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पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस प्रमुख Mamata Banerjee को एक और राजनीतिक झटका लगा है। पार्टी की राज्यसभा सांसद Sushmita Dev ने राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा देने के साथ-साथ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) भी छोड़ दी है। उनके इस फैसले ने न केवल बंगाल की राजनीति बल्कि पूर्वोत्तर भारत में टीएमसी की रणनीति को लेकर भी नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
क्यों महत्वपूर्ण है सुष्मिता देव का इस्तीफा?
सुष्मिता देव उन नेताओं में शामिल थीं जिन्हें टीएमसी में शामिल होने के बाद ममता बनर्जी का करीबी माना जाने लगा था। वर्ष 2021 में कांग्रेस छोड़कर टीएमसी में शामिल होने के बाद उन्हें पार्टी ने राज्यसभा भेजा था। ऐसे में उनका अचानक इस्तीफा केवल एक सांसद का पद छोड़ना नहीं, बल्कि पार्टी के लिए राजनीतिक संदेश भी माना जा रहा है। हाल के समय में टीएमसी को कई राज्यों में संगठनात्मक चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। ऐसे में एक प्रमुख चेहरे का पार्टी छोड़ना ममता बनर्जी की राष्ट्रीय विस्तार रणनीति के लिए झटका माना जा रहा है।
कांग्रेस से टीएमसी तक का सफर
असम के सिलचर की रहने वाली सुष्मिता देव राजनीति में विरासत के साथ आई थीं। उनके पिता Santosh Mohan Dev कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री रहे हैं। सुष्मिता ने कांग्रेस में सक्रिय राजनीति की शुरुआत की और जल्द ही पार्टी की प्रमुख युवा महिला नेताओं में गिनी जाने लगीं। वर्ष 2014 में वह कांग्रेस के टिकट पर सिलचर लोकसभा सीट से सांसद चुनी गईं। बाद में उन्हें महिला कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष भी बनाया गया।महिला अधिकारों, सामाजिक मुद्दों और पूर्वोत्तर भारत के प्रश्नों पर उनकी सक्रियता ने उन्हें राष्ट्रीय पहचान दिलाई।
कांग्रेस क्यों छोड़ी थी?
2021 में कांग्रेस नेतृत्व से मतभेदों और संगठनात्मक असंतोष के बीच सुष्मिता देव ने पार्टी छोड़ दी थी। उस समय कांग्रेस कई राज्यों में लगातार कमजोर हो रही थी और कई वरिष्ठ नेता पार्टी से दूरी बना रहे थे। कांग्रेस छोड़ने के बाद उन्होंने ममता बनर्जी की टीएमसी का दामन थाम लिया। यह वह दौर था जब टीएमसी पश्चिम बंगाल से बाहर राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार की कोशिश कर रही थी। पूर्वोत्तर राज्यों, खासकर असम और त्रिपुरा में पार्टी अपनी मौजूदगी बढ़ाना चाहती थी। सुष्मिता देव को टीएमसी में शामिल करना इसी रणनीति का हिस्सा माना गया था।
टीएमसी के लिए क्यों अहम थीं सुष्मिता?
टीएमसी का पारंपरिक प्रभाव पश्चिम बंगाल तक सीमित रहा है। पार्टी लंबे समय से राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका की कोशिश कर रही है। इसके लिए उसे बंगाल से बाहर मजबूत चेहरों की जरूरत थी। सुष्मिता देव पूर्वोत्तर भारत में पहचान रखने वाली नेता थीं। कांग्रेस पृष्ठभूमि, संसदीय अनुभव और महिला नेतृत्व की छवि उन्हें टीएमसी के लिए महत्वपूर्ण बनाती थी। राज्यसभा में भी वह कई संसदीय समितियों की सदस्य थीं और महिला मुद्दों पर मुखरता से अपनी बात रखती थीं। ऐसे में उनका जाना केवल संख्या का नुकसान नहीं बल्कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व का भी नुकसान माना जा रहा है।
क्या है इस्तीफे के पीछे की वजह?
फिलहाल इस्तीफे के पीछे के कारणों को लेकर आधिकारिक रूप से विस्तृत जानकारी सामने नहीं आई है। लेकिन राजनीतिक गलियारों में कई तरह की चर्चाएं चल रही हैं। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि टीएमसी के भीतर संगठनात्मक भूमिका और राजनीतिक भविष्य को लेकर असंतोष इसकी वजह हो सकता है। वहीं कुछ लोगों का अनुमान है कि वह भविष्य में किसी अन्य राजनीतिक विकल्प की तलाश कर सकती हैं। हालांकि जब तक सुष्मिता देव स्वयं सार्वजनिक रूप से कारण नहीं बतातीं, तब तक इन चर्चाओं को केवल राजनीतिक अटकलें ही माना जाएगा।
ममता बनर्जी के लिए क्या संदेश?
सुष्मिता देव का इस्तीफा ऐसे समय आया है जब टीएमसी पहले से ही कई राजनीतिक चुनौतियों का सामना कर रही है। पार्टी पश्चिम बंगाल में अपनी पकड़ बनाए रखने के साथ-साथ राष्ट्रीय राजनीति में भी प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रही है। ऐसे में पार्टी के प्रमुख चेहरों का बाहर जाना यह संकेत देता है कि राष्ट्रीय विस्तार की रणनीति उतनी आसान नहीं है जितनी दिखाई देती है। विशेष रूप से पूर्वोत्तर भारत में टीएमसी को जो राजनीतिक आधार बनाने की उम्मीद थी, उस पर भी इस घटनाक्रम का असर पड़ सकता है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि सुष्मिता देव का अगला राजनीतिक कदम क्या होगा। क्या वह सक्रिय राजनीति से कुछ समय के लिए दूरी बनाएंगी, किसी अन्य दल में शामिल होंगी या फिर अपनी स्वतंत्र राजनीतिक भूमिका तलाशेंगी? इसके साथ ही यह भी देखना दिलचस्प होगा कि टीएमसी उनकी जगह किस नए चेहरे को आगे बढ़ाती है और क्या पार्टी इस झटके से जल्दी उबर पाती है। फिलहाल इतना तय है कि सुष्मिता देव का राज्यसभा और टीएमसी से इस्तीफा ममता बनर्जी के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक झटका माना जा रहा है, जिसके असर पर आने वाले दिनों में देश की राजनीति की नजर बनी रहेगी।





