जापान के आइची-नागोया में हुए 20वें एशियन गेम्स ने भारत की खेल यात्रा की एक नई तस्वीर दुनिया के सामने रखी है। 21 स्वर्ण, 27 रजत और 37 कांस्य यानी कुल 85 पदक के साथ भारत पदक तालिका में चौथे स्थान पर रहा। यह भारत का एशियन गेम्स इतिहास में दूसरा सबसे बड़ा पदक प्रदर्शन है। लेकिन इन 85 पदकों की कहानी सिर्फ आंकड़ों की कहानी नहीं है। यह कहानी है उस बदलाव की, जिसमें भारत का खिलाड़ी अब केवल मुकाबले में हिस्सा लेने नहीं, बल्कि पदक जीतने और नए रिकॉर्ड बनाने के इरादे से मैदान में उतर रहा है।
85 पदक, बदलती खेल तस्वीर
आइची-नागोया में भारत के प्रदर्शन की सबसे बड़ी खासियत रही खेलों का व्यापक आधार। एथलेटिक्स ने 24 पदकों के साथ सबसे बड़ा योगदान दिया, जबकि शूटिंग में 15 और तीरंदाजी में 9 पदक मिले। क्रिकेट, कबड्डी और हॉकी में भारतीय टीमों ने स्वर्णिम प्रदर्शन किया। महिला और पुरुष क्रिकेट टीमों ने अपने-अपने खिताब बरकरार रखे। कबड्डी में भी दोनों टीमों ने स्वर्ण जीते। महिला हॉकी टीम ने 44 साल बाद एशियन गेम्स में स्वर्ण हासिल कर एक लंबे इंतजार को खत्म किया। यानी भारत की ताकत अब किसी एक खेल तक सीमित नहीं है। मैदान से लेकर शूटिंग रेंज, तीरंदाजी से लेकर मुक्केबाजी और व्यक्तिगत स्पर्धाओं से लेकर टीम गेम्स तक, भारतीय तिरंगा लगातार दिखाई दिया।
नीरू धांडा बनीं नए भारत की निशानेबाज
इन खेलों की सबसे खास कहानियों में मध्यप्रदेश से जुड़ी निशानेबाज नीरू धांडा का नाम भी शामिल है। महिला ट्रैप के व्यक्तिगत मुकाबले में उन्होंने स्वर्ण जीतकर इतिहास रचा। वह एशियन गेम्स में महिला ट्रैप का व्यक्तिगत स्वर्ण जीतने वाली पहली भारतीय बनीं। उन्होंने 28 निशाने लगाकर एशियाई खेलों का रिकॉर्ड भी बनाया।
नीरू की सफलता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उस सोच को सामने लाती है कि प्रतिभा अगर सही प्रशिक्षण, संसाधन और अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्धा पाए, तो तो वे विश्व पटल के सबसे बड़े मंच पर एक नया इतिहास रच सकती हैं।रच सकती है। नीरू ने महिलाओं की ट्रैप टीम स्पर्धा में रजत और मिश्रित टीम स्पर्धा में स्वर्ण भी जीता। एशियन गेम्स के समापन समारोह में वह भारतीय दल की ध्वजवाहक भी बनीं।
मध्यप्रदेश की मिट्टी से निकले सितारे
भारत के इस अभियान में मध्यप्रदेश का योगदान भी खास रहा। प्रदेश के 32 खिलाड़ी भारतीय दल में शामिल हुए थे और शूटिंग, हॉकी, क्रिकेट, सॉफ्ट टेनिस सहित कई खेलों में प्रदेश के खिलाड़ियों ने अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। मध्यप्रदेश के खेल विभाग ने भी एशियन गेम्स के दौरान अपने खिलाड़ियों की उपलब्धियों को लगातार दर्ज किया। नीरू धांडा की ऐतिहासिक उपलब्धि के साथ मनीषा कीर, ऐश्वर्य प्रताप सिंह तोमर, आशी चौकसे, विवेक सागर, इशिका चौधरी, क्रांति गौड़ और जय मीणा जैसे खिलाड़ियों ने भी भारत की पदक यात्रा में योगदान दिया।
खास तौर पर जय मीणा का सॉफ्ट टेनिस में कांस्य पदक ऐतिहासिक रहा। वह पुरुष एकल सॉफ्ट टेनिस में एशियन गेम्स पदक जीतने वाले पहले भारतीय बने। यानी मध्यप्रदेश के लिए यह केवल पदकों का आंकड़ा नहीं, बल्कि इस बात का संकेत भी है कि प्रदेश की खेल अकादमियों और प्रशिक्षण व्यवस्था से निकलने वाले खिलाड़ी अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना रहे हैं।
खेल नीति का असर मैदान पर
आज देश में खेल को लेकर सोच में बदलाव दिखाई देता है। केंद्र सरकार ने 2026-27 से 2030-31 के लिए संशोधित खेलो इंडिया योजना और राष्ट्रीय खेल महासंघों को सहायता के लिए कुल 36,441 करोड़ रुपये के परिव्यय को मंजूरी दी है। इसका फोकस प्रतिभा तलाशने, प्रशिक्षण, खेल विज्ञान, आधुनिक उपकरण, अंतरराष्ट्रीय अनुभव और खिलाड़ियों की सहायता पर है।
यही वह आधार है जो किसी खिलाड़ी को केवल प्रतिभावान से अंतरराष्ट्रीय स्तर का प्रतिस्पर्धी खिलाड़ी बनाने में मदद करता है। गांव, छोटे शहर और सामान्य परिवार से आने वाला युवा जब आधुनिक प्रशिक्षण सुविधा तक पहुंचता है, अच्छे प्रशिक्षक पाता है और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में खेलने का अवसर हासिल करता है, तभी पदक की संभावनाएं मजबूत होती हैं। एशियन गेम्स के परिणामों को इसी व्यापक बदलाव के संदर्भ में देखना होगा।
एमपी में खेल मैदान का विस्तार
मध्यप्रदेश में भी खेल अधोसंरचना और प्रशिक्षण पर लगातार जोर दिया जा रहा है। प्रदेश में 18 खेलों की 11 खेल अकादमियां संचालित हैं, जहां खिलाड़ियों को प्रशिक्षण के साथ अन्य सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जाती हैं। सितंबर 2026 में मोहन यादव सरकार ने सभी 230 विधानसभा क्षेत्रों में मुख्यमंत्री स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स विकसित करने का निर्णय भी लिया। प्रस्ताव के मुताबिक जहां सुविधाएं नहीं हैं, वहां नए परिसर और जहां अधूरी सुविधाएं हैं, वहां उनका विस्तार किया जाएगा। इसका असली महत्व यही है कि खेल की सुविधा सिर्फ बड़े शहरों तक सीमित न रहे। प्रतिभा गांव में हो सकती है, छोटे कस्बे में हो सकती है, लेकिन उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने के लिए मैदान, प्रशिक्षक और संसाधन जरूरी हैं।
अगला लक्ष्य सिर्फ पदक नहीं
आइची-नागोया ने भारत को 85 पदक दिए, लेकिन इससे भी बड़ी उपलब्धि है नई पीढ़ी के खिलाड़ियों का आत्मविश्वास। कुमकुम मोहोद का रिकर्व में स्वर्ण, प्रणवी उर्स का गोल्फ में ऐतिहासिक स्वर्ण, लवलीना बोरगोहेन का मुक्केबाजी में स्वर्ण और तीरंदाजी में भारतीय खिलाड़ियों का शानदार प्रदर्शन बताता है कि भारतीय खेलों में नए चेहरे तेजी से उभर रहे हैं। यही खिलाड़ी अब 2028 के लॉस एंजिलिस ओलंपिक की तैयारी के अगले पड़ाव की ओर बढ़ेंगे। एशियन गेम्स का संदेश साफ है—भारत में प्रतिभा की कमी कभी नहीं थी, जरूरत थी उस प्रतिभा को सही मंच देने की। आइची-नागोया में भारतीय खिलाड़ियों ने साबित किया कि जब प्रतिभा को प्रशिक्षण, संसाधन और अवसर मिलता है तो तिरंगा सिर्फ पदक मंच पर नहीं लहराता, बल्कि दुनिया को भारत की नई खेल शक्ति का परिचय भी कराता है। और मध्यप्रदेश के खिलाड़ियों की उपलब्धियां इस कहानी में एक महत्वपूर्ण अध्याय जोड़ती हैं। 85 पदक खत्म हुई प्रतियोगिता का आंकड़ा है, लेकिन इन पदकों से पैदा हुए हजारों नए सपने भारत के अगले खेल अध्याय की शुरुआत हैं।