बेटियों पर भरोसा, तानों पर नहीं…IAS मेविश टाक की कहानी..जानें कौन हैं मेविश और कैसे हासिल की यूपीएससी में सफलता

Trusting daughter not want story of IAS officer Mevis Tak Find out who Mevis is and how she achieved success in the UPSC exam

किसी बेटी की उड़ान रोकने के लिए समाज के ताने काफी होते हैं। लेकिन अगर परिवार का भरोसा साथ हो, तो वही ताने सफलता की सीढ़ियां बन जाते हैं। राजस्थान के पाली की मेविश टाक की कहानी इसी सोच को बदलने वाली कहानी है। यह कहानी सिर्फ एक बेटी के यूपीएससी पास करने की नहीं है, बल्कि उस पिता के फैसले की भी है, जिसने तीन बेटियों की पढ़ाई को समाज की सोच और रिश्तेदारों की बातों से ज्यादा महत्व दिया।

मेविश के पिता अब्दुल करीम मुंबई के बॉम्बे हाईकोर्ट में ट्रांसलेटर के तौर पर काम करते हैं। तीन बेटियों की पढ़ाई को लेकर उन्हें समाज और रिश्तेदारों के सवालों का सामना करना पड़ा। लेकिन उन्होंने बेटियों के भविष्य का फैसला लोगों की राय से नहीं, उनके सपनों और काबिलियत से किया। उनका भरोसा था कि बेटियों को अवसर मिलेगा, तो वे अपनी मेहनत के दम पर अपनी पहचान बनाएंगी। मेविश ने पिता के इस भरोसे को सिर्फ शब्दों में नहीं, अपनी मेहनत से साबित किया।

यूपीएससी जैसी देश की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक में शुरुआती दो प्रयासों में उन्हें सफलता नहीं मिली। यही वह दौर था, जब असफलता किसी भी उम्मीदवार का हौसला तोड़ सकती थी। लेकिन मेविश ने हार मानने के बजाय अपनी तैयारी की रणनीति पर भरोसा बनाए रखा। उन्होंने बिना कोचिंग सेल्फ-स्टडी के जरिए तैयारी जारी रखी और तीसरे प्रयास में यूपीएससी परीक्षा पास कर ली। उन्होंने 386वीं रैंक हासिल की और भारतीय पुलिस सेवा के लिए चयनित हुईं। मेविश 2022 बैच की आईपीएस अधिकारी हैं और उत्तर प्रदेश के सोनभद्र में एएसपी के पद पर तैनात हैं।

पिता का भरोसा बना बेटी की ताकत

मेविश की कहानी का सबसे मजबूत पक्ष उनकी सफलता के पीछे खड़ा पारिवारिक भरोसा है। बेटियों की पढ़ाई को लेकर समाज में आज भी कई जगह सवाल उठते हैं। कभी शादी को प्राथमिकता देने की बात होती है, कभी बेटियों की शिक्षा पर खर्च को लेकर सवाल किए जाते हैं। ऐसे माहौल में अब्दुल करीम का फैसला बताता है कि बदलाव की शुरुआत घर से होती है। उन्होंने समाज के तानों का जवाब बहस से नहीं दिया। उन्होंने अपनी बेटियों को पढ़ने का अवसर दिया। और आज उसी फैसले का परिणाम एक आईपीएस अधिकारी के रूप में सामने है।

असफलता के बाद मिली सफलता

मेविश की यात्रा यह भी बताती है कि सफलता हमेशा पहली कोशिश में नहीं मिलती। दो प्रयासों में असफलता के बावजूद उन्होंने तैयारी नहीं छोड़ी। तीसरे प्रयास में सफलता हासिल करना इस बात का उदाहरण है कि असफलता मंजिल का अंत नहीं, बल्कि रणनीति बदलने का संकेत हो सकती है। खास बात यह भी है कि उन्होंने सेल्फ-स्टडी के जरिए अपनी तैयारी को आगे बढ़ाया। यानी सफलता के लिए संसाधनों से ज्यादा जरूरी है निरंतरता, अनुशासन और अपने लक्ष्य पर विश्वास।

एक बेटी की सफलता, कई बेटियों के लिए संदेश

मेविश की कहानी को केवल एक व्यक्तिगत उपलब्धि के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। यह कहानी उन परिवारों के लिए भी संदेश है, जहां बेटियों के सपनों और सामाजिक अपेक्षाओं के बीच टकराव होता है। अगर परिवार बेटी की शिक्षा और फैसलों पर भरोसा करे, तो वही बेटी आगे चलकर परिवार के साथ-साथ समाज के लिए भी प्रेरणा बन सकती है। तीन बेटियों को पढ़ाने के फैसले पर कभी सवाल उठे होंगे। लेकिन आज उसी फैसले की तस्वीर एक आईपीएस अधिकारी के रूप में सामने है। मेविश टाक की कहानी में एक पिता का भरोसा है, एक बेटी का संघर्ष है और उन सामाजिक धारणाओं के सामने खड़ी एक साफ तस्वीर है—बेटियों को मौका दीजिए, शिक्षा दीजिए और उन पर भरोसा कीजिए। क्योंकि जब परिवार बेटी के साथ खड़ा होता है, तो मंजिल तक पहुंचने का रास्ता वह खुद बना सकती है।

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