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Home कृषि

मध्यप्रदेश की चार पारंपरिक फसलों को GI टैग, महाकौशल के किसानों की बदलेगी तकदीर

DigitalDesk by DigitalDesk
June 29, 2026
in कृषि, भोपाल, मध्य प्रदेश, मुख्य समाचार
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traditional crops from Madhya Pradesh receive GI tags
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भोपाल। मध्यप्रदेश की कृषि विरासत को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने की दिशा में बड़ी उपलब्धि हासिल हुई है। प्रदेश की चार पारंपरिक कृषि उपज—सिताही कुटकी, नागदमन कुटकी, बैंगनी अरहर और छत्रिय धान—को भौगोलिक संकेतक (GI) टैग मिल गया है। इससे इन उत्पादों को कानूनी संरक्षण मिलने के साथ राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में नई पहचान मिलेगी। राज्य सरकार ने इसे किसानों, विशेषकर महाकौशल और आदिवासी अंचल के कृषकों के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि बताया है।

  • चार कृषि उत्पादों को मिली पहचान
  • अब वैश्विक बाजार तक होगी पहुंच
  • महाकौशल के किसानों को बड़ा फायदा
  • जीआई टैग से बढ़ेगी ब्रांड वैल्यू
  • सरकार बोली- किसानों की आय होगी दोगुनी

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि प्रदेश में कृषि कल्याण वर्ष के दौरान किसानों की समृद्धि सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। उन्होंने कहा कि जीआई टैग मिलने से इन पारंपरिक फसलों की ब्रांड वैल्यू बढ़ेगी, बेहतर बाजार मिलेगा और किसानों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि होगी। सरकार जैविक, प्राकृतिक और परंपरागत खेती के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए लगातार प्रयास कर रही है।

यह उपलब्धि किसान कल्याण एवं कृषि विकास विभाग, मध्यप्रदेश राज्य कृषि विपणन (मंडी) बोर्ड तथा जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर के संयुक्त प्रयासों से संभव हुई है। वैज्ञानिक अनुसंधान और तकनीकी दस्तावेजों के आधार पर इन फसलों को जीआई टैग दिलाया गया।

महाकौशल और आदिवासी क्षेत्रों को मिलेगा सबसे बड़ा लाभ

चारों कृषि उपजें मुख्य रूप से डिंडोरी, मंडला, अनूपपुर, शहडोल, उमरिया, बालाघाट, छिंदवाड़ा और जबलपुर सहित महाकौशल के आदिवासी क्षेत्रों में उगाई जाती हैं। इन क्षेत्रों के हजारों किसानों को अब अपने उत्पादों का बेहतर मूल्य मिलेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे कृषि आधारित उद्योग, प्रसंस्करण इकाइयों और निर्यात को भी नई गति मिलेगी।

सिताही कुटकी की खासियत

सिताही कुटकी ‘लिटिल मिलेट’ की 60 दिन में तैयार होने वाली देशी किस्म है। यह कम वर्षा, कमजोर मिट्टी और पहाड़ी क्षेत्रों में भी अच्छी पैदावार देती है। सूखा, कीट और कई बीमारियों के प्रति इसकी प्रतिरोधक क्षमता इसे अन्य किस्मों से अलग बनाती है। डिंडोरी सहित आदिवासी क्षेत्रों में करीब 60 हजार किसान इसकी खेती से जुड़े हैं। 10 से 11 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक स्थिर उत्पादन देने वाली यह फसल खाद्य एवं पोषण सुरक्षा के लिए भी महत्वपूर्ण मानी जाती है।

नागदमन कुटकी और बैंगनी अरहर की बढ़ेगी मांग

डिंडोरी की नागदमन कुटकी अपने औषधीय गुणों और उच्च पोषण मूल्य के लिए प्रसिद्ध है। वहीं बैंगनी अरहर अपनी विशेष बैंगनी फलियों, अधिक प्रोटीन और रोग प्रतिरोधक क्षमता के कारण किसानों के बीच लोकप्रिय है। उचित प्रबंधन के साथ इसकी पैदावार 15 से 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पहुंच सकती है।

छत्रिय धान को भी मिली नई पहचान

प्रदेश की पारंपरिक धान किस्म छत्रिय धान को भी जीआई टैग मिलने से इसकी विशिष्ट गुणवत्ता और पहचान सुरक्षित रहेगी। इससे किसानों को बेहतर मूल्य मिलने के साथ इस पारंपरिक किस्म के संरक्षण और संवर्धन को भी बढ़ावा मिलेगा।

पहले भी मिल चुके हैं GI टैग

इससे पहले मध्यप्रदेश के सीहोर शरबती गेहूं और रीवा सुंदरजा आम को भी जीआई टैग मिल चुका है। अब चार नई कृषि उपजों के जुड़ने से प्रदेश की कृषि विरासत और मजबूत हुई है।

कृषि मंत्री ऐंदल सिंह कंसाना ने कहा कि सरकार भविष्य में भी प्रदेश की अन्य विशिष्ट कृषि उपजों को जीआई टैग दिलाने के लिए प्रयास जारी रखेगी। वहीं विभाग के अधिकारियों का कहना है कि यह उपलब्धि किसानों को नए बाजार, बेहतर दाम और निर्यात के अवसर उपलब्ध कराने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगी।

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Tags: #traditional crops Madhya Pradesh#receive GI tags
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