पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बड़ा भूचाल देखने को मिल रहा है। राज्य की सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (TMC) अपने गठन के बाद के सबसे बड़े आंतरिक संकट से गुजरती दिखाई दे रही है। पार्टी प्रमुख और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के सामने अब केवल विपक्षी दलों की चुनौती नहीं है, बल्कि पार्टी के भीतर ही असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। हालात ऐसे बन गए हैं कि पार्टी के करीब 20 सांसदों ने संसद में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) का समर्थन करने की तैयारी कर ली है।
लोकसभा में टूट की आहट, NDA के समर्थन में खड़े हुए बागी सांसद
काकोली घोष दस्तिदार के नेतृत्व में उभरा असंतुष्ट गुट
राज्यसभा से सुखेंदु शेखर राय का इस्तीफा बना बड़ा झटका
विधानसभा में भी नेतृत्व को चुनौती, पार्टी की पकड़ हुई कमजोर
INDIA गठबंधन की बैठक के बीच ममता पर बढ़ा राजनीतिक दबाव
राजनीतिक घटनाक्रम ने तब नया मोड़ ले लिया जब लोकसभा सांसद काकोली घोष दस्तिदार के नेतृत्व में बागी सांसदों के एक समूह ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर NDA के समर्थन की घोषणा करने का फैसला किया। काकोली घोष दस्तिदार का दावा है कि लगभग 20 सांसद इस निर्णय के साथ खड़े हैं। यदि यह दावा सही साबित होता है तो यह तृणमूल कांग्रेस के लिए संसद में अब तक का सबसे बड़ा झटका होगा।
दिलचस्प बात यह है कि यह घटनाक्रम उस समय सामने आया जब ममता बनर्जी और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी दिल्ली में INDIA गठबंधन की बैठक में हिस्सा लेने पहुंचे थे। एक ओर विपक्षी एकजुटता की बात हो रही थी, वहीं दूसरी ओर पार्टी के भीतर बगावत के स्वर तेज होते जा रहे थे।
बागी सांसदों का कहना है कि वे जनता के जनादेश को स्वीकार करते हुए अपने भविष्य की राजनीति NDA के साथ जोड़ना चाहते हैं। हालांकि सूत्रों के अनुसार, फिलहाल इन सांसदों की रणनीति पार्टी से तत्काल इस्तीफा देने या भाजपा में शामिल होने की नहीं है। वे संसद में एक अलग समूह बनाकर NDA का समर्थन करना चाहते हैं। माना जा रहा है कि यह कदम दल-बदल विरोधी कानून से बचने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है।
इस बीच पार्टी नेतृत्व और बागी सांसदों के बीच लोकसभा में मुख्य सचेतक (चीफ व्हिप) के पद को लेकर भी विवाद खड़ा हो गया है। बागी गुट का दावा है कि काकोली घोष दस्तिदार अब भी पार्टी की चीफ व्हिप हैं, जबकि तृणमूल कांग्रेस का कहना है कि उन्हें हटाकर कल्याण बनर्जी को यह जिम्मेदारी सौंप दी गई है। पार्टी के अनुसार इस संबंध में 20 मई को लोकसभा सचिवालय को आधिकारिक पत्र भेजा जा चुका है।
राजनीतिक संकट केवल लोकसभा तक सीमित नहीं है। राज्यसभा में भी पार्टी को बड़ा झटका लगा है। तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्य सचेतक सुखेंदु शेखर राय ने न केवल राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है, बल्कि पार्टी की प्राथमिक सदस्यता भी छोड़ दी है। उन्होंने आरोप लगाया कि पार्टी ने पिछले कई वर्षों में अराजक राजनीतिक माहौल को बढ़ावा दिया और अब वह उस व्यवस्था का हिस्सा नहीं रहना चाहते।
सुखेंदु शेखर राय का इस्तीफा इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि उनका कार्यकाल अभी 2029 तक था। इसके बावजूद उन्होंने सिद्धांतों के आधार पर पद छोड़ने का फैसला किया। उनके इस कदम ने पार्टी के भीतर चल रहे असंतोष को और अधिक उजागर कर दिया है।
सूत्रों के अनुसार, बागी सांसदों ने हाल ही में दिल्ली में भाजपा नेता भूपेंद्र यादव के आवास पर बैठक भी की। इस बैठक में कई सांसदों के शामिल होने की चर्चा है। इसके अलावा राष्ट्रीय राजधानी में एक गुप्त स्थान पर भी करीब 20 सांसदों की बैठक होने की खबरें सामने आई हैं, जहां उन्होंने अपने अगले राजनीतिक कदम पर विचार-विमर्श किया।
पार्टी के लिए चिंता की बात यह भी है कि हाल ही में पश्चिम बंगाल विधानसभा में भी नेतृत्व के खिलाफ असंतोष खुलकर सामने आया। विपक्ष के नेता के चयन को लेकर पार्टी हाईकमान की पसंद को दरकिनार करते हुए बड़ी संख्या में विधायकों ने अलग रुख अपनाया। इससे यह संकेत मिला कि संगठन के भीतर नेतृत्व को लेकर असहमति केवल सांसदों तक सीमित नहीं है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच विपक्षी गठबंधन INDIA की बैठक में ममता बनर्जी को सहयोगी दलों का समर्थन जरूर मिला। बैठक में उन्होंने पश्चिम बंगाल चुनावों को लेकर गंभीर सवाल उठाए और चुनावी प्रक्रिया पर अपनी चिंताएं व्यक्त कीं। हालांकि राज्य में पार्टी के भीतर बढ़ते असंतोष ने उनके राजनीतिक नेतृत्व को कठिन परीक्षा के दौर में ला खड़ा किया है।
उधर भाजपा ने भी इस मौके को भुनाने की कोशिश शुरू कर दी है। भाजपा नेताओं का कहना है कि तृणमूल कांग्रेस में आंतरिक लोकतंत्र खत्म हो गया है और पार्टी का नेतृत्व कुछ चुनिंदा लोगों तक सीमित रह गया है। भाजपा का दावा है कि पहले जनता ने पार्टी को झटका दिया और अब उसके अपने जनप्रतिनिधि भी उससे दूरी बना रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि बागी सांसदों का समूह वास्तव में NDA के समर्थन में खुलकर सामने आता है, तो यह न केवल तृणमूल कांग्रेस की संसदीय ताकत को कमजोर करेगा, बल्कि पश्चिम बंगाल की राजनीति में भी नए समीकरण पैदा कर सकता है। फिलहाल सबकी निगाहें ममता बनर्जी की अगली रणनीति और बागी सांसदों के औपचारिक कदम पर टिकी हुई हैं। आने वाले दिन यह तय करेंगे कि यह असंतोष केवल एक राजनीतिक संदेश है या फिर तृणमूल कांग्रेस में बड़े विभाजन की शुरुआत।