लोकसभा में तीनों बिल गिरे..देश भर में विपक्ष के खिलाफ तेज होगा अभियान…बीजेपी उजागर करेगी विपक्ष का महिला विरोधी चेहरा!

Women Reservation

लोकसभा में तीनों बिल गिरे..देश भर में विपक्ष के खिलाफ तेज होगा बीजेपी का अभियान…

नई दिल्ली में 17 अप्रैल 2026 को लोकसभा में महिला आरक्षण से जुड़े तीन अहम विधेयकों—संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, परिसीमन विधेयक और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक—के पारित न हो पाने के बाद देश की राजनीति में बड़ा भूचाल आ गया है। इन विधेयकों के गिरते ही सत्तारूढ़ भाजपा और एनडीए सहयोगियों ने कांग्रेस और ‘इंडिया’ गठबंधन के खिलाफ आक्रामक रुख अपना लिया है, जबकि विपक्ष ने भी सरकार पर तीखे सवाल खड़े किए हैं।

महिला आरक्षण बिल पर सियासी संग्राम…संसद से सड़क तक घमासान

संसद में हुए मतदान के दौरान इन विधेयकों के पक्ष में 298 वोट पड़े, लेकिन पारित होने के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत यानी करीब 326 वोट पूरे नहीं हो सके। वहीं 230 सांसदों ने इसके खिलाफ मतदान किया। जिसके चलते ये महत्वपूर्ण विधेयक गिर गए। यह घटनाक्रम केवल संसदीय प्रक्रिया तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अब यह देशव्यापी राजनीतिक मुद्दा बनता जा रहा है।

भाजपा की ओर से इस मुद्दे पर विपक्ष को सीधे तौर पर “महिला विरोधी” करार दिया जा रहा है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्ष पर आरोप लगाते हुए कहा कि महिला आरक्षण जैसे ऐतिहासिक कदम को रोकने के लिए झूठा नैरेटिव गढ़ा गया। उन्होंने यह भी कहा कि देश की महिलाएं उन दलों को कभी माफ नहीं करेंगी। जिन्होंने 33 प्रतिशत आरक्षण का रास्ता रोका।
सूत्रों के अनुसार भाजपा ने अब इस मुद्दे को देशभर में बड़े स्तर पर उठाने की रणनीति बनाई है। पार्टी इसे आगामी चुनावों में एक प्रमुख मुद्दा बनाकर जनता के बीच ले जाएगी और विपक्षी गठबंधन को “महिला विरोधी” और “विकास विरोधी” के रूप में पेश करेगी। बीजेपी का यह भी दावा है कि इन विधेयकों का विरोध कर विपक्ष ने न केवल महिलाओं बल्कि ओबीसी वर्ग के हितों को भी नुकसान पहुंचाया है।

वहीं दूसरी ओर कांग्रेस और ‘इंडिया’ गठबंधन ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। विपक्ष का कहना है कि ये विधेयक संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप नहीं थे और इन्हें जल्दबाजी में लाकर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश की गई। कांग्रेस नेताओं ने इसे “लोकतंत्र को हाईजैक करने का प्रयास” बताते हुए कहा कि सरकार केवल राजनीतिक लाभ के लिए ऐसे बिल ला रही है। विपक्ष ने यह भी आरोप लगाया कि महिला आरक्षण के नाम पर सरकार वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटकाना चाहती है। उनका कहना है कि बिना उचित परिसीमन और स्पष्ट व्यवस्था के इस तरह के विधेयक लागू करना व्यावहारिक नहीं है। साथ ही, विपक्षी दलों ने इस पूरे घटनाक्रम को “राजनीतिक नौटंकी” करार दिया है।

इस पूरे विवाद के बाद संसद के भीतर और बाहर दोनों जगह सियासी बयानबाजी तेज हो गई है। भाजपा जहां इसे महिलाओं के सम्मान और अधिकारों से जोड़कर देख रही है, वहीं विपक्ष इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया और संवैधानिक मर्यादाओं का मुद्दा बता रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि महिला आरक्षण का मुद्दा पहले भी कई बार उठ चुका है, लेकिन इस बार जिस तरह से यह टकराव सामने आया है। वह आगामी चुनावों में बड़ा प्रभाव डाल सकता है। भाजपा इस मुद्दे को भावनात्मक और सामाजिक न्याय से जोड़कर जनता के बीच ले जाने की तैयारी में है, जबकि विपक्ष इसे संवैधानिक बहस के रूप में प्रस्तुत करेगा।
कुल मिलाकर, महिला आरक्षण विधेयकों का गिरना केवल एक संसदीय घटना नहीं रहा, बल्कि इसने देश की राजनीति में नई बहस को जन्म दे दिया है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा और अधिक गरमाने की संभावना है, क्योंकि दोनों पक्ष इसे अपने-अपने तरीके से जनता के सामने रखने में जुट गए हैं।

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