबूत आधार को बनाए रखते हुए उन सीटों पर भी पकड़ मजबूत करना चाहती है, जहां पिछला मुकाबला अपेक्षाकृत करीबी रहा।
मिर्जापुर मंडल में तस्वीर बीजेपी गठबंधन के पक्ष में काफी मजबूत थी। 12 में से 11 सीटें बीजेपी गठबंधन के खाते में गई थीं। प्रयागराज मंडल में भी बीजेपी गठबंधन 14 सीटों के साथ आगे रहा, जबकि समाजवादी पार्टी गठबंधन को 11 सीटें मिलीं। यानी पूर्वांचल को एक ही रंग में नहीं देखा जा सकता।
गोरखपुर का किला, आजमगढ़ की चुनौती
2027 में बीजेपी के सामने दो अलग-अलग तरह की रणनीतिक जरूरतें होंगी। जहां पार्टी मजबूत है, वहां सीटों को बचाए रखना। जहां 2022 में विपक्ष मजबूत रहा, वहां संगठन और सामाजिक समीकरण को नए सिरे से मजबूत करना। गोरखपुर जैसे इलाके बीजेपी के मजबूत आधार का उदाहरण हैं, जबकि आजमगढ़ पिछली विधानसभा में विपक्षी बढ़त का उदाहरण रहा। यही कारण है कि काशी से संगठनात्मक गतिविधियों का विस्तार पूर्वांचल के दूसरे इलाकों तक करने की कोशिश को चुनावी दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा सकता है।
जेन-जी पर क्यों है नजर?
इस दौरे का एक और महत्वपूर्ण पहलू है—युवा संवाद। नितिन नबीन का काशी विद्यापीठ में जेन-जी के साथ संवाद कार्यक्रम तय है। यह महज एक संवाद कार्यक्रम नहीं, बल्कि बदलते मतदाता समूहों तक राजनीतिक पहुंच बनाने की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है। 2027 तक युवा मतदाताओं की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। रोजगार, शिक्षा, तकनीक, उद्यमिता, प्रतियोगी परीक्षाएं और डिजिटल अवसर जैसे मुद्दे इस वर्ग के लिए अहम हो सकते हैं। इसलिए बीजेपी अगर संगठनात्मक ढांचे के साथ युवा संवाद को जोड़ रही है, तो यह उसकी चुनावी तैयारी के एक अलग आयाम को सामने लाता है।
सपा-कांग्रेस का समीकरण भी अहम
दूसरी तरफ विपक्षी खेमे में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच सीट बंटवारे और रणनीतिक तालमेल की तस्वीर भी 2027 के समीकरणों को प्रभावित कर सकती है। 2022 में समाजवादी पार्टी गठबंधन ने 125 सीटें जीती थीं, जबकि बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए ने 273 सीटें हासिल की थीं। लेकिन 2027 का चुनाव 2022 की हूबहू पुनरावृत्ति नहीं होगा। नए गठबंधन, नए सामाजिक समीकरण, सरकार के कामकाज से जुड़े मुद्दे और स्थानीय उम्मीदवारों की भूमिका चुनावी तस्वीर बदल सकते हैं। इसीलिए बीजेपी के लिए अभी से कमजोर माने जाने वाले इलाकों में संगठन को सक्रिय करना महत्वपूर्ण हो जाता है।
काशी से क्या संदेश?
नितिन नबीन के काशी दौरे से तीन बड़े संदेश पढ़े जा सकते हैं।
पहला—पूर्वांचल को 2027 की तैयारी में शुरुआती प्राथमिकता।
दूसरा—जीती हुई सीटों की सुरक्षा के साथ पिछड़ी सीटों पर वापसी की कोशिश।
तीसरा—संगठन के साथ नई पीढ़ी और जेन-जी तक राजनीतिक पहुंच।
प्रधानमंत्री मोदी के संसदीय क्षेत्र काशी में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा के साथ कार्यक्रम ने इस दौरे का राजनीतिक दायरा भी बढ़ाया है। 7 अक्टूबर की जनसभा के लिए बीजेपी ने लगभग 50 हजार लोगों की जुटान का लक्ष्य रखा था।
2027 का चुनाव अभी सामने नहीं है, लेकिन बीजेपी ने अपनी चुनावी जमीन की पड़ताल शुरू कर दी है। काशी इस रणनीति का केंद्र है, लेकिन लक्ष्य उससे कहीं बड़ा—पूरा पूर्वांचल है। 2022 ने बीजेपी को बताया था कि पूर्वांचल में उसके मजबूत गढ़ कौन से हैं और किन इलाकों में समाजवादी पार्टी ने उसे कड़ी चुनौती दी। अब 2027 में सवाल यही होगा कि क्या बीजेपी अपने मजबूत इलाकों को बचाते हुए आजमगढ़ जैसे क्षेत्रों में अपनी स्थिति बदल पाती है। और इस पूरी रणनीति में काशी की भूमिका इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां से सिर्फ राजनीतिक संदेश नहीं, बल्कि संगठन, संस्कृति, युवा और पूर्वांचल—चारों को जोड़ने की कोशिश दिखाई दे रही है। यानी 2027 की लड़ाई भले पूरे उत्तर प्रदेश की हो, लेकिन पूर्वांचल की सियासी बिसात पर काशी एक अहम केंद्र बनी हुई है।