पश्चिम बंगाल का नाम बदलने की कवायद: पुराना प्रस्ताव, नई सियासत..जानें क्या है सीएम शुभेंन्द्र अधिकारी की रणनीति

Efforts to rename West Bengal Old proposal new politics

पश्चिम बंगाल की सियासत में एक बार फिर नाम बदलने का मुद्दा गरमा रहा है। दावा है कि राज्य का नाम बदलकर ‘पश्चिम बंग’ करने की तैयारी है और विधानसभा के अगले सत्र में इससे जुड़ा विधेयक लाया जा सकता है। अगर ऐसा होता है तो यह सिर्फ नाम बदलने का फैसला नहीं होगा। इसके साथ जुड़ा है करीब ढाई दशक पुराना राजनीतिक इतिहास।  क्योंकि पश्चिम बंगाल का नाम बदलने की कोशिश पहली बार नहीं हो रही। 1999 में ज्योति बसु सरकार ने भी ‘पश्चिम बंग’ नाम का प्रस्ताव रखा था। बाद में ममता बनर्जी सरकार के दौर में भी अलग-अलग नामों को लेकर विधानसभा में प्रस्ताव आए। यानी सवाल सिर्फ इतना नहीं कि नाम क्या होगा? सवाल यह भी है कि हर कुछ साल बाद बंगाल के नाम पर राजनीति क्यों लौट आती है?

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1999 में ज्योति बसु का प्रस्ताव

पश्चिम बंगाल के नाम को लेकर पहली बड़ी राजनीतिक पहल 1999 में हुई थी। राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु की वाम मोर्चा सरकार ने राज्य का नाम ‘पश्चिम बंग’ करने का प्रस्ताव रखा था। इसके पीछे एक तर्क यह था कि ‘West Bengal’ नाम औपनिवेशिक दौर की विरासत से जुड़ा है और राज्य को अपने ऐतिहासिक-सांस्कृतिक नाम से पहचान मिलनी चाहिए। प्रस्ताव विधानसभा से आगे बढ़ा, लेकिन केंद्र की मंजूरी के स्तर पर मामला आगे नहीं बढ़ सका। यानी 1999 में जो मुद्दा शुरू हुआ था, वह खत्म नहीं हुआ। सिर्फ राजनीतिक परिस्थितियां बदलती रहीं।

ममता सरकार ने भी बदले नाम का प्रयास किया

2011 में सत्ता परिवर्तन के बाद यह मुद्दा एक बार फिर सामने आया। ममता बनर्जी सरकार ने भी राज्य का नाम बदलने की कोशिश की। बाद में अलग-अलग विकल्पों पर चर्चा हुई और 2016-18 के दौरान ‘बांग्ला’ नाम को लेकर प्रस्ताव सामने आया। 2018 में पश्चिम बंगाल विधानसभा ने ‘बांग्ला’ नाम को लेकर प्रस्ताव पारित किया था।
लेकिन राज्य का नाम बदलना सिर्फ विधानसभा के प्रस्ताव से पूरा नहीं होता। इसके लिए केंद्र और संसद की संवैधानिक प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। यही वजह है कि पहले के प्रयास अंतिम मंजिल तक नहीं पहुंच सके।

अब बीजेपी के नाम पर ‘पश्चिम बंग’ की चर्चा

अब एक बार फिर ‘पश्चिम बंग’ नाम चर्चा में है। अगर बीजेपी सरकार विधानसभा में इस तरह का विधेयक लाती है, तो सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश यही होगा कि राज्य के नाम और उसकी पहचान को लेकर बीजेपी अपनी अलग दृष्टि सामने रख रही है। यहां ध्यान देने वाली बात यह भी है कि ‘पश्चिम बंग’ नाम नया नहीं है। यही नाम पहले वाम मोर्चा सरकार भी प्रस्तावित कर चुकी है।

इसलिए यह मामला सिर्फ बीजेपी बनाम टीएमसी की राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा। इसके साथ बंगाली पहचान, इतिहास, भाषा और औपनिवेशिक विरासत जैसे सवाल भी जुड़ेंगे।

नाम बदलने की राजनीति का असली सवाल

किसी राज्य का नाम बदलना सिर्फ शब्द बदलना नहीं होता। इसके लिए विधानसभा में प्रस्ताव, केंद्र की मंजूरी और संसद की संवैधानिक प्रक्रिया जरूरी होती है। इसलिए अगर राज्य सरकार विधेयक लाती भी है तो असली परीक्षा उसके बाद शुरू होगी।

क्या केंद्र इसे मंजूरी देगा?
क्या विपक्ष समर्थन करेगा?
क्या नया नाम सभी राजनीतिक दलों को स्वीकार होगा? और सबसे अहम—क्या बंगाल की जनता इसे सिर्फ प्रशासनिक बदलाव मानेगी या अपनी पहचान से जुड़ा मुद्दा?

बीजेपी के लिए राजनीतिक संदेश

बीजेपी अगर ‘पश्चिम बंग’ नाम को आगे बढ़ाती है, तो इसे बंगाली अस्मिता और राज्य की ऐतिहासिक पहचान से जोड़कर पेश किया जा सकता है। लेकिन यही मुद्दा विपक्ष के लिए भी राजनीतिक बहस का विषय बन सकता है। टीएमसी और दूसरे दल सवाल उठा सकते हैं कि नाम बदलने से आम लोगों की रोजमर्रा की समस्याओं पर क्या असर पड़ेगा। यानी विधानसभा में यदि यह विधेयक आता है, तो बहस सिर्फ नाम के अक्षरों पर नहीं होगी। बहस होगी—इतिहास बनाम वर्तमान, पहचान बनाम प्रशासन और राजनीति बनाम सहमति की।

सियासत में क्यों अहम है यह मुद्दा?

पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद राजनीति पहले ही नए दौर में है। ऐसे में राज्य के नाम का सवाल सरकार के लिए वैचारिक और राजनीतिक दोनों तरह का मुद्दा बन सकता है। बीजेपी के लिए यह अपनी राजनीतिक पहचान और बंगाली अस्मिता के साथ जुड़ने का प्रयास हो सकता है। वहीं विपक्ष इसे सरकार की प्राथमिकताओं से जोड़कर सवाल उठा सकता है। यानी एक नाम—लेकिन उसके पीछे कई राजनीतिक संदेश।

1999 से 2026 तक वही सवाल

करीब 27 साल में तीन अलग-अलग राजनीतिक दौर आए। 1999—ज्योति बसु सरकार ने ‘पश्चिम बंग’ का प्रस्ताव रखा। 2011 के बाद—ममता बनर्जी सरकार ने नाम बदलने की कोशिश आगे बढ़ाई। 2018—‘बांग्ला’ नाम को लेकर विधानसभा में प्रस्ताव पारित हुआ। और अब फिर ‘पश्चिम बंग’ की चर्चा। यानी नाम बदलने की बहस बंगाल की राजनीति में बार-बार लौटती रही है।

पश्चिम बंगाल का नाम बदलेगा या नहीं, यह अभी विधायी और संवैधानिक प्रक्रिया पर निर्भर करेगा। लेकिन इतना जरूर है कि अगर ‘पश्चिम बंग’ नाम का विधेयक विधानसभा में आता है, तो बंगाल की राजनीति में एक बड़ा मुद्दा जरूर खड़ा होगा। क्योंकि यह सिर्फ नाम का सवाल नहीं है। यह सवाल है—बंगाल अपनी पहचान किस नाम से दुनिया के सामने रखेगा? 1999 में ज्योति बसु के दौर से शुरू हुई बहस अगर 2026 में फिर उसी ‘पश्चिम बंग’ नाम पर लौटती है, तो यह बंगाल की राजनीति के बदलते रंगों के बीच एक दिलचस्प राजनीतिक निरंतरता जरूर है। नाम बदलेगा तो कागजों पर एक शब्द बदलेगा, लेकिन सियासत में उसके मायने इससे कहीं बड़े हो सकते हैं।

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