महिला अधिकारों की लड़ाई को नई धार देने वाली अमेरिकी पत्रकार और एक्टिविस्ट ग्लोरिया स्टीनम का 92 साल की उम्र में निधन हो गया। एक ऐसी आवाज, जिसने दशकों तक महिलाओं को सिर्फ बराबरी का अधिकार दिलाने की बात नहीं की, बल्कि उन्हें अपनी पहचान, आत्मसम्मान और फैसले खुद लेने का हौसला भी दिया।
स्टीनम ने घर से लेकर कार्यस्थल और समाज तक महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव को सार्वजनिक बहस का मुद्दा बनाया। उनका संघर्ष उस दौर में सामने आया, जब महिलाओं की स्वतंत्रता और समान अधिकारों की मांग को आज की तरह सहजता से स्वीकार नहीं किया जाता था।
उनकी सबसे बड़ी ताकत थी—आंदोलन को आम महिलाओं की जिंदगी से जोड़ना। 2008 में द न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए एक अप्रकाशित इंटरव्यू में स्टीनम ने अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी खुशी का जिक्र किया था। उन्होंने कहा था कि उन्हें सबसे ज्यादा संतुष्टि तब मिलती है, जब कोई महिला उनसे मिलकर यह बताती है कि महिला आंदोलन ने उसकी जिंदगी बदल दी।
यही शायद ग्लोरिया स्टीनम की पूरी जिंदगी का सबसे बड़ा परिचय है। उन्होंने सिर्फ महिलाओं के अधिकारों की वकालत नहीं की—उन्होंने महिलाओं को यह एहसास कराया कि उनकी आवाज की अपनी कीमत है। उनकी विरासत आज भी उन महिलाओं में दिखाई देती है, जो अपने अधिकारों के लिए सवाल पूछती हैं, असमानता को चुनौती देती हैं और अपने जीवन के फैसले खुद लेने की कोशिश करती हैं। ग्लोरिया स्टीनम की आवाज अब खामोश है, लेकिन जिस सवाल को उन्होंने दशकों तक दुनिया के सामने रखा, वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है— क्या महिलाओं को बराबरी सिर्फ कानून में मिलेगी, या समाज की सोच में भी? यही सवाल उनकी सबसे बड़ी विरासत है।





